Aurangabad Jitiya Lokotsav: बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने वर्ष 2026 का सांस्कृतिक कैलेंडर जारी कर दिया है. इस बार दाउदनगर के ऐतिहासिक जिउतिया लोकोत्सव को पहली बार राज्य के सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल किया गया है. इसे दाउदनगर की सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपरा के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.
हालांकि, फिलहाल इस आयोजन के लिए किसी प्रकार की वित्तीय सहायता की राशि निर्धारित नहीं की गई है, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि अगले चरण में इसे भी अनुदान स्वीकृत किया जाएगा.
औरंगाबाद के 10 प्रमुख आयोजनों को मिला स्थान
विभाग द्वारा जारी सांस्कृतिक कैलेंडर में औरंगाबाद जिले के अंबे उत्सव, गजना महोत्सव, सूर्य रथ महोत्सव, देवकुंड महोत्सव, पुनपुन महोत्सव, सूर्य महोत्सव, सोननद महोत्सव, मां सतचंडी धाम महोत्सव, पितृपक्ष महोत्सव के साथ जिउतिया लोकोत्सव को भी शामिल किया गया है.
चार दिवसीय जिउतिया लोकोत्सव को पहली बार आधिकारिक स्थान मिला है. अन्य आयोजनों के लिए दो लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक की अनुदान राशि निर्धारित की गई है, जबकि जिउतिया लोकोत्सव के लिए वित्तीय सहायता का निर्णय अभी शेष है.
15 दिन पहले देनी होगी कार्यक्रम की सूचना
कला एवं संस्कृति विभाग की निदेशक रूबी द्वारा जारी अधिसूचना में सभी जिलाधिकारियों, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारियों एवं संबंधित संस्थाओं को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों का विस्तृत विवरण समय पर विभाग को उपलब्ध कराएं. साथ ही कार्यक्रम के उद्घाटन से कम से कम 15 दिन पहले आवश्यक सूचनाएं विभाग को भेजना सुनिश्चित करें.
'नकल पर्व' के नाम से भी प्रसिद्ध है जिउतिया
दाउदनगर का जिउतिया पर्व अपनी अनूठी परंपरा और सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण पूरे बिहार में अलग पहचान रखता है. सितंबर-अक्टूबर में आयोजित होने वाले इस पर्व को स्थानीय स्तर पर 'नकल पर्व' के नाम से भी जाना जाता है.
करीब आठ से नौ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में पूरा शहर सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक झांकियों और साहसिक नकल प्रस्तुतियों से जीवंत हो उठता है. शहर के चार प्रमुख चौकों पर स्थापित भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमाओं की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है. अंतिम तीन दिनों में यह उत्सव अपने चरम पर पहुंच जाता है.
स्थानीय मान्यताओं और प्रचलित झूमर गीतों के अनुसार दाउदनगर में जिउतिया पर्व की शुरुआत संवत 1917 (वर्ष 1860) में हुई थी. इसी वजह से इसे क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है.
नगर परिषद के प्रयासों से मिली नई पहचान
नगर परिषद दाउदनगर की मुख्य पार्षद अंजलि कुमारी ने इस उपलब्धि के लिए लगातार प्रयास किए. उनके प्रयासों से जिउतिया लोकोत्सव को लोक उत्सव का दर्जा मिलने के साथ बिहार सरकार के सांस्कृतिक कैलेंडर में स्थान प्राप्त हुआ.
मुख्य पार्षद ने इस उपलब्धि पर दाउदनगर की जनता, जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं स्थानीय लोक कलाकारों का आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि जिउतिया दाउदनगर की सांस्कृतिक पहचान है और इसे राज्य के सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल किया जाना पूरे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है. उन्होंने विश्वास जताया कि इससे जिउतिया लोकोत्सव को नई पहचान मिलेगी और इसकी समृद्ध परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहेगी.
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