Batre River Crisis: (अम्बुज पांडेय) बिहार और झारखंड के सैकड़ों गांवों की प्यास बुझाने वाली तथा हजारों एकड़ खेतों की सिंचाई का आधार रही बतरे नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. कभी सालभर कल-कल बहने वाली यह नदी अब बरसात के दिनों में भी सूखी नजर आती है. अतिक्रमण, अवैध बालू खनन, कूड़ा-कचरे के अंबार और प्रशासनिक उदासीनता ने इस प्राकृतिक धरोहर को संकट में डाल दिया है.
झारखंड के देवगन धाम से निकलती है बतरे नदी
बतरे नदी का उद्गम झारखंड के छत्तरपुर प्रखंड स्थित प्रसिद्ध देवगन धाम के पहाड़ी क्षेत्र से माना जाता है. मंदिर परिसर के समीप स्थित जलस्रोतों से निकलकर यह नदी तिलहरवा, रेंगनिया, पीपरा बाजार, बभंडी और गहोरा होते हुए बिहार में प्रवेश करती है. आगे चलकर अंबा बाजार, घेउरा और करकटा के पास दोमुहान संगम स्थल पर बटाने नदी में समाहित हो जाती है.
कभी सिंचाई की रीढ़ थी बतरे नदी
वर्ष 1957 में बिहार सरकार ने गेरूआ पहाड़ के समीप बतरे वेयर का निर्माण कराया था. इससे निकली नहरों के जरिए हरिहरगंज और कुटुंबा प्रखंड के दर्जनों गांवों में सिंचाई होती थी. बिहार-झारखंड विभाजन के बाद यह व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो गई और आज नदी स्वयं पानी के लिए तरस रही है.
अतिक्रमण और अवैध खनन ने बिगाड़ा स्वरूप
स्थानीय लोगों का कहना है कि नदी के दोनों किनारों पर लगातार अतिक्रमण हुआ है. कई स्थानों पर कूड़ा-कचरा फेंकने और मिट्टी भरने से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो गया है. अनियंत्रित बालू उठाव के कारण नदी का तल प्रभावित हुआ है. परिणामस्वरूप नदी उथली होती जा रही है और उसमें जंगली घास तथा सेवार उग आए हैं.
दुबटिया मोड़ का क्रशर प्लांट बना अभिशाप
झारखंड के दुबटिया मोड़ के समीप संचालित क्रशर प्लांटों को नदी के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि नदी के भूभाग के भीतर कई क्रशर प्लांट और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्थापित कर दिए गए हैं. इससे नदी का प्राकृतिक स्वरूप लगातार प्रभावित हो रहा है और जलधारा सिकुड़ती जा रही है.
भूजल स्तर में आई भारी गिरावट
बतरे नदी के सूखने का असर आसपास के गांवों में भूजल स्तर पर भी पड़ा है. जहां पहले 20 से 25 फीट की गहराई पर कुएं और चापाकल से पानी मिल जाता था, वहीं अब लोगों को 100 से 150 फीट तक बोरिंग करानी पड़ रही है. इससे पेयजल संकट भी गहराने लगा है.
नदी बचाने के लिए जनआंदोलन की जरूरत
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि यदि समय रहते बतरे नदी को बचाने की पहल नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में इसका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है. नदी की सफाई, अतिक्रमण हटाने, अवैध खनन रोकने और जल संरक्षण कार्यों की तत्काल आवश्यकता है.
क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ
पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता अनिरुद्ध कुमार वर्मा के अनुसार किसी भी प्राकृतिक नदी के प्रवाह को बाधित करना या उसके भूभाग पर अवैध कब्जा करना कानूनन अपराध है. बिना अनुमति बालू और मिट्टी का उत्खनन भी दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है. उन्होंने कहा कि नदियों के संरक्षण के लिए प्रशासन को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और समाज को भी जागरूक होकर आगे आना होगा.
पर्यावरण और अस्तित्व दोनों का सवाल
बतरे नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि बिहार और झारखंड के सैकड़ों गांवों की जीवनरेखा है. यदि इसे बचाने के लिए व्यापक अभियान नहीं चलाया गया तो आने वाली पीढ़ियां इस नदी को केवल इतिहास के पन्नों में पढ़ेंगी.
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