ब्रह्मपुर से संतोष कांत की रिपोर्ट
Buxar News: बिहार और उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी आरा-बलिया रेल परियोजना फिलहाल पटरियों पर दौड़ने से पहले सियासत के भंवर में फंस गई है. इस परियोजना के एलाइनमेंट (रूट) को लेकर पड़ोसी जिलों—भोजपुर और बक्सर—के बीच शुरू हुआ विवाद अब एक बड़े राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है. अमूमन किसी विकास योजना के रूट को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच लड़ाई होती है, लेकिन यहाँ नजारा बिल्कुल उल्टा है. इस बार आमने-सामने कोई और नहीं, बल्कि सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के ही कद्दावर नेता और विधायक हैं.
यह विवाद अब केवल रेलवे का एक तकनीकी नक्शा या जमीन अधिग्रहण का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह क्षेत्रीय प्रतिष्ठा, वोट बैंक और राजनीतिक रसूख की जंग बन चुका है. अब गेंद रेल मंत्रालय के पाले में है, और दोनों ही पक्ष दिल्ली में अपनी-अपनी गोटियां सेट करने में जुट गए हैं.
बक्सर के हित में ‘महागठबंधन’ और ‘एनडीए’ एक मंच पर
इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू बक्सर जिले में देखने को मिल रहा है. बक्सर के विकास और रेल रूट को अपने क्षेत्र में मोड़ने के लिए राजनीतिक दलों की सीमाएं पूरी तरह खत्म हो गई हैं. बक्सर से भाजपा विधायक आनंद मिश्रा, जदयू विधायक राहुल सिंह और मुख्य विपक्षी दल राजद के विधायक शंभूनाथ यादव एक सुर में बात कर रहे हैं. विभिन्न दलों के इन विधायकों का एक संयुक्त मंच पर आना यह साफ करता है कि बक्सर इस परियोजना को हर हाल में रघुनाथपुर की ओर मोड़ना (डाइवर्ट करना) चाहता है. बक्सर गुट का तर्क है कि रघुनाथपुर की तरफ से रूट ले जाने पर आबादी के एक बड़े हिस्से को सीधा परिवहन लाभ मिलेगा और व्यापार के नए रास्ते खुलेंगे. इसके लिए रेलवे बोर्ड और रेल मंत्रालय पर लगातार प्रशासनिक व राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है.
भोजपुर के हक के लिए अकेले ‘अंगद की तरह पैर’ जमाए खड़े हैं राघवेंद्र प्रताप
बक्सर के इस चौतरफा राजनीतिक दबाव के खिलाफ भोजपुर के हितों की रक्षा के लिए बड़हरा के वरिष्ठ भाजपा विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह अकेले ही डटकर खड़े हैं. बक्सर के विधायकों की एकजुटता के मुकाबले भोजपुर से राघवेंद्र प्रताप की आवाज सबसे मुखर और आक्रामक होकर सामने आई है. मूल स्वीकृत एलाइनमेंट को अक्षुण्ण रखने की मांग को लेकर उन्होंने सीधे अपनी ही सरकार और रेल मंत्रालय के सामने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं. उनका कहना है कि स्वीकृत रूट में किसी भी तरह का बदलाव भोजपुर की जनता के साथ सीधे तौर पर धोखा होगा.
बक्सर के पास पहले से ही सब कुछ है
मैदान में उतरे विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह ने बक्सर के नेताओं की मांग पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा है कि बक्सर जिला पहले से ही बुनियादी ढांचे के मामले में समृद्ध है. वह हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग से जुड़ा है, गंगा नदी पर बने पुलों का लाभ उसे मिल रहा है और उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे होने के कारण सभी व्यापारिक कॉरिडोर का फायदा भी उसी के पास है. बक्सर के पास पहले से ही सब कुछ है, तो फिर भोजपुर के हिस्से की इस इकलौती और महत्वपूर्ण परियोजना की बलि चढ़ाने की जिद क्यों की जा रही है? हम भोजपुर के हक पर डाका किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे.
क्यों खास है ‘मूल एलाइनमेंट’?
भोजपुर के पक्षधरों और तकनीकी जानकारों का मानना है कि रेलवे ने जो मूल एलाइनमेंट (नक्शा) स्वीकृत किया था, वह बेहद संतुलित और सामाजिक-आर्थिक रूप से फायदेमंद है. यदि मूल रूट पर काम होता है, तो भोजपुर जिले के उदवंतनगर, आरा सदर और शाहपुर प्रखंड के दर्जनों सुदूर ग्रामीण इलाकों को आजादी के बाद पहली बार रेलवे नेटवर्क का सीधा लाभ मिलेगा. इन इलाकों के किसानों को अपनी फसल (सब्जी और अनाज) आरा, पटना या बलिया की मंडियों तक पहुंचाने के लिए एक सस्ता और सुलभ माध्यम मिल जाएगा.
रूट बदलने से नुकसान
यदि बक्सर के दबाव में रूट को रघुनाथपुर की तरफ मोड़ा जाता है, तो भोजपुर के इन क्षेत्रों के हजारों ग्रामीणों का रेल सफर का सपना एक बार फिर दशकों के लिए पीछे छूट जाएगा.
क्या होगा रेल मंत्रालय का फैसला
इस क्षेत्रीय घमासान ने राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक के कान खड़े कर दिए हैं. एक तरफ बक्सर के विधायकों का भारी राजनीतिक और वोटबैंक का दबाव है, तो दूसरी तरफ राघवेंद्र प्रताप सिंह के रूप में एक मजबूत और तार्किक विरोध खड़ा है, जिसे नजरअंदाज करना भाजपा या रेल मंत्रालय के लिए आसान नहीं होगा. लेकिन जिस तरह से इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है, उसके बाद अंतिम फैसला पूरी तरह से ‘नयी दिल्ली’ के राजनीतिक गलियारे से ही होना तय माना जा रहा है. अब देखना यह है कि केंद्र सरकार मूल स्वीकृत एलाइनमेंट के साथ जाकर भोजपुर के गांवों को न्याय देती है या फिर बक्सर के सर्वदलीय नेताओं के रसूख के आगे झुकते हुए नया रूट तय करती है.
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