Buxar News : कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (एटीएआरआई), पटना के प्रधान वैज्ञानिकों ने रविवार को कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), बक्सर का भ्रमण किया. इस दौरान वैज्ञानिकों ने विभिन्न तकनीकी प्रदर्शन इकाइयों का निरीक्षण किया, किसानों से संवाद स्थापित किया और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया.
प्रदर्शन इकाइयों का किया निरीक्षण
भा.कृ.अनु.प.-एटीएआरआई, पटना (जोन-4) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एम. मोनोब्रूल्लाह एवं डॉ. डी. वी. सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र की विभिन्न गतिविधियों का जायजा लिया. केवीके के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डॉ. देवकरन ने उन्हें स्वचालित मौसम केंद्र, रेज्ड बेड तकनीक, सोलर वाटर पंप, ढैंचा बीज उत्पादन, एकीकृत कृषि प्रणाली, धान की सीधी बुआई, अमरूद एवं आम की सघन बागवानी, हल्दी, सूरन तथा ब्लैक बंगाल बकरी पालन जैसी प्रदर्शन इकाइयों का भ्रमण कराया.
लिची का पौधरोपण, पर्यावरण संरक्षण का संदेश
भ्रमण के दौरान क्षेत्र में लीची बागवानी को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केंद्र परिसर में शाही प्रजाति के लीची पौधों का रोपण किया गया. वैज्ञानिकों ने किसानों से अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने की अपील की.
किसानों को मिली अरहर उत्पादन की तकनीकी जानकारी
दलहन में आत्मनिर्भरता कार्यक्रम के तहत आयोजित समूह दलहन अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन (सीएफएलडी) कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को खरीफ अरहर की उन्नत खेती की जानकारी दी. इस अवसर पर किसानों के बीच राजेंद्र अरहर-1 किस्म की बीज किट का भी वितरण किया गया.
संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर दिया जोर
वैज्ञानिकों ने किसानों को संतुलित एवं एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि इससे मिट्टी की उर्वरता, जैविक गुण और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है, जबकि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता और लागत कम होती है. इससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार होता है.
उर्वरक घोल और पोषण प्रबंधन की दी जानकारी
डॉ. एम. मोनोब्रूल्लाह ने फर्टिगेशन तकनीक के तहत सिंचाई के साथ उर्वरक घोल तैयार करने और पाउडर व तरल उर्वरकों के सही उपयोग की जानकारी दी. वहीं डॉ. डी. वी. सिंह ने दलहनी फसलों में आवश्यक पोषक तत्वों की भूमिका, उनकी कमी और विषाक्तता से बचाव के उपायों पर किसानों को विस्तार से जानकारी दी. कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय डॉ. रामकेवल ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन विशेषज्ञ हरिगोबिंद ने किया.
