Biharsharif News : साम्प्रदायिक सौहार्द के मसीहा, प्रभावशाली व्यक्तित्व, ओजस्वी वक्ता, अद्वितीय साहस और कोमल हृदय के धनी स्वतंत्रता सेनानी बाबू श्याम नारायण सिंह को बिहार के सच्चे सपूतों में गिना जाता है. उनका जीवन देशभक्ति, साहस, सामाजिक सेवा और मानवता के प्रति समर्पण की मिसाल रहा. आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ ही उन्होंने सांप्रदायिक दंगों के दौरान हजारों लोगों की जान बचाकर मानवता की अनूठी मिसाल पेश की.
प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में हुआ था जन्म
बाबू श्याम नारायण सिंह का जन्म 24 जनवरी 1901 को नालंदा जिले के बिंद गांव में प्रतिष्ठित जमींदार बाबू राम प्रसाद सिंह के प्रथम पुत्र के रूप में हुआ था. उनकी शिक्षा पटना कॉलेजिएट स्कूल और पटना कॉलेज में हुई. देशभक्ति की भावना उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी. उनके पिता क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों की खुलेआम मदद करते थे. इसी पारिवारिक परिवेश ने श्याम बाबू के भीतर राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता संग्राम के प्रति समर्पण की भावना को मजबूत किया.
भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय के गेट पर जुटे क्रांतिकारियों और छात्रों को श्याम नारायण सिंह ने अपने ओजस्वी भाषण से संबोधित किया. उनके जोशीले संबोधन से प्रेरित होकर सात वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों की परवाह किए बिना यूनियन जैक उतारकर राष्ट्रीय ध्वज फहराया. इस घटना के बाद अंग्रेजी सरकार ने उनकी गिरफ्तारी पर पांच हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया था. इसके बावजूद वे स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में सक्रिय रहे.
गिरफ्तारी के बाद मिली सश्रम कारावास की सजा
13 सितंबर 1942 को हरनौत के पास विरजू मिल्की खंधा में नाव से नदी पार करने के दौरान श्याम नारायण सिंह, जगत नारायण लाल और लाल सिंह त्यागी को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद 31 अक्टूबर 1942 को उन्हें दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई और हजारीबाग जेल भेज दिया गया. इससे पहले भी वे वर्ष 1939 और 1940 में गिरफ्तार होकर कारावास की सजा भुगत चुके थे. आजादी की लड़ाई में उनका योगदान और संघर्ष लगातार जारी रहा.
सांप्रदायिक दंगों के दौरान करीब छह हजार लोगों को दी शरण
वर्ष 1946 में विभाजन के दौरान भड़के सांप्रदायिक दंगों के समय श्याम बाबू ने मानवता और भाईचारे की मिसाल पेश की. उन्होंने बिंद में ग्रामीणों की मदद से शिवालय मंदिर, अपने बगीचे और अन्य सुरक्षित स्थानों पर करीब छह हजार मुस्लिम परिवारों को शरण दी. उनके इस कदम से हजारों लोगों की जान बच सकी. सांप्रदायिक तनाव के उस दौर में उनका यह प्रयास हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवता की मिसाल बन गया.
राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भी रही सक्रिय भूमिका
श्याम नारायण सिंह वर्ष 1937 में बिहार रूरल ईस्ट कांस्टीट्यूएंसी से केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली के सबसे युवा सदस्यों में निर्वाचित हुए और वर्ष 1952 तक विधायक रहे. डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व वाली बिहार की अंतरिम सरकार में उन्होंने मुख्यमंत्री के निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया. इसके अलावा वे पटना विश्वविद्यालय की सीनेट के सदस्य और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के वाइस चेयरमैन भी रहे. सार्वजनिक जीवन में उन्होंने सामाजिक विकास और जनसेवा को प्राथमिकता दी.
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डाक टिकट जारी कर किया गया था सम्मानित
उनके योगदान के सम्मान में उनके 111वें जन्मदिन के अवसर पर 24 जनवरी 2012 को भारत सरकार के डाक एवं दूरसंचार विभाग ने पांच रुपये का डाक टिकट जारी किया. डाक टिकट जारी कराने में उनके पुत्र कुमुद बिहारी सिंह और पौत्र आईजी कुंदन कृष्णन के प्रयास भी महत्वपूर्ण रहे.
13 मई 1968 को हुआ था निधन
बाबू श्याम नारायण सिंह का निधन 13 मई 1968 को पटना के पीएमसीएच में हृदयाघात से हुआ था. स्वतंत्रता संग्राम में उनके संघर्ष, सांप्रदायिक सौहार्द के लिए किए गए प्रयास और सामाजिक सेवा का उनका योगदान आज भी लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है.
