ओबरा. प्रखंड के खरांटी स्थित अष्टभुजी मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना रहा है. मान्यता के अनुसार माता रानी ने यहां विश्राम किया था. सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक मदन मोहन पांडेय एवं सेवानिवृत्त शिक्षक राम लखन पांडेय ने बताया कि पूर्वजों के अनुसार लगभग 500 वर्ष पहले खरांटी निवासी बजरंग सहाय को रात में माता रानी ने स्वप्न में कहा था कि वह आप सबों की कुलदेवी है और कोलकाता कालीघाट गंगा जी में हूं. मुझे यहां से ले चलो. स्वप्न खत्म होने के बाद वे कोलकाता गये और गंगा नदी में स्नान के लिए डुबकी लगायी तो काली मां उनके हाथ में आ गयी. वहां से बैलगाड़ी से वापस खरांटी आये. इसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया. एक ब्राह्मण परिवार की कुंवारी कन्या ने खुद से वहां समाधि ली. कहा जाता है कि माता रानी ने प्राण प्रतिष्ठा के दिन मंदिर में ही विश्राम किया था. इधर, स्थानीय लोगों की माने तो जमींदारी प्रथा के समय से जमींदारों की ओर से प्रतिदिन भव्य महा आरती की जाती थी. ढोल-नगाड़े बजाये जाते थे. वैसे भी सप्तमी तिथि की मध्य रात्रि को मां निशा बलि के नाम से बकरे की बली चढ़ायी जाती है व नवमी को भक्त बली देते है. आजादी से पहले भैंसों की बली दी जाती थी. हालांकि, उस वक्त अंग्रेजों ने रोक लगा दिया था. इसके बाद बली देने वाले राधा यादव की अचानक मौत हो गयी थी. पूजा समिति के सदस्य सहजानंद कुमार उर्फ डिक्कू, चूसन पांडेय, लवकुश पांडेय, शत्रुंजय, मोहित, रोहित, विष्णु, नमन, अंकित, प्रिंस, बाल्मीकि, विक्रम, विंकटेश, रोहित, शुभम आदि ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी माता रानी की पूजा धूमधाम से की जा रही है. यहां दूर-दराज यानी कई जिले के लोग माता से मन्नत मांगने पहुंचते है और जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है तो पूरे नौ दिन मां की आराधना करते हैं.
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