सावन खत्म होते ही चंपारण में चढ़ा मटन का खुमार, मिट्टी की हांडी से देश-दुनिया तक पहुंचा स्वाद

सावन खत्म होते ही चंपारण में मटन की मांग बढ़ने लगी है. मिट्टी की हांडी में धीमी आंच पर पकने वाला चंपारण अहुना मटन देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुका है. जानिए इसकी खासियत, पकाने की विधि और जीआई टैग की दावेदारी की पूरी कहानी.

Champaran mutton: सावन खत्म हो चुका है. इसके साथ ही चंपारण के बाजारों में मटन की मांग और इसके शौकीनों की भीड़ फिर बढ़ने लगी है. लेकिन यह सिर्फ मटन की बढ़ती बिक्री की कहानी नहीं है. यह उस स्वाद की कहानी है, जिसने चंपारण की सीमाओं को पार कर देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी पहचान बना ली है. कश्मीर से कन्याकुमारी और कटक से असम तक ‘चंपारण मीट हाउस’ के नाम से चलने वाली दुकानों ने इस देसी स्वाद को एक अलग ब्रांड बना दिया है. चंपारण का अहुना मटन अब सिर्फ मोतिहारी, घोड़ासहन या बेतिया तक सीमित नहीं रहा. देश के बड़े शहरों में भी लोग मिट्टी की हांडी में धीमी आंच पर पकने वाले इस मटन का स्वाद लेने पहुंचते हैं. चंपारण मटन की लोकप्रियता पर राष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार चर्चा होती रही है.

आखिर चंपारण मटन में ऐसा क्या है?

चंपारण मटन को खास बनाने वाली सबसे बड़ी चीज इसका मसाला नहीं, बल्कि इसे पकाने का अंदाज है. मटन को सरसों के तेल, प्याज, लहसुन, अदरक और अलग-अलग मसालों के साथ अच्छी तरह मिलाया जाता है. इसके बाद इसे मिट्टी की हांडी में रखा जाता है. हांडी को मिट्टी के ढक्कन से बंद कर आटे से सील कर दिया जाता है, ताकि अंदर की भाप बाहर नहीं निकल सके. इसके बाद शुरू होता है असली खेल. हांडी को कोयले की धीमी आंच पर रखा जाता है. मटन धीरे-धीरे पकता रहता है और अपना रस छोड़ता है. अंदर बनने वाली भाप बाहर निकलने के बजाय हांडी के भीतर ही घूमती रहती है. इसी वजह से मटन अपने ही रस और मसालों में पकता है. यही धीमी आंच, बंद हांडी और मिट्टी के बर्तन का मेल चंपारण मटन को अलग स्वाद देता है. चंपारण की इस पारंपरिक शैली को अहुना मटन या हांडी मटन भी कहा जाता है.

हांडी खुलते ही फैलती है ऐसी खुशबू कि रुक जाते हैं कदम

चंपारण मटन की दुकानों की एक खासियत यह भी है कि मटन को अक्सर ग्राहक के सामने हांडी में पकाया जाता है. बाहर से देखने पर मिट्टी की एक साधारण हांडी नजर आती है. लेकिन उसके अंदर मटन, मसाले और सरसों के तेल का ऐसा मेल तैयार हो रहा होता है, जिसकी खुशबू दूर तक जाती है. जब घंटों बाद हांडी की सील खोली जाती है तो सबसे पहले उसकी खुशबू बाहर निकलती है. इसके बाद नरम और मसालेदार मटन सामने आता है. यही दृश्य कई लोगों को दुकान तक खींच लाता है. पुराने समय से चली आ रही इस विधि में हांडी को आटे से सील करने की परंपरा रही है. अलग-अलग जगहों पर पकाने के समय में अंतर मिलता है, लेकिन धीमी आंच पर बंद हांडी में पकाना इसकी मूल पहचान है.

