आरा का राजकीय संस्कृत विद्यालय 15 वर्षों से बंद, खंडहर में तब्दील हुआ भवन और अतिक्रमण की जद में जमीन

आरा का राजकीय संस्कृत विद्यालय, जिसे बिहार के पहले मुख्यमंत्री ने स्थापित किया था, आज 15 वर्षों से बंद पड़ा है. कभी ज्ञान का केंद्र रहा यह विद्यालय अब खंडहर बन चुका है और इसकी कीमती जमीन पर अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है. संस्कृत प्रेमियों और स्थानीय लोगों में प्रशासनिक उपेक्षा को लेकर गहरा रोष है.

Arrah Sanskrit school: जहां कभी संस्कृत के श्लोक गूंजा करते थे और संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए ज्ञान की धारा प्रवाहित होती थी, आज वहां वीरानगी छायी है. आरा का राजकीय संस्कृत विद्यालय लंबे समय से बंद है और इसका भवन अब खंडहर में तब्दील हो चुका है. संस्कृत पढ़ने की लालसा रखने वाले जिले के विद्यार्थियों को अब यहां पढ़ाई की सुविधा नहीं मिल रही है.

बताया जाता है कि विद्यालय परिसर में करीब एक एकड़ जमीन थी. अब यह जमीन भी अतिक्रमण की चपेट में है. स्थानीय स्तर पर आरोप है कि विद्यालय की जमीन पर जमीन के धंधेबाजों की नजर है और इसे बेचने का प्रयास किया जा रहा है.

बिहार के पहले मुख्यमंत्री ने करायी थी विद्यालय की स्थापना

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने वर्ष 1953 से 1956 के बीच राज्य में 16 राजकीय संस्कृत विद्यालयों की स्थापना करायी थी. इनमें से पांच विद्यालय झारखंड चले गये. बिहार में बचे 11 राजकीय संस्कृत विद्यालयों में आरा का राजकीय संस्कृत विद्यालय भी शामिल है.

एक समय राजकीय संस्कृत विद्यालय में पढ़ना और पढ़ाना गौरव की बात मानी जाती थी. लेकिन शिक्षकों और प्राचार्य के सेवानिवृत्त होने के बाद विद्यालय की स्थिति लगातार खराब होती चली गयी.

15 वर्षों से बंद है राजकीय संस्कृत विद्यालय

राजकीय संस्कृत विद्यालय करीब 15 वर्षों से बंद है. लंबे समय से बंद रहने के कारण विद्यालय का पूरा परिसर बदहाल हो चुका है और भवन खंडहर में तब्दील हो गये हैं. विद्यालय की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

संस्कृत भाषा के प्रेमियों में प्रशासनिक और विभागीय लापरवाही को लेकर काफी नाराजगी है. लोगों का कहना है कि जिस संस्थान से कभी संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा मिलता था, आज उसका अस्तित्व ही संकट में है.

संस्कृत के प्रति उदासीनता से विद्यालयों की स्थिति बदहाल

संस्कृत को देश की प्राचीन भाषाओं में से एक माना जाता है. भारतीय संस्कृति और परंपरा को जीवंत रखने के उद्देश्य से संस्कृत विद्यालयों की स्थापना की गयी थी, ताकि विद्यार्थी संस्कृत का अध्ययन कर सकें.

स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले 25 से 30 वर्षों में संस्कृत शिक्षा के प्रति उदासीन रवैये के कारण संस्कृत विद्यालयों का विकास नहीं हो सका. कई विद्यालयों का अस्तित्व भी संकट में है. लोगों का सवाल है कि जब बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड खुद समस्याओं से जूझ रहा है, तो संस्कृत विद्यालयों का विकास कैसे होगा.

जमीन पर भी अतिक्रमण का खतरा

राजकीय संस्कृत विद्यालय की करीब एक एकड़ जमीन पर अतिक्रमण का खतरा बताया जा रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार, विद्यालय की जमीन पर जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों की नजर है. जमीन को बेचने के प्रयास की भी बात कही जा रही है.

लोगों की मांग है कि शिक्षा विभाग और प्रशासन विद्यालय की जमीन और भवन की स्थिति की जांच कराये तथा अतिक्रमण से बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाये.


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By नरेद्र प्रसाद सिंह

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