औरंगाबाद में मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल से खेल मैदानों से दूर हो रहे युवा, मैदानों में छायी वीरानगी

कभी खेल मैदान युवाओं से गुलजार रहते थे, लेकिन आज स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने युवा पीढ़ी को इनसे दूर कर दिया है. पसीना बहाने की उम्र में युवा घंटों मोबाइल में व्यस्त हैं, जिसका बुरा असर उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ रहा है.

Smartphone Impact: कभी जिन खेल मैदानों में सुबह से शाम तक क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल और कबड्डी खेलने वाले युवाओं की चहल-पहल रहती थी, आज उन्हीं मैदानों में वीरानगी नजर आ रही है. स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने 15 से 25 वर्ष की उम्र के युवाओं को खेल मैदानों से दूर कर दिया है. पसीना बहाने और शारीरिक क्षमता विकसित करने की उम्र में बड़ी संख्या में युवा मोबाइल स्क्रीन पर घंटों चैटिंग और सोशल मीडिया में व्यस्त नजर आते हैं.

मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल का असर दिनचर्या पर

मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल का असर युवाओं की दिनचर्या और शारीरिक गतिविधियों पर भी दिखाई दे रहा है. अभिभावकों की निगरानी के अभाव में कई बच्चे और युवा लंबे समय तक मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं. स्थिति यह है कि कुछ बच्चे घर से खेलने के नाम पर निकलते हैं, लेकिन मैदान या सार्वजनिक स्थल के किसी कोने में दोस्तों के साथ मोबाइल चलाते नजर आते हैं.

खेल मैदानों में कम हुई युवाओं की चहल-पहल

समाज के प्रबुद्ध लोगों के अनुसार, स्मार्टफोन के व्यापक इस्तेमाल से पहले हाई स्कूल से विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ने वाले युवाओं में खेलों के प्रति खासा उत्साह रहता था. क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल और कबड्डी के मैदान खिलाड़ियों से भरे रहते थे. अब कई मैदानों में खिलाड़ियों की जगह मॉर्निंग वॉक करने वाले लोग या सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवा ही अधिक नजर आते हैं.

खेलों में घटती रुचि का असर प्रतिभावान खिलाड़ियों के तैयार होने पर भी पड़ रहा है. पढ़ाई और करियर को प्राथमिकता देने के कारण कई अभिभावक बच्चों को नियमित रूप से खेल मैदान में भेजने से भी परहेज करते हैं. जबकि खेल शारीरिक विकास के साथ अनुशासन, टीम भावना और मानसिक मजबूती विकसित करने का भी माध्यम है.

स्कूल स्तर पर खेलकूद को बढ़ावा देने की जरूरत

प्रखंड के कई प्रारंभिक विद्यालयों के आसपास खेल मैदान की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. इससे खेल गतिविधियां सीमित हो जाती हैं. हाई स्कूलों में भी नियमित खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन की कमी के कारण विद्यार्थियों का खेलों के प्रति आकर्षण घट रहा है. कॉलेज स्तर पर भी खेल गतिविधियों की स्थिति संतोषजनक नहीं बतायी जा रही है.

विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की कमी को भी खेलों में घटती रुचि का एक कारण माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि प्रारंभिक कक्षाओं से ही खेल की नियमित घंटी और प्रतियोगिताओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो बच्चों और युवाओं को मोबाइल की दुनिया से निकालकर खेल मैदान तक लाया जा सकता है.

क्या कहते हैं लोग

अनुज कुमार सिंह, पूर्व खिलाड़ी सह पैक्स अध्यक्ष ने कहा कि मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल का युवाओं की दिनचर्या और शारीरिक गतिविधियों पर असर पड़ रहा है. युवाओं को नियमित रूप से खेल और अन्य शारीरिक गतिविधियों से जोड़ने की जरूरत है.

रंजीत कुमार सिंह, पूर्व खिलाड़ी ने कहा कि स्कूली स्तर पर खेलों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है. पसीना बहाने की उम्र में युवा मोबाइल और चैटिंग में अधिक समय बिताएंगे, तो उनकी खेल प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर कम मिलेगा.

संजय शर्मा, पूर्व खिलाड़ी ने कहा कि युवाओं के बौद्धिक और शारीरिक विकास के लिए खेल बेहद जरूरी हैं. अभिभावकों को बच्चों की मोबाइल गतिविधियों पर निगरानी रखने के साथ उन्हें खेलों से जोड़ने की पहल करनी चाहिए.

हेमलता सिंह, प्रभारी प्रधानाध्यापक, पीएम श्री अनुग्रह उच्च माध्यमिक विद्यालय ने कहा कि स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग ने युवाओं को खेलों से दूर किया है. यह सकारात्मक संकेत नहीं है. जीवन के शुरुआती दौर से ही बच्चे और युवा खेलों से जुड़ेंगे, तभी उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर तरीके से हो सकेगा.

मदनपुर खेल मैदान | Prabhat Khabar Network

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By विनय सिंह

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