रसलपुर में महिलाओं ने नए रूप में जीवंत की चौपाल की परंपरा, शिव परिचर्चा के साथ बढ़ा सामाजिक संवाद

Aurangabad News : रसलपुर गांव की महिलाओं ने शिव परिचर्चा के जरिए पुरानी चौपाल संस्कृति को फिर से जीवित किया है, जिससे सामाजिक मेलजोल और आपसी भाईचारा बढ़ रहा है.

Aurangabad News : आधुनिक जीवनशैली और व्यस्तता के बीच गांवों से धीरे-धीरे गायब होती जा रही चौपाल की परंपरा को कुटुंबा प्रखंड के जगदीशपुर पंचायत अंतर्गत रसलपुर गांव की महिलाओं ने नए रूप में जीवंत करने की पहल की है. गांव में रोजाना शाम को महिलाएं सार्वजनिक स्थल या मंदिर परिसर में एकत्रित होती हैं और शिव परिचर्चा के साथ भजन-कीर्तन, आरती व पूजा करती हैं. धार्मिक गतिविधियों से शुरू होने वाली यह बैठक अब महिलाओं के आपसी संवाद और सामाजिक मेलजोल का भी माध्यम बन गयी है. महिलाएं पूजा-पाठ के साथ एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करती हैं और घरेलू व सामाजिक विषयों पर भी चर्चा करती हैं.

कभी गांव की पहचान हुआ करती थी चौपाल

एक समय गांवों में चौपाल सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी. मंदिर परिसर, सार्वजनिक स्थानों और बड़े पेड़ों की छांव में ग्रामीण नियमित रूप से एकत्रित होते थे. पुरुषों के साथ महिलाओं की अलग चौपाल भी लगती थी, जहां वे आपसी बातचीत के साथ एक-दूसरे की समस्याओं और जरूरतों में सहयोग करती थीं. बदलते समय के साथ ऐसी सामूहिक बैठकों का चलन कम होता गया. मोबाइल और व्यस्त दिनचर्या ने लोगों के बीच होने वाले प्रत्यक्ष संवाद को भी प्रभावित किया है. ऐसे में रसलपुर की महिलाओं की यह पहल पुरानी ग्रामीण परंपरा को नए स्वरूप में आगे बढ़ाने वाली मानी जा रही है.

भक्ति के साथ बढ़ रहा आपसी संवाद

रसलपुर गांव में पिछले कई महीनों से प्रतिदिन संध्या समय महिलाओं का जुटान हो रहा है. महिलाएं घरेलू कामकाज निपटाने के बाद मंदिर या अन्य सार्वजनिक स्थल पर पहुंचती हैं. वहां भगवान शिव की परिचर्चा के साथ भजन-कीर्तन और आरती की जाती है. इसके बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है. पूजा, आरती और प्रसाद की व्यवस्था का खर्च भी प्रतिदिन अलग-अलग महिलाएं मिलकर उठाती हैं. इससे सभी की भागीदारी बनी रहती है और धार्मिक आयोजन किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहता.

सुख-दुख बांटने का भी बन रहा मंच

शिव परिचर्चा के दौरान महिलाएं केवल धार्मिक चर्चा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में भी शामिल होती हैं. किसी परिवार में परेशानी हो या किसी को किसी तरह की जरूरत हो, इसकी जानकारी भी इसी सामूहिक बैठक के माध्यम से मिल जाती है. इससे महिलाओं के बीच अपनापन और सहयोग की भावना मजबूत हो रही है. नियमित रूप से एक साथ बैठने से आपसी मनमुटाव दूर करने और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने में भी मदद मिलती है.

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नई पीढ़ी को भी मिल रही सामूहिकता की सीख

रविवार को देवी मंदिर में आयोजित शिव परिचर्चा के दौरान सिम्पा देवी, नीलम देवी, प्रेमशिला देवी, रजनी देवी, शकुंतला देवी, रीता देवी, अनु देवी, फुलेश्वरी देवी, रामपति देवी, मुन्नी देवी, लीलावती देवी, नीता देवी, रुक्मिणी देवी, गुड़िया देवी समेत कई महिलाएं मौजूद थीं. महिलाओं ने बताया कि यह सिलसिला पिछले कई महीनों से चल रहा है और वे इसे नियमित रूप से जारी रखना चाहती हैं. उनका मानना है कि इससे नई पीढ़ी को भी सामूहिकता और सामाजिक सहयोग की सीख मिलेगी.

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धार्मिक आयोजन के साथ मजबूत हो रही सामाजिक एकजुटता

ग्रामीण चौपाल जैसी परंपराओं का सामाजिक महत्व केवल बातचीत तक सीमित नहीं है. ऐसी बैठकों से लोगों के बीच संवाद बढ़ता है, सामाजिक जिम्मेदारियों की भावना मजबूत होती है और नई पीढ़ी को सामूहिकता व सहयोग की संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है. महिलाओं की इस पहल से गांव में धार्मिक वातावरण के साथ सामाजिक एकजुटता भी बढ़ रही है. ग्रामीणों का मानना है कि इस तरह की सामूहिक गतिविधियां नियमित रूप से चलती रहें तो गांव में आपसी भाईचारा, सौहार्द और सहयोग की भावना को और मजबूती मिल सकती है.

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By अंबुज कुमार

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