पटना. पटना विश्वविद्यालय के पीजी हिंदी विभाग में पीएचडी छात्रों का हाल ऐसा है कि जिनका तीन वर्ष पहले 2013 में प्री-पीएचडी हुआ था उनका भी अब तक पीएचडी पाठ्यक्रम शुरू नहीं हो सका है. पत्रकारिता एवं जनसंचार के सभी छात्रों के पीएचडी को रोक कर रखा गया है, जबकि वे सारी प्रक्रिया पार कर पिछले दो वर्षों से रजिस्ट्रेशन का इंतजार कर रहे हैं. विभाग से जब भी छात्र पूछने जाते हैं तो छात्रों को टका सा जवाब मिलता है कि प्रोसेस में है. कभी कहा जाता है कि गाइड नहीं है तो कभी कहा जाता है कि आप लोगों का यहां से पीएचडी नहीं हो सकता. विभागाध्यक्ष की मनमानी पर ही यहां छात्रों का भविष्य निर्भर करता है. वहीं विवि इस मामले में मौन हैं.
दरवाजा खटखटाया, पर जस का तस: छात्रों ने इस मामले को लेकर रजिस्ट्रार, प्रतिकुलपति से लेकर कुलपति तक का दरवाजा खटखटाया और हर जगह आवेदन भी दिये, लेकिन अब भी मामला जस का तस है. उधर, छात्रों को इस बात कि चिंता सतायी जा रही है कि उनके भविष्य का क्या होगा, क्योंकि पटना विश्वविद्यालय को छोड़ वे किसी दूसरी यूनिवर्सिटी में जा भी नहीं सकते हैं क्योंकि उन्होंने पीआरटी की परीक्षा यहीं से पास की है. अब सवाल यह उठता है कि विवि ने अगर टेस्ट लिया है तो फिर पीएचडी कराने में समस्या क्या है.
पासआउट को पीएचडी कराने में परेशानी : विभागाध्यक्ष प्रो मटुकनाथ चौधरी कभी गाइड नहीं होने की बात करते हैं. वहीं वे फिर खुद ही नोटिस निकालते हैं जिसमें लिखा होता है कि करीब आठ से 10 सीटें वहां खाली हैं. इसके बावजूद उनके द्वारा जानबूझ कर सभी पीआरटी उतीर्ण छात्रों का सिनाप्सिस रोक कर रखा गया है. वे हिंदी के नये आवेदनों से ही उसे भी भरना चाहते हैं.
जबकि पत्रकारिता के साथ ही सिनाप्सिस जमा करने वाले हिंदी के सभी छात्रों को पूर्व में रजिस्टर्ड किया जा चुका है. पत्रकारिता के दो छात्र भी वहां पहले से पीएचडी कर रहे हैं. ऐसे में आखिर पत्रकारिता के पीआरटी पास छात्रों को पीएचडी कराने में क्या परेशानी है और विभागाध्यक्ष को इन छात्रों के साथ क्या खुन्नस है यह समझ से पड़े है. पूछने पर वे तरह तरह के नियम बताते हैं. कभी गाइड नहीं होने का बहाना बताते हैं.
