बांका में मधुश्रावणी के तीसरे दिन नवविवाहिताओं ने किया पारंपरिक पूजन, सुहाग की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन की कामना

बांका जिले के पंजवारा में मधुश्रावणी व्रत के तीसरे दिन नवविवाहित मैथिल महिलाओं ने श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की. यह पर्व मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जहाँ महिलाएं पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. इस व्रत में बिना नमक का भोजन और फलाहार का विशेष विधान है, जो दांपत्य जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने में सहायक माना जाता है.

Banka News: बांका जिले के पंजवारा क्षेत्र में मधुश्रावणी व्रत महोत्सव के तीसरे दिन नवविवाहित मैथिल महिलाओं ने पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की. सावन माह में मनाया जाने वाला यह विशेष व्रत मिथिला की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. नवविवाहिताएं अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन की मंगलकामना के लिए पूरे श्रद्धाभाव के साथ यह व्रत करती हैं.

बुधवार को पूजा स्थलों पर सुबह से ही धार्मिक वातावरण बना रहा. व्रती महिलाओं ने पूजा के दौरान मधुश्रावणी महात्म्य की कथा सुनी, पारंपरिक अनुष्ठान किए और प्रसाद ग्रहण किया. स्थानीय लोगों के अनुसार यह पर्व केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम भी है.

विवाह के बाद पहले सावन में किया जाता है यह विशेष व्रत

मधुश्रावणी व्रत नवविवाहित मैथिल कन्याओं द्वारा विवाह के बाद पहले सावन माह में जीवन में एक बार किया जाने वाला विशेष व्रत है. यह व्रत सावन माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होता है और निर्धारित अवधि तक चलता है.

मान्यता है कि इस व्रत के पालन से वैवाहिक जीवन में सुख, सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि बनी रहती है. इसलिए नवविवाहिताएं इसे अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ करती हैं.

तीसरे दिन भक्ति भाव से हुआ पूजन

पंजवारा क्षेत्र में व्रत महोत्सव के तीसरे दिन व्रती महिलाओं ने परंपरागत तरीके से पूजा-अर्चना की. पूजा स्थलों पर धार्मिक वातावरण के बीच मधुश्रावणी महात्म्य की कथा का श्रवण किया गया और पूजा के बाद प्रसाद का वितरण हुआ.

स्थानीय महिलाओं ने बताया कि इस व्रत के दौरान प्रतिदिन निर्धारित विधि से पूजा की जाती है और परिवार के बड़े-बुजुर्ग तथा महिलाएं भी अनुष्ठान में सहभागी बनती हैं.

बिना नमक का भोजन और फलाहार

मधुश्रावणी व्रत के दौरान व्रती महिलाएं विशेष नियमों का पालन करती हैं. परंपरा के अनुसार वे बिना नमक के अरवा चावल और फलों का सेवन करती हैं. पूरे व्रत काल में सादगी, संयम और धार्मिक अनुशासन का विशेष महत्व माना जाता है.

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में सात्विक आहार और नियमित पूजा से मन, परिवार और वैवाहिक जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है.

Banka News: मिथिला की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा पर्व

मधुश्रावणी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है. इस पर्व के माध्यम से नवविवाहित महिलाओं को पारिवारिक परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक संस्कारों से जोड़ा जाता है.

बांका के पंजवारा क्षेत्र में भी यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि आधुनिक समय में भी मधुश्रावणी व्रत मिथिला समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

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लेखक के बारे में

By गौरव कश्यप

गौरव कश्यप प्रिंट माध्यम में 14 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. पंजवारा (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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