बौसी (बांका) से संजीव पाठक की रिपोर्ट
Banka Mandar Parvat History: बांका जिले का मंदार पर्वत सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और दिव्य माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह पर्वत समुद्र मंथन की महान ऐतिहासिक-धार्मिक घटना का मुख्य केंद्र रहा है. अमृत प्राप्ति के लिए जब देवताओं और दैत्यों ने समुद्र को मथा, तब मथानी के रूप में इसी मंदार पर्वत का और रज्जू (रस्सी) के रूप में वासुकी नाग का उपयोग किया गया था. मंथन के समय जब यह पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुआ) अवतार लेकर इसे अपनी पीठ पर संभाला था.
अनेक पावन ग्रंथों में मिलता है वर्णन
मंदार पर्वत की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका उल्लेख विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंद पुराण, महाभारत, शिव पुराण, गरुड़ पुराण, शतपथ ब्राह्मण, अद्भुत रामायण और रामचरितमानस जैसे कई प्रतिष्ठित ग्रंथों में विस्तार से मिलता है. महान संस्कृत कवि कालिदास ने भी अपने महाकाव्य 'कुमारसंभवम्' में मंदराचल का जिक्र किया है.
दो महान धर्मों की साझा आस्था का संगम
मंदार पर्वत का शिखर सनातन और जैन, दोनों ही धर्मों के श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र है:
- सनातन धर्म: पर्वत शिखर पर स्थित बड़े मंदिर में छह चरणचिह्न विद्यमान हैं. हिंदू धर्मावलंबी इन्हें भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती के चरणचिह्न मानकर पूजते हैं.
- जैन धर्म: जैन अनुयायी इस पवित्र स्थल को अपने 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य की तपस्या और कल्याणक भूमि के रूप में देखते हैं. वर्तमान में दोनों समुदाय इस तीर्थ की गरिमा और विकास के लिए मिलकर काम कर रहे हैं.
मधु-कैटभ वध की पौराणिक कथा
मंदार से जुड़ी एक और प्रमुख कथा दैत्य मधु और कैटभ के वध की है. मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इन महादैत्यों का वध करने के बाद, उनके द्वारा मांगे गए वरदान के अनुरूप उनके मस्तक पर अपने चरण स्थापित किए थे. इसी कारण शिखर पर मौजूद चरणचिह्नों की विशेष महत्ता है, जिसकी तुलना गया के प्रसिद्ध विष्णुपाद मंदिर से की जाती है. 16वीं शताब्दी में काला पहाड़ के आक्रमण से पूर्व भगवान मधुसूदन की मूल प्रतिमा इसी शिखर मंदिर में थी, जिसे बाद में सुरक्षा के दृष्टिकोण से नीचे बौंसी स्थित मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया.
जब काशी छोड़कर मंदार आ गए थे भगवान शिव
लोक परंपराओं के अनुसार, एक समय मंदार क्षेत्र को काशी के समान ही मोक्षदायिनी नगरी का दर्जा प्राप्त था. कथा है कि आयुर्वेदाचार्य दिवोदास की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें काशी का राज्य सौंप दिया था और स्वयं कुछ समय के लिए मंदार पर्वत पर आकर निवास करने लगे थे. यहां उन्होंने काशी विश्वनाथ स्वरूप शिवलिंग की स्थापना की थी. इसी कारण वैद्यनाथ, बासुकीनाथ और मंदार को मिलाकर इस पूरे क्षेत्र को 'त्रिलिंग क्षेत्र' भी कहा जाता है.
Banka Mandar Parvat History: इतिहासकारों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र
स्थानीय इतिहासकार उदयेश रवि ने बताया कि ब्रिटिश इतिहासकार फ्रांसिस बुकानन ने भी अपने यात्रा-वृत्तांत में मंदार पर्वत पर स्थित प्राचीन मंदिरों का विस्तृत वर्णन किया है. आज भी इस पर्वत पर स्थित प्राचीन अवशेष, प्राकृतिक गुफाएं, जलकुंड (जैसे शंख कुंड) और समुद्र मंथन से जुड़ी शिलाकृतियां इसकी पौराणिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं, जो देश-विदेश से आने वाले हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं.
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