Arrah News : आरा जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक गंभीर स्थिति सामने आई है, जहां बड़ी संख्या में निजी जांच केंद्र और अस्पताल बिना किसी वैध निबंधन के संचालित हो रहे हैं. यह अवैध संचालन न सिर्फ सरकारी नियमों की खुलेआम अनदेखी है, बल्कि मरीजों की जान के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि प्रशासन की जानकारी में होने के बावजूद इन पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है.
हर गली में खुल रहे अस्पताल और जांच घर
जिले के शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण बाजारों तक, लगभग हर गली में निजी अस्पताल और जांच केंद्र खुले हुए हैं. संचालकों ने गांव-गांव में अपने दलाल भी नियुक्त कर रखे हैं, जो सीधे-साधे और गरीब मरीजों को बहला-फुसलाकर इन केंद्रों तक लाते हैं. यहां पहुंचते ही मरीजों से मोटी रकम वसूली जाती है और कई बार गलत इलाज या लापरवाही के कारण उनकी स्थिति और बिगड़ जाती है.
सिर्फ 150 संस्थानों का ही हुआ है रजिस्ट्रेशन
जानकारी के अनुसार, पूरे जिले में केवल करीब 150 निजी अस्पताल, क्लीनिक और जांच केंद्रों का ही निबंधन कराया गया है. इनमें भी 9 संस्थानों का नवीकरण अब तक लंबित है. इसके बावजूद हजारों की संख्या में बिना रजिस्ट्रेशन वाले संस्थान धड़ल्ले से चल रहे हैं. अकेले आरा शहर में ही 300 से अधिक निजी अस्पताल और पैथोलॉजी लैब संचालित हो रहे हैं.
मामूली शुल्क के बावजूद नहीं करा रहे रजिस्ट्रेशन
सरकार ने निजी अस्पताल और जांच केंद्रों के रजिस्ट्रेशन के लिए बेहद कम शुल्क निर्धारित किया है. जांच केंद्र के लिए महज 200 रुपये सालाना और अस्पताल के लिए बेड की संख्या के आधार पर 100 से 1200 रुपये तक शुल्क तय है. इसके बावजूद संचालक नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे सरकार को हर साल लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है.
मानकों की अनदेखी, बिना डॉक्टर के हो रहा इलाज
सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी निजी अस्पताल के संचालन के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्स, कंपाउंडर और साफ-सफाई की व्यवस्था जरूरी है. लेकिन हकीकत यह है कि कई अस्पतालों में डॉक्टर तक मौजूद नहीं होते. अप्रशिक्षित स्टाफ के भरोसे मरीजों का इलाज किया जा रहा है, जो बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.
गंभीर हालत में सरकारी अस्पताल भेजे जाते हैं मरीज
कई मामलों में देखा गया है कि जब मरीज की हालत ज्यादा बिगड़ जाती है, तो निजी अस्पताल के संचालक उन्हें सरकारी अस्पताल भेज देते हैं. तब तक मरीज की स्थिति काफी नाजुक हो चुकी होती है, जिससे इलाज में भी दिक्कत आती है और जान का खतरा बढ़ जाता है.
सिविल सर्जन ने दिए जांच के निर्देश
इस पूरे मामले पर सिविल सर्जन डॉ शिवेंद्र कुमार सिंहा ने कहा है कि बिना निबंधन चल रहे संस्थानों की जांच कराई जाएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी. हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जांच के दौरान कई बार संचालकों द्वारा विरोध किया जाता है, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो जाती है.
कार्रवाई नहीं होने से बढ़ रहा मनोबल
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की ढिलाई के कारण ऐसे अवैध कारोबारियों का मनोबल लगातार बढ़ रहा है. अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है.
