केंद्र और राज्य सरकार जहां स्वच्छ भारत मिशन एवं लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान फेज-2 के माध्यम से गांवों को स्वच्छ और कचरा मुक्त बनाने का दावा कर रही है, वहीं कोइलवर प्रखंड के गोपालपुर पंचायत में यह अभियान दम तोड़ता नजर आ रहा है.
सरकारी अभिलेखों के अनुसार पंचायत में स्वच्छता व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए 31.74 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि स्वच्छता कर्मियों को प्रतिमाह पचास हजार रुपये से अधिक मानदेय दिए जा रहे हैं. लेकिन धरातल पर न तो नियमित कचरा उठाव हो रहा है और न ही वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट संचालित है. ऐसे में लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद ग्रामीणों को योजना का लाभ नहीं मिल रहा है.
वर्तमान स्थिति यह है कि महीनों से घर-घर कचरा उठाव बंद है और वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट के मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ है. कचरा संग्रहण बंद होने से पंचायत के अधिकांश वार्डों में लोग खुले स्थानों पर कचरा फेंकने को विवश हैं. जगह-जगह गीला और सूखा कचरा जमा रहने से दुर्गंध फैल रही है तथा मच्छर और मक्खियों के प्रकोप के कारण संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है.
मानदेय नहीं मिलने से प्रभावित हुई व्यवस्था और अधिकारियों का पक्ष
पंचायत स्वच्छता पर्यवेक्षक संतोष कुमार ने बताया कि अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई तक जाने के लिए रास्ता नहीं होने के कारण कचरा उठाव बाधित है. उन्होंने कहा कि दिसंबर 2024 में नियुक्ति के बाद अब तक केवल चार माह का मानदेय मिला है, जबकि 13 माह का मानदेय बकाया है.
उन्होंने कहा कि लंबे समय से वेतन नहीं मिलने से कर्मचारियों के लिए परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है. वहीं, पंचायत सचिव चंदन कुमार ने कचरा उठाव बंद होने के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पंचायत में नियमित रूप से सफाई कराई जाती है और उसकी फोटो प्रतिदिन पोर्टल एवं ग्रुप में अपलोड की जाती है.
उन्होंने कहा कि यदि किसी वार्ड में सफाई नहीं होने की शिकायत सही पाई जाती है तो संबंधित स्वच्छता पर्यवेक्षक के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने यह भी बताया कि वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट जिस भूमि पर बनाई गई है, वह दान में प्राप्त हुई थी, लेकिन उसका निबंधन अब तक राज्यपाल के नाम से नहीं हो पाया है.
ग्रामीणों के गंभीर आरोप और उच्चस्तरीय जांच की मांग
स्थानीय ग्रामीण राजीव कुमार का आरोप है कि अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई निजी जमीन पर किसी खास व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बनाई गई.
उनका कहना है कि पंचायत में पिछले एक वर्ष से घर-घर कचरा उठाव लगभग बंद है, जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है.
कागजों में लाखों की व्यवस्था और खर्च का विवरण
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार पंचायत के 2506 घरों से सूखा एवं गीला कचरा एकत्र करने की व्यवस्था बनाई गई थी. जिसके अंतर्गत पंचायत में 10 जोड़ी सामुदायिक डस्टबिन, 2506 घरों के लिए दो-दो घरेलू डस्टबिन, 12 पैडल रिक्शा, एक ई-रिक्शा, 10 सामुदायिक सोख्ता, 79 एसबीएम चैंबर, 28 आउटलेट पॉइंट तथा एक वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट का निर्माण कराया गया. इन सभी मदों पर कुल 31.74 लाख रुपये खर्च किए गए.
जबकि पंचायत में प्रत्येक घर से सूखे-गीले कचरे को एकत्र करने के लिए प्रत्येक वार्ड में एक स्वच्छता कर्मी की बहाली है. उन्हें प्रत्येक महीने 3000 रुपये दिए जाते हैं. वहीं ई-रिक्शा संचालक को 3000 रुपये प्रति महीने दिए जाते हैं. वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट में दो कर्मियों को तीन-तीन हजार रुपये प्रति महीना दिया जाता है.
पंचायत स्वच्छता पर्यवेक्षक को 7500 रुपये प्रत्येक महीने दिए जाते हैं. इस तरह स्वच्छता पर मानदेय पचास हजार रुपये प्रति माह खर्च हो रहा है.
हालांकि मौके पर वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट बंद मिली. पंचायत में लगाए जाने वाले सामुदायिक डस्टबिन भी अधिकांश स्थानों पर दिखाई नहीं दिए. कई सामुदायिक सोख्ता उपयोग में नहीं हैं और नालियों का पानी आज भी सड़कों पर बहता देखा जा सकता है. वहीं 28 आउटलेट पॉइंट भी धरातल पर स्पष्ट रूप से नजर नहीं आए.
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