गांव से निकला स्वाद, पटना पहुंचा और फिर देश-दुनिया में छा गया

चंपारण मटन की लोकप्रियता की कहानी में पूर्वी चंपारण का घोड़ासहन इलाका भी खास स्थान रखता है. रिपोर्टों के अनुसार मिट्टी के बर्तन में पकने वाले इस मटन की शैली घोड़ासहन से बेतिया, मोतिहारी और फिर दूसरे शहरों तक पहुंची. इसके बाद चंपारण मीट हाउस नाम से इस स्वाद को एक ब्रांड की पहचान मिलने लगी. पटना में इसके आउटलेट खुलने के बाद यह स्वाद तेजी से दूसरे शहरों तक पहुंचा. देखते ही देखते ‘चंपारण मीट हाउस’ नाम देश के अलग-अलग हिस्सों में सुनाई देने लगा.

एक प्लेट मटन, और ग्राहक पूरी हांडी ही लेकर निकल जाते हैं

चंपारण मटन की दुकानों पर सिर्फ प्लेट में मटन परोसने की परंपरा नहीं है. कई जगह ग्राहक पूरी हांडी भी खरीदना पसंद करते हैं. एक हांडी में सीमित मात्रा में मटन पकाया जाता है. हांडी को बंद करके पकाने के कारण ग्राहक के सामने तैयार होने वाली यह डिश अपने आप में आकर्षण बन जाती है. यही कारण है कि चंपारण मटन की दुकानों पर खाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसे बनते हुए देखना भी है. दुकान के बाहर रखी हांडी, उससे उठती खुशबू और हांडी खुलने का इंतजार करने वाले ग्राहक इस पूरे अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं.

चंपारण में मटन के लिए लगती है भीड़, कभी चौक तक पहुंच जाता है जाम

चंपारण में मटन के प्रति लोगों की दीवानगी कोई नयी बात नहीं है. यहां मांसाहारी व्यंजनों की अपनी मजबूत परंपरा है. स्थानीय स्तर पर कई ऐसी दुकानें हैं, जहां मटन खाने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं. कुछ दुकानों पर भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि आसपास की सड़क पर भी इसका असर दिखने लगता है. इलमराम चौक की मटन दुकान का उदाहरण भी इसी दीवानगी को दिखाता है. यहां दुकान पर उमड़ने वाली भीड़ के कारण पूरा चौक जाम होने तक की स्थिति बन जाती है.

चंपारण का दूसरा स्वाद—बन्हौरा और चवन्नी का कबाब

अगर चंपारण मटन की चर्चा हो और चवन्नी की का और बन्हौरा के कबाब का नाम न आये तो कहानी अधूरी रह जाएगी. बन्हौरा बाजार के कबाब के भी स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में शौकीन हैं. यहां कबाब खाने के लिए लोग दूर-दराज से पहुंचते हैं. कई बार ग्राहकों को अपनी बारी के लिए काफी देर तक इंतजार करना पड़ता है.

फिल्म से लेकर सोशल मीडिया तक, चंपारण मटन की चर्चा

चंपारण मटन की लोकप्रियता सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं रही. इसके नाम और स्वाद को लेकर फिल्म, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लगातार चर्चा होती रही है. आज देश के अलग-अलग हिस्सों में चंपारण मटन के नाम से चलने वाले रेस्तरां और मीट हाउस इस बात के गवाह हैं कि स्थानीय रेसिपी किस तरह एक बड़े ब्रांड में बदल सकती है.

अब जीआई टैग की उम्मीद

चंपारण हांडी मटन को आधिकारिक पहचान दिलाने की मांग भी पहले से उठती रही है. मोतिहारी प्रशासन की ओर से इसके लिए पहल और कमेटी गठन की बात सामने आ चुकी है. अगर भविष्य में चंपारण अहुना मटन को जीआई पहचान मिलती है तो इसकी पारंपरिक विधि और क्षेत्रीय पहचान को आधिकारिक संरक्षण मिलने की राह मजबूत होगी.

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लेखक के बारे में

By गणेश वर्मा

गणेश ने अपनी पत्रकारिता यात्रा की शुरुआत 2014 में गोरखपुर स्थित हिंदुस्तान अखबार से की। तब से लगातार मुख्यधारा मीडिया में सक्रिय रहकर उन्होंने रिपोर्टिंग से लेकर संपादकीय दायित्वों तक का अनुभव हासिल किया है। फिलहाल वे प्रभात खबर से जुड़े हैं और पश्चिम चम्पारण जिले में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं।

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