नालंदा विश्वविद्यालय और बिहार पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्त्वावधान में शनिवार को ‘विरासत-पर्यटन प्रबंधन’ विषय पर पांच दिवसीय आवासीय प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रम (सर्टीफिकेट कोर्स) का विधिवत शुभारंभ हुआ.
पहले ही संस्करण में कार्यक्रम की सभी 60 सीटें भर जाना इस बात का प्रमाण है कि पर्यटन एवं विरासत क्षेत्र के पेशेवरों के बीच इस पाठ्यक्रम को व्यापक स्वीकार्यता मिली है.
इस आवासीय प्रबंधन विकास कार्यक्रम (एमडीपी) का आयोजन नालंदा विश्वविद्यालय के 'स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज' तथा 'स्कूल ऑफ हिस्टॉरिकल स्टडीज' के संयुक्त समन्वय में किया गया है. इसमें पर्यटन गाइड, टूर ऑपरेटर, वन्यजीव व्याख्याकार, संग्रहालय कर्मी, शोधार्थी और विरासत क्षेत्र से जुड़े विभिन्न पेशेवर हिस्सा ले रहे हैं.
'पर्यटक मार्गदर्शक ही होते हैं सभ्यतागत विरासत के पहले संपर्क बिंदु'
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि पर्यटक मार्गदर्शक (टूर गाइड) किसी भी आगंतुक या पर्यटक का पहला संपर्क-बिंदु होते हैं. बिहार की समृद्ध सभ्यतागत विरासत को देश-दुनिया के पर्यटक किस नजरिए से देखेंगे, यह काफी हद तक गाइड की संवाद शैली, प्रस्तुति और विषय की गहरी समझ पर निर्भर करता है.
उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में पर्यटन केवल ऐतिहासिक तथ्यों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक विशेषज्ञता आधारित क्षेत्र बन चुका है. ऐसे में एक कुशल मार्गदर्शक के पास इतिहास, पुरातत्व, कला, संस्कृति, पर्यावरण और भाषा का समग्र ज्ञान होना अनिवार्य है.
बिहार की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनेगा पर्यटन: कुलपति
कुलपति प्रो. चतुर्वेदी ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में पर्यटन बिहार की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनेगा, इसलिए इस क्षेत्र में प्रशिक्षित और दक्ष मानव संसाधन तैयार करना समय की मांग है. उन्होंने यह भी घोषणा की कि उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को भविष्य में विश्वविद्यालय के रियायती अल्पावधि भाषा पाठ्यक्रमों से भी जोड़ा जाएगा.
'सहभागिता संवाद' पहल के तहत प्रशिक्षण
'सहभागिता संवाद' पहल के अंतर्गत आयोजित इस पाठ्यक्रम में विरासत संरक्षण, पर्यटन प्रबंधन, संप्रेषण कौशल (कम्यूनिकेशन स्किल) और क्षेत्रीय अध्ययन को एकीकृत रूप से शामिल किया गया है.
नाममात्र के शुल्क पर संचालित इस पहल का मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदायों को विश्वविद्यालय की शैक्षणिक विशेषज्ञता से जोड़ना, सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उत्तरदायी व सतत पर्यटन (सस्टेनेबल टूरिज्म) को बढ़ावा देना है.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक पटल पर सशक्त रूप से प्रस्तुत करने और रोजगार के नए अवसर सृजित करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया.
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