गोपालगंज: एक हाथ से बना रहे 30 साल से शुद्ध पेड़ा, दिव्यांगता को मात देकर उमेश साह ने खड़ी की मिसाल

जन्म से दिव्यांग और आर्थिक तंगी से जूझने वाले उमेश साह ने हार नहीं मानी. पिछले 30 सालों से वे एक हाथ से शुद्ध पेड़ा बनाकर अपनी पहचान बना रहे हैं. उनकी यह कहानी संघर्ष, मेहनत और आत्मनिर्भरता की एक अनूठी मिसाल है, जो हर किसी को प्रेरित करती है.

Gopalganj News: "हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ..." रामचरितमानस की यह चौपाई भोरे प्रखंड की हुस्सेपुर पंचायत के लक्ष्मीपुर निवासी 50 वर्षीय उमेश साह की जिंदगी पर पूरी तरह सटीक बैठती है. जन्म से दिव्यांगता, आर्थिक तंगी और जमीन के अभाव जैसी मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद उमेश ने कभी हार नहीं मानी. बायां हाथ पूरी तरह विकसित नहीं होने के बाद भी उन्होंने मेहनत और आत्मसम्मान के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई.

पिछले करीब तीन दशक से उमेश साह अपने हाथों से तैयार किए गए शुद्ध पेड़े की मिठास लोगों तक पहुंचा रहे हैं और इसी मेहनत से अपने परिवार का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण कर रहे हैं.

एक हाथ से चलाया हथौड़ा, नहीं छोड़ा संघर्ष का रास्ता

उमेश साह बताते हैं कि उनका पुश्तैनी काम लोहे के कृषि उपकरण तैयार करने का था. बचपन से ही उनका बायां हाथ कमजोर था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया.

15-16 वर्ष की उम्र में वह अपने एक सहयोगी की मदद से सिर्फ दाहिने हाथ से भारी हथौड़ा चलाकर खुरपी, हंसुआ और कुदाल जैसे कृषि उपकरण तैयार करते थे. गरीबी दूर करने के लिए उन्होंने गुजरात, पंजाब और दिल्ली जाकर भी किस्मत आजमाई, लेकिन सफलता नहीं मिलने पर वापस गांव लौट आए.

1995-96 में शुरू हुई पेड़े की दुकान

वर्ष 1995-96 में उनके पिता ने भोरे-मीरगंज मुख्य मार्ग पर लखरांव स्थित प्राचीन शिव मंदिर के पास पेड़ा और चाय की छोटी सी दुकान शुरू की.

उमेश भी पिता के साथ इस काम में जुट गए. शुद्ध दूध से तैयार खोवा और बेहतर स्वाद के कारण धीरे-धीरे यह दुकान राहगीरों और मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की पसंद बन गई.

शादी के बाद और पिता के निधन के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उमेश के कंधों पर आ गई. उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और मेहनत के बल पर परिवार को संभाला. आज उनका पुत्र नितीश कुमार नौवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा है.

30 साल बाद भी स्वाद और गुणवत्ता से समझौता नहीं

बाजार में आज कई तरह के रेडीमेड और मिलावटी मिठाइयों की बिक्री हो रही है, लेकिन उमेश साह ने अपनी पुरानी परंपरा नहीं छोड़ी है.

वह आज भी खुद दूध को घंटों तक गर्म कर शुद्ध मावा (खोवा) तैयार करते हैं और उसी से पेड़ा बनाते हैं.

उमेश कहते हैं, "30 साल पहले भी दिन में 300-400 रुपये की बचत हो जाती थी और आज बाजार में दुकानों की संख्या बढ़ने के बाद भी लगभग उतनी ही आमदनी है. लेकिन मैंने कभी मिलावट का सहारा नहीं लिया."

संघर्ष और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा बने उमेश

उमेश साह की कहानी सिर्फ एक मिठाई दुकानदार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, मेहनत और आत्मसम्मान की मिसाल है.

एक हाथ से अपनी जिंदगी की गाड़ी खींचते हुए उमेश आज पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बने हुए हैं. उनकी मेहनत यह संदेश देती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, मजबूत इरादों और ईमानदार मेहनत से सफलता हासिल की जा सकती है.

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Author: Suresh rai

Published by: Vivek Ranjan

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