Biharsharif News : राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के आंकड़े हाल ही में जारी कर दिए गए हैं. देश के 715 जिलों को कवर करने वाले इस अहम सर्वे में फिलहाल बिहार और नालंदा जिले की स्वास्थ्य रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है. स्वास्थ्य संकेतकों की सटीक जानकारी न मिलने से स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों में थोड़ी निराशा है. लोगों का कहना है कि सही आंकड़े सामने आने पर ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में कारगर नीतियां बन सकेंगी.
29 मई को जारी हुए सर्वे के आंकड़े
देश के सबसे बड़े स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में से एक राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (2023-24) की तथ्य-पत्रिका 29 मई 2026 को जारी कर दी गई है. इस सर्वे में देश भर के 715 जिलों को शामिल किया गया है. यह सर्वे जिला स्तर पर स्वास्थ्य, पोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण और रक्ताल्पता जैसी अहम जानकारियां उपलब्ध कराता है.
कुछ राज्यों का डाटा आया, बिहार का इंतजार
आधिकारिक पोर्टल पर फिलहाल गोवा, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के जिला स्तरीय आंकड़े मौजूद हैं. इस सूची में बिहार का नाम अभी गायब है. सर्वे की विश्वसनीय वेबसाइट पर भी जिला स्तरीय आंकड़ों की जगह 'शीघ्र उपलब्ध होगा' लिखा दिख रहा है. अभी सिर्फ राष्ट्रीय स्तर की रिपोर्ट ही सामने आई है, जिसमें जिलेवार विवरण नहीं है.
स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना हैं NFHS के आंकड़े
विशेषज्ञों की मानें तो NFHS के आंकड़े किसी भी जिले की स्वास्थ्य सुविधाओं का असली आईना होते हैं. इन्हीं आंकड़ों को देखकर कुपोषण, शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, संस्थागत प्रसव और परिवार नियोजन जैसी सरकारी योजनाओं की सफलता का आकलन होता है. रिपोर्ट के बिना स्वास्थ्य सेवाओं की असलियत का पता लगाना मुश्किल हो जाता है.
NFHS-5 में भी हुई थी देरी
अगर पिछले सर्वे के पैटर्न को देखें, तो NFHS-5 (2019-21) में भी ठीक ऐसा ही हुआ था. पहले राष्ट्रीय स्तर की रिपोर्ट जारी हुई थी. उसके कुछ महीने बाद बिहार और उसके जिलों की राज्य स्तरीय तथ्य-पत्रिका सामने आई थी. इसलिए उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले कुछ महीनों में नालंदा समेत बिहार के सभी जिलों के आंकड़े आ जाएंगे.
स्थानीय लोगों ने उठाई डाटा सार्वजनिक करने की मांग
स्वास्थ्य रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होने से बिहारशरीफ के लोगों में चिंता है. सामाजिक कार्यकर्ता विकास कुमार उर्फ गांधी जी, बैंक कर्मी विजय कुमार, शिक्षक टिंकु कुमार और कारोबारी शिशुकांत कुमार ने इस पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि डाटा न होने से सरकारी योजनाओं की सही निगरानी नहीं हो पा रही है.
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