गुरु पूर्णिमा पर गुरु-शिष्य परंपरा और महर्षि वेदव्यास के योगदान का किया गया स्मरण

गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया. इस दौरान गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व तथा महर्षि वेदव्यास के अविस्मरणीय योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई. यह पर्व ज्ञान, संस्कार और आत्मिक जागरण का उत्सव है.

Aurangabad News : अंबा मां सतबहिनी मंदिर न्यास समिति के तत्वावधान में गुरुवार को गुरु पूर्णिमा श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच मनाई गई. समारोह में गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व तथा महर्षि वेदव्यास के अविस्मरणीय योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई. कार्यक्रम की अध्यक्षता न्यास समिति सदस्य मिथिलेश मेहता ने, जबकि संचालन प्रो. रामजीत सिंह ने किया.

गुरु वंदना के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

समारोह की शुरुआत गुरु वंदना एवं महर्षि वेदव्यास के स्मरण के साथ हुई. वक्ताओं ने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और आत्मिक जागरण का उत्सव है. भारतीय परंपरा में गुरु को अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाला सच्चा पथप्रदर्शक माना गया है.

महर्षि वेदव्यास के योगदान पर डाला प्रकाश

मुख्य वक्ता डॉ. सुरेंद्र प्रसाद मिश्र ने कहा कि गुरु पूर्णिमा भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है. उन्होंने बताया कि महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन कर उन्हें व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया तथा महाभारत, ब्रह्मसूत्र और अठारह पुराण जैसे महान ग्रंथों की रचना की. वक्ताओं ने कहा कि आषाढ़ पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व मनुष्य को आत्मचिंतन, ज्ञानार्जन और गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देता है. गुरु के मार्गदर्शन से ही व्यक्ति का जीवन सार्थक, अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बनता है.


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By Ambuj kumar

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