बांका : बच्चे के कान छेदते ही उसकी आंखों से आंसू निकलते और रोने की आवाज पूरे आंगन में गूंज उठती. आसपास बैठी बुजुर्ग महिलाओं के चेहरे पर खुशी की मुस्कान आ जाती. कोई बच्चे को दुलारती, कोई मंगलगीत गाती तो कोई आशीर्वाद देने के लिए आगे बढ़ जाती. कभी कान-नाक छेदन की यही रस्म पूरे परिवार के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होती थी.
समय बदला, जीवनशैली बदली और रस्म निभाने का ठिकाना भी बदल गया. अब गांव के आंगन की जगह ब्यूटी पार्लर ने ले ली है. हालांकि, रस्म का स्वरूप भले बदल गया हो, लेकिन इसके साथ जुड़ी भावनाएं और पारिवारिक जुड़ाव आज भी बरकरार हैं.
मंगलगीतों के बीच निभाई जाती थी रस्म
कान-नाक छेदन की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है. पुराने समय में बच्चे के कान या नाक छेदने के मौके पर परिवार और आसपास की बुजुर्ग महिलाओं को विशेष रूप से बुलाया जाता था. घर में उत्सवी माहौल बनता था. महिलाएं मंगलगीत गातीं और रिश्तेदार भी इस आयोजन में शामिल होते थे.
रस्म पूरी होने के बाद बुजुर्ग महिलाओं और इसमें शामिल लोगों को कपड़े, मिठाई और रुपये उपहार में देने की परंपरा भी रही है. बच्चे का रोना भी इस रस्म का एक हिस्सा माना जाता था. महिलाएं उसे संभालतीं, दुलारतीं और आशीर्वाद देतीं.
एक तरफ बच्चे की आंखों में आंसू होते, तो दूसरी तरफ दादी-नानी और परिवार की बुजुर्ग महिलाओं के चेहरे पर नई पीढ़ी को अपनी परंपरा से जोड़ने की खुशी दिखाई देती थी.
भागदौड़ भरी जिंदगी ने बदला रस्म का ठिकाना
बदलते दौर में रोजगार, नौकरी और भागदौड़ भरी जिंदगी ने पारिवारिक आयोजनों का तरीका भी बदल दिया है. कामकाजी परिवारों के लिए लंबे समय तक गांव में रहकर पारंपरिक तरीके से रस्म निभाना मुश्किल होता जा रहा है. ऐसे में ब्यूटी पार्लर ने इस पुरानी परंपरा को आधुनिक सुविधा से जोड़ दिया है.
दिल्ली निवासी सुमन चौधरी भी इसी बदलाव की एक तस्वीर हैं. वह खुद कामकाजी महिला हैं, जबकि उनके पति पारस चौधरी दिल्ली में बैंक में कार्यरत हैं. नौकरी और समयाभाव के कारण परिवार के लिए गांव लौटना संभव नहीं हो पाया. इसके बावजूद उन्होंने परंपरा को छोड़ने के बजाय अपनी बच्ची का कान-नाक छेदन पार्लर में कराने का फैसला किया.
पार्लर में भी सुनाई दिये मंगलगीत
सुमन ने कोशिश की कि आधुनिक जगह पर होने वाली यह रस्म भी गांव की यादों से जुड़ी रहे. मौके पर लोगों ने गीत गाये, बच्ची को आशीर्वाद दिया और मिठाइयां बांटी गयीं. जगह भले ही पार्लर की थी, लेकिन माहौल में ग्रामीण परंपरा की झलक साफ दिखाई दी.
सुमन बताती हैं कि उन्हें ठीक से याद नहीं कि बचपन में उनका कान-नाक छेदन किस परिस्थिति में हुआ था, लेकिन परिवार में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. मां, दादी और नानी से मिली इस परंपरा को अपनी बच्ची तक पहुंचाना उनके लिए सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने जैसा है.
बदला ठिकाना, नहीं बदली भावनाएं
घर के आंगन में गूंजने वाले मंगलगीत अब पार्लर की दीवारों के बीच सुनाई दे रहे हैं. बच्चे के रोने की आवाज आज भी बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान ला देती है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इस खुशी में पूरा परिवार और आसपास के लोग शामिल होते थे, जबकि अब बदलती जिंदगी के बीच परिवार आधुनिक साधनों के सहारे वही परंपरा निभा रहा है.
परंपरा का ठिकाना बदल गया है, तरीका बदल गया है, लेकिन नई पीढ़ी को पुरानी विरासत से जोड़ने की भावना आज भी वही है.
