बेटे की लंबी आयु के लिए माताएं आज रखेंगी निर्जला जीवित्पुत्रिका व्रत

हिंदू धर्म में साल भर व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं. सभी व्रत-त्योहारों को मनाने की परंपरा अलग-अलग होती है.

हरनाटांड़. हिंदू धर्म में साल भर व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं. सभी व्रत-त्योहारों को मनाने की परंपरा अलग-अलग होती है. साथ ही सभी त्योहारों के धार्मिक महत्व व मान्यता भी अलग-अलग है. इनमें से एक जितिया पर्व है, जो मातृ प्रेम और संतान की दीर्घायु के लिए किया जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) शनिवार को नहाय-खाय से प्रारंभ हुआ. महिलाएं अहले सुबह में उठकर पवित्र नदी तथा जो नहर व तालाब में नहीं गयी वह घर पर गंगा जल डाल कर स्नान की. इसके बाद विधि विधान के साथ पूजन किया और पितरों का स्मरण किया. उसके बाद सात्विक भोजन बनाने में जुट गयी. जिसमें महिलाएं अरवा चावल का भात, अरहर की दाल विभिन्न प्रकार के बिना लहसुन-प्याज की सब्जी, पकौड़ी आदि विशेष व्यंजन तैयार की और भोजन ग्रहण किया. वही पं. अशोक मिश्रा ने कहा कि हिंदू पंचांग के अनुसार यह व्रत सप्तमी तिथि को उपवास से शुरू होगा. वही आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 सितंबर को सूर्योदय से लेकर 15 सितंबर सुबह 6:36 बजे सूर्योदय तक निर्जला व्रत रखेगी, जो 24 घंटे का होगा. पूरा दिन माताएं अपने पुत्रों के बेहतर स्वास्थ्य, सुखमय जीवन और लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखेगी. रात में व्रत कथा सुनकर पूजा की जाएगी तथा नवमी तिथि 15 सितंबर सुबह 6:36 बजे पर अष्टमी समाप्त होगी और नवमी तिथि में महिलाएं खीरा, अंकुरित चना, दूध आदि अपने नियम के अनुसार व्रत खोल कर व्रत का पारण किया जाएगा. क्या है व्रत का नाम और धार्मिक महत्व

पं. मुन्ना उपाध्याय, अंकित उपाध्याय व योगेश पांडेय ने बताया कि जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है. मान्यता है कि यह व्रत प्रदोष व्यापिनी तिथि में किया जाता है. महिलाएं अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए प्रदोष काल में निर्जला व्रत रखती हैं. इस बार जितिया व्रत की तिथि और समय बहुत अनुकूल है, जिससे यह व्रत करना अधिक सरल होगा. यह व्रत इसलिए भी विशेष है क्योंकि तिथि सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक पूर्ण रूप से मिल रही है. मान्यता है कि ””””हाथी पेट”””” जब तिथि में आता है, तो वह व्रत शुद्ध और फलदायी होता है. इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन और माता पार्वती की पूजा करती हैं. मान्यता के अनुसार राजा जीमूतवाहन ने अपने जीवन का बलिदान देकर नागवंश के पुत्रों की रक्षा की थी. तभी से माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु और संकटों से रक्षा के लिए यह व्रत करती आ रही हैं. यह व्रत मातृ शक्ति और बलिदान का प्रतीक है.

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नहाए-खाए के साथ जितिया पर्व का हुआ शुभारंभ

मधुबनी. स्थानीय प्रखंड अंतर्गत सभी गांवों में शनिवार को पारंपरिक आस्था और उत्साह के साथ जितिया पर्व का शुभारंभ हुआ. महिलाएं नहाए-खाए की परंपरा निभाते हुए व्रत की शुरुआत की. प्रात: काल स्नान के बाद शुद्ध और सात्विक भोजन ग्रहण कर महिलाएं संतान के दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करती हैं. इसके साथ जितिया पर्व की शुरुआत मानी जाती है. जितिया पर्व विशेष रूप से मातृत्व और संतान के कल्याण से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि महिलाएं निर्जला व्रत रखकर जीमूतवाहन देवता की पूजा करती हैं इसके तहत मिट्टी या लकड़ी से जितिया की प्रतिमा बनाकर पारंपरिक रीति-रिवाज से पूजन किया जाता है. आस्था और विश्वास से ओतप्रोत जितिया पर्व ग्रामीण परिवेश में लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण है. नहाए-खाए की परंपरा निभाते हुए पारण की तैयारियों के बीच घर-घर में भक्ति और उल्लास का वातावरण बना हुआ है.

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By SATISH KUMAR

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