नालंदा से रामविलास की रिपोर्ट
Bihar Sharif News : भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण की दिशा में चल रहे ज्ञान भारतम मिशन के तहत बिहार ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है. राज्य में अब तक 3 लाख 25 हजार से अधिक दुर्लभ एवं अति दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज की जा चुकी है. इनमें कई पांडुलिपियां 700 वर्ष से भी अधिक पुरानी हैं, जो भारतीय सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान परंपरा के अनमोल साक्ष्य मानी जा रही है. नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय के कुलपति तथा ज्ञान भारतम मिशन, बिहार क्लस्टर सेंटर के निदेशक प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि इन अमूल्य धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े पैमाने पर स्कैनिंग और डिजिटाइजेशन का कार्य चल रहा है.
प्राचीन ज्ञान धरोहरों को डिजिटल रूप में सहेजने का बड़ा अभियान
अबतक एक लाख 15 हजार से अधिक पांडुलिपियों का डिजिटाइजेशन पूरा किया जा चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संचालित यह राष्ट्रीय अभियान देशभर में बिखरी प्राचीन पांडुलिपियों की पहचान, संरक्षण और डिजिटल अभिलेखीकरण के उद्देश्य से चलाया जा रहा है. उन्होंने बताया कि बिहार में मिशन का दायित्व नव नालंदा महाविहार को केन्द्र सरकार ने दिया है. इस मिशन के नोडल पदाधिकारी विश्वविद्यालय के डीन एवं पालि विभागाध्यक्ष प्रो विश्वजीत कुमार को बनाया गया है. प्रथम चरण में 13 जिलों को महाविहार क्लस्टर सेंटर से जोड़ा गया है.
पांडुलिपियों का संरक्षण केवल विरासत नहीं, राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी
प्रत्येक जिले में नव नालंदा महाविहार के दो-दो प्राध्यापकों की प्रतिनियुक्ति की गई है, जो संबंधित जिला प्रशासन तथा कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के सहयोग से सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण कार्य को गति दे रहे हैं. प्रो. सिंह ने कहा कि पांडुलिपियां किसी भी समाज की सामूहिक स्मृति, ज्ञान और सांस्कृतिक चेतना की जीवंत धरोहर होती है. इनका नष्ट होना केवल कागजों का नष्ट होना नहीं, बल्कि इतिहास और सभ्यता के महत्वपूर्ण अध्यायों का विलुप्त हो जाना है. इसलिए इनके संरक्षण को राष्ट्रीय दायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए.
720 दुर्लभ पांडुलिपियों ने खोले भारतीय ज्ञान परंपरा के नए अध्याय
अभियान के दौरान अबतक लगभग 720 अति दुर्लभ पांडुलिपियां भी चिह्नित की गई हैं. इनमें ब्राह्मी, संस्कृत, प्राकृत, पाली, फारसी, बौद्ध, जैन, उर्दू तथा अन्य प्राचीन भाषाओं और लिपियों में लिखित ग्रंथ शामिल हैं. ये पांडुलिपियां धर्म, दर्शन, साहित्य, चिकित्सा, शिक्षा, समाज और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े बहुमूल्य ज्ञान को संजोए हुए हैं. कुलपति सह निदेशक प्रो. सिंह ने कहा कि प्राचीन मगध भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है. भगवान महावीर और भगवान बुद्ध की यह साधना भूमि रही है. उनके द्वारा अनेकों वर्षावास मगध में किया गया था.
नव नालंदा महाविहार की पहल से विरासत संरक्षण को मिली नई गति
इस क्षेत्र में नालंदा, विक्रमशिला, उदंतपुरी और तिलाधक जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों ने भारत को वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित किया था. उन्होंने बताया कि नव नालंदा महाविहार विश्व का पहला संस्थान है, जिसने 60-70 के दशक में बौद्ध त्रिपिटक का देवनागरी लिपि में प्रकाशन कराया है. उनके अनुसार ज्ञान भारतम मिशन बिहार की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को नई पहचान देने वाला ऐतिहासिक प्रयास है. इसे जनआंदोलन का स्वरूप देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित किया जा रहा है.
