Begusarai News : कांवर झील में मछलियों की प्रजातियां हो रही हैं विलुप्त, जैव विविधता पर खतरा

जिले के मंझौल अनुमंडल स्थित कांवर झील, जो कभी अपनी जैव विविधता और स्वादिष्ट मछलियों के लिए प्रसिद्ध थी, अब संकट के दौर से गुजर रही है.

विपिन कुमार मिश्र, बेगूसराय

जिले के मंझौल अनुमंडल स्थित कांवर झील, जो कभी अपनी जैव विविधता और स्वादिष्ट मछलियों के लिए प्रसिद्ध थी, अब संकट के दौर से गुजर रही है. यह इलाका न केवल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है, बल्कि यहां के जल में पायी जानेवाली मछलियों की प्रजातियां भी स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण रही हैं. हालांकि, समय के साथ साथ और उचित संसाधन व देखरेख की कमी के कारण, कांवर झील की मछलियों की प्रजातियां अब विलुप्त होने के कगार पर हैं, जिससे इलाके की जैव विविधता पर भी खतरा मंडरा रहा है.

मछलियों का उत्पादन और व्यापार

कांवर झील के बारे में पुराने लोग बताते हैं कि एक समय था जब यहां से प्रतिदिन एक हजार मन से अधिक मछलियां निकलती थीं. ये मछलियां न केवल बेगूसराय जिले में, बल्कि राज्य के विभिन्न हिस्सों से आकर खरीदारी की जाती थीं. झील में पायी जानेवाली मछलियों की विविधता और स्वाद की वजह से यह इलाका व्यापारिक दृष्टिकोण से भी काफी समृद्ध था. स्थानीय मछलियां भी बाजारों में प्रमुखता से बिकती थीं, लेकिन आज स्थिति यह है कि यहां की मछलियां लगभग विलुप्त हो चुकी हैं और जैव विविधता पर भारी असर पड़ा है.

मछलियों के विलुप्त होने के कारण

कांवर झील में मछलियों के विलुप्त होने के कई कारण हैं. सबसे पहला कारण तो यह है कि यहां अत्यधिक मछलियों का शिकार किया गया है. मछलियों की बढ़ती मांग और उनके स्वाद के कारण, बिना किसी संरक्षण उपाय के इन मछलियों का अंधाधुंध शिकार किया गया. इसके अलावा, कांवर झील में जल की कमी और मछलियों के लिए उचित आहार की कमी भी इसकी विलुप्ति का मुख्य कारण है. मछलियों की संरक्षण के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये हैं, जो उनके अस्तित्व को बनाये रखने में सहायक होते. इसके अतिरिक्त, कांवर झील के आसपास अत्यधिक खाद का प्रयोग भी इसकी मिट्टी और जल की गुणवत्ता पर बुरा असर डाल रहा है. खाद के अत्यधिक प्रयोग से जल की स्थिति बिगड़ी है, जिससे मछलियों का प्राकृतिक वास प्रभावित हो रहा है.

वर्षों से बेखबर हैं जिम्मेदार

कांवर झील की मछलियों और उसके जैव विविधता को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर कई संगठनों ने आवाज उठायी, लेकिन अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. पिछले कई सालों से, जब भी इस मुद्दे पर सरकारी या गैर-सरकारी कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो संबंधित पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि इस मुद्दे को लेकर केवल चर्चा करते हैं, लेकिन बाद में यह चर्चा फाइलों में ही सिमट कर रह जाती है. एक उदाहरण के रूप में, 2018 में बिहार के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में कांवर झील के संरक्षण के लिए बैठक आयोजित की गयी थी, जिसमें झील के क्षेत्र का सीमांकन बढ़ाने की बात हुई थी, लेकिन उस फाइल का अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है.

कई चर्चित नामों वाली मछलियां हो गयीं विलुप्त

कांवर झील के पानी में पायी जानेवाली विभिन्न मछलियों की प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं. इनमें फोकबा, कवई, सिंघी, गैंची, बामी जैसी मछलियां पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं, या विलुप्त होने के कगार पर हैं. इसके अलावा, अन्य प्रमुख प्रजातियां जैसे रोहू, कतला, मिरका सिंगही, गरई, पोठिया, ढलवां, ढोंगा चनदा, गैंची, पोकबा, खोलसा, भालसरी, मांगुर, सौरी, पटहियाटेंगरा, चेंगा और कुरसा जैसी मछलियां भी खतरे में हैं. कुल मिलाकर, कांवर झील में पाई जानेवाली 24 प्रजातियों में से आधे दर्जन मछलियां विलुप्त हो चुकी हैं. इस विलुप्तता का असर सीधे तौर पर जैव विविधता पर पड़ रहा है और इससे पर्यावरणीय संकट भी उत्पन्न हो गया है.

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Published by: Shah abid hussain

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