ये वही पुरानी सोच, नस्लीय भेदभाव पर उसमन ख्वाजा का दर्द भरा बयान, जानें पूरा मामल

Usman Khawaja on Racial stereotyping: ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज बल्लेबाज उसमन ख्वाजा ने सिडनी टेस्ट के बाद संन्यास का ऐलान किया. एशेज सीरीज में चोट के बाद मिली आलोचनाओं पर उन्होंने कहा कि उनके साथ नस्लीय स्टीरियोटाइप जैसा व्यवहार हुआ. ख्वाजा का मानना है कि दूसरे खिलाड़ियों को ऐसी आलोचना का सामना नहीं करना पड़ता.

By Aditya Kumar Varshney | January 2, 2026 9:54 AM

Usman Khawaja on Racial stereotyping: ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी बल्लेबाज उसमन ख्वाजा (Usman Khawaja) ने इंग्लैंड के खिलाफ सिडनी में खेले जाने वाले पांचवें एशेज टेस्ट (Ashes Test) के बाद अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया है. इस फैसले के साथ ही उन्होंने अपने करियर के सबसे कठिन पलों और आलोचनाओं पर खुलकर बात की. खासतौर पर एशेज सीरीज की शुरुआत में पीठ में चोट लगने के बाद जिस तरह उन्हें निशाना बनाया गया उससे वह काफी आहत नजर आए. ख्वाजा ने साफ कहा कि उन्हें उनके पूरे करियर में अलग नजर से देखा गया और कई बार नस्लीय सोच का भी सामना करना पड़ा.

सिडनी टेस्ट के बाद खत्म होगा सुनहरा सफर

39 साल के उसमन ख्वाजा सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर अपना आखिरी टेस्ट खेलेंगे. उन्होंने 87 टेस्ट मैचों में 6206 रन बनाए हैं जिसमें 16 शतक और 28 अर्धशतक शामिल हैं. उनका औसत 43.39 रहा जो उनकी निरंतरता और क्लास को दर्शाता है. शुक्रवार को एससीजी में करीब 50 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने संