आरा. भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी को मनाया जाने वाला प्रकृति का पर्व करमा मंगलवार को जिले भर में श्रद्धा, उल्लास और उमंग के साथ मनाया गया. पर्व को लेकर पूजा स्थलों को आकर्षक तरीके से सजाया-संवारा गया था. सोमवार को पर्व के अनुष्ठान को लेकर बहनों ने नहाय-खाय के साथ पर्व की शुरुआत की. मंगलवार को बहनों ने भाइयों की खुशी एवं सुरक्षा और उनकी लंबी उम्र की कामना को लेकर उपवास रखकर व्रत का अनुष्ठान किया.
करम डाल स्थापित कर की गयी पूजा-अर्चना
पर्व के दौरान घर के आंगन में करम का पौधा रखा गया. मिट्टी से शंकर-पार्वती की प्रतिमा बनाकर उसे प्रकृति के उपहारों से सजाया गया. इसके अलावा बहनों ने माता पार्वती, गौरी, गणेश और भगवान श्रीहरि विष्णु की भी पूजा-अर्चना की. युवतियां प्रकृति की पूजा कर अच्छी फसल के लिए भी ईश्वर से कामना करती नजर आयीं.
फसलों की सुरक्षा के लिए भी होती है प्रकृति की पूजा
करमा पर्व में खेतों में बोयी गयी फसलों की सुरक्षा की कामना के साथ प्रकृति की पूजा की जाती है. इस अवसर पर एक बर्तन में बालू भरकर उसे कलात्मक तरीके से सजाया जाता है. पर्व शुरू होने के कुछ दिन पहले इसमें जौ डाल दिये जाते हैं, जिसे जावा कहा जाता है. बहनें इसी जावा को अपने बालों में गूंथकर झूमती-नाचती हैं.
भाई करम वृक्ष की डाल लेकर घर के आंगन या खेतों में गाड़ते हैं. इसे प्रकृति के आराध्य देव के रूप में मानकर पूजा की जाती है. पर्व मनाने वाले दिनभर उपवास रखकर सगे-संबंधियों और पड़ोसियों को भी निमंत्रण देते हैं.
निर्जला व्रत रखकर सुनी कर्मा-धर्मा की कथा
पर्व के दौरान बहनें दिनभर व्रत पर रहीं और शाम को पूजा स्थल पर एकत्रित हुईं. झुर के समीप बैठकर महिलाओं ने कर्मा-धर्मा की कथा सुनी. पूजा-अर्चना के बाद पर्व का समापन किया गया. इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रीति-रिवाज और लोक आस्था की झलक देखने को मिली.
ढोल-मांदर की थाप पर झूमे ग्रामीण
पर्व के दौरान करम वृक्ष की डाली को घर के आंगन में स्थापित किया गया. इसके बाद महिलाओं ने पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की. पूजा के बाद ढोल और मांदर की थाप पर महिलाएं और ग्रामीण झूमते-नाचते नजर आये. आधुनिक गीतों के साथ पारंपरिक लोकगीत और नृत्य ने पर्व के माहौल को और रंगीन बना दिया.
