नालंदा में मजबूत बैंकिंग नेटवर्क के बावजूद लोन वितरण कमजोर

Nalanda News: नालंदा जिले में बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) रेशियो राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे चल रहा है. इसके साथ ही जिले में कृषि और शिक्षा ऋण में लगातार बढ़ता एनपीए बैंकिंग क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बन गया है.

Nalanda News (बिहारशरीफ से कंचन कुमार की रिपोर्ट): नालंदा जिले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) लीड बैंक के रूप में कार्य कर रहा है और जिला सहकारी व ग्रामीण बैंकों समेत 350 से अधिक बैंक शाखाएं संचालित हैं. इसके बावजूद मार्च 2023 तक जिले का क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) रेशियो केवल 53.01 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 76 प्रतिशत रहा. इसका मतलब है कि बैंकों में जमा प्रत्येक 100 रुपये पर जिले में केवल 53 रुपये का ही ऋण वितरित हो पा रहा है.

18 वर्षों में करीब 17 गुना बढ़ा ऋण वितरण

वर्ष 2005-06 में नालंदा जिले में कुल ऋण वितरण लगभग 224 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2022-23 में बढ़कर 3,920 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इस अवधि में ऋण वितरण में करीब 1,650 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. जिले के लिए वर्ष 2024-25 में 4,620 करोड़ रुपये के ऋण वितरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जिसमें कृषि, आवास, मुद्रा और डिजिटल लेंडिंग को प्राथमिकता दी गई है.

कृषि और आवास क्षेत्र को मिल रहा सबसे ज्यादा लोन

जिले में वितरित कुल ऋण में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 38 से 42 प्रतिशत के बीच है, जो सबसे अधिक है. इसके बाद आवास ऋण का स्थान आता है, जिसकी हिस्सेदारी 18 से 22 प्रतिशत तक है. दोनों क्षेत्रों को मिलाकर कुल ऋण वितरण का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि और आवास क्षेत्र में जा रहा है, जबकि एमएसएमई, व्यापार, शिक्षा और वाहन ऋण की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है.

कृषि और शिक्षा ऋण में बढ़ता एनपीए बना चुनौती

बैंकिंग क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार कृषि ऋण में एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) का स्तर 15 से 20 प्रतिशत तक पहुंच गया है. वहीं शिक्षा ऋण में डिफॉल्ट की दर 10 से 16 प्रतिशत के बीच बताई जा रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक बाढ़, सूखा, फसल नुकसान, बेरोजगारी और रोजगार के लिए पलायन जैसी समस्याएं ऋण चुकौती में सबसे बड़ी बाधा बन रही हैं.

बैंकिंग आंकड़ों की पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल

नाबार्ड की रिपोर्ट के अनुसार बिहार के 38 में से 28 जिले क्रेडिट-डेफिशिएंट श्रेणी में शामिल हैं और नालंदा भी इसी श्रेणी में माना जाता है. जिले में बैंक-वार ऋण वितरण, लाभार्थियों की संख्या और डिफॉल्ट से जुड़े विस्तृत आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं. वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इन आंकड़ों को सार्वजनिक करने से बैंकिंग योजनाओं की वास्तविक स्थिति और प्रशासनिक जवाबदेही अधिक स्पष्ट हो सकेगी.

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Published by: Vikas Jha

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