Arrah Panchayati Nyayalaya: गांव में ही लोगों को सुलभ न्याय दिलाने के उद्देश्य से पंचायतों में पंचायत न्यायालयों की व्यवस्था की गयी है. सरपंच और पंचों को कानूनी मामलों में सहयोग देने के लिए न्याय मित्रों की बहाली भी की गयी है. इसके लिए विधि स्नातक होना अनिवार्य है. लेकिन बड़हरा प्रखंड समेत जिले के कई पंचायत न्यायालयों में न्याय मित्रों के नियमित रूप से नहीं पहुंचने की शिकायत सामने आ रही है. इससे पंचायत स्तर पर न्याय दिलाने की सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं.
प्रतिदिन पंचायत न्यायालय जाने का है प्रावधान
न्याय मित्रों को प्रतिदिन पंचायत न्यायालयों में जाने का नियम है, ताकि ग्रामीणों की ओर से लाये गये मामलों का नियमानुसार निपटारा हो सके. न्याय मित्र सरपंच और पंचों को यह निर्धारित करने में कानूनी सलाह देते हैं कि ग्राम कचहरी के समक्ष पेश किया गया मामला अधिनियम की धारा 106, 110, 111 और 113 के तहत उसके अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं.
इसके साथ ही न्याय मित्र यह भी सलाह देते हैं कि दायर मुकदमा विचारणीय है या नहीं और ग्राम कचहरी की किसी पीठ द्वारा उस पर संज्ञान लिया जा सकता है या नहीं. हालांकि, धरातल पर स्थिति अलग बतायी जा रही है. आरोप है कि न्याय मित्र पंचायत न्यायालयों में लगभग नहीं के बराबर पहुंचते हैं.
पूर्वी गुंडी के सरपंच ने न्याय मित्र के खिलाफ दिया आवेदन
बड़हरा प्रखंड के पूर्वी गुंडी के सरपंच ने अपने पंचायत के न्याय मित्र के खिलाफ जिला पंचायती राज पदाधिकारी को आवेदन दिया है. आवेदन में आरोप लगाया गया है कि न्याय मित्र ग्राम कचहरी में नहीं आते हैं, जिससे कामकाज प्रभावित हो रहा है.
सरपंच ने यह भी आरोप लगाया है कि अनुपस्थिति दर्ज नहीं करने पर उन्हें एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा करने की धमकी दी जाती है. सरपंच के अनुसार, उन्हें अनुपस्थिति दर्ज करने के लिए कहा जाता है. मामले को लेकर सरपंच ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, व्यवहार न्यायालय, आरा को भी सनहा देकर अपनी जान को खतरा बताते हुए पूरी जानकारी दी है.
कई पंचायतों में व्यवस्था प्रभावित होने का आरोप
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाया जा रहा है कि अधिकांश सरपंचों और न्याय मित्रों के बीच आपसी समझ है. आरोप है कि न्याय मित्रों की ओर से सरपंचों को चढ़ावा दिया जाता है और वे ग्राम कचहरी में नहीं जाते हैं. हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.
न्याय मित्रों के निर्धारित दिन पंचायत न्यायालयों में नहीं पहुंचने से पंचायत स्तर पर लोगों को न्याय दिलाने की व्यवस्था प्रभावित होने की बात कही जा रही है. ग्रामीण अपनी समस्याओं को लेकर पंचायत न्यायालय जाने के बजाय सीधे थाना या व्यवहार न्यायालय का रुख कर रहे हैं.
पंचायत न्यायालयों पर बढ़ रहा मामलों का बोझ
पंचायत न्यायालयों का गठन छोटे-मोटे मामलों के निपटारे और व्यवहार न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ कम करने के उद्देश्य से किया गया है. ऐसे में पंचायत न्यायालयों में न्याय मित्रों की नियमित उपस्थिति नहीं होने से व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है.
जिले में पंचायत न्यायालयों में प्रतिदिन औसतन 10 से 12 मामले आने की बात कही जा रही है. लेकिन वर्षों से कई मामलों में फैसला नहीं होने के कारण लोग पंचायत न्यायालयों में मामले ले जाने से भी असुविधा महसूस कर रहे हैं.
कई पदों पर काम करने वाले न्याय मित्रों को लेकर भी सवाल
सबसे अहम सवाल उन न्याय मित्रों को लेकर उठाया जा रहा है, जो न्याय मित्र के साथ अपर लोक अभियोजक और नोटरी पदाधिकारी के रूप में भी कार्य कर रहे हैं. सवाल है कि यदि वे अन्य पदों की जिम्मेदारी निभाते हैं तो पंचायत न्यायालयों में नियमित रूप से कैसे उपस्थित होते हैं.
नियम के अनुसार न्याय मित्रों को प्रतिदिन पंचायत न्यायालयों में जाना है. ऐसे में उनकी उपस्थिति और पंचायत न्यायालयों से संबंधित कार्यों की स्थिति की जांच का विषय बताया जा रहा है.
जिले में 226 पंचायत, दो में न्याय मित्र का पद खाली
जिले में कुल 226 पंचायतें हैं और इन पंचायतों में पंचायत न्यायालय कार्यरत हैं. हालांकि, जिले की दो पंचायतों में न्याय मित्र का पद खाली है. इन पदों पर बहाली की प्रक्रिया नहीं की जा रही है. वहीं, शेष पंचायतों में न्याय मित्रों की बहाली की गयी है.
बीपीआरओ और डीपीआरओ से कर सकते हैं शिकायत
पंचायत न्यायालयों में न्याय मित्रों के नहीं पहुंचने की स्थिति में प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी, जिला पंचायती राज पदाधिकारी और जिला पदाधिकारी से शिकायत की जा सकती है. शिकायत के माध्यम से पंचायत न्यायालयों की व्यवस्था को दुरुस्त करने और न्याय मित्रों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की मांग की जा सकती है.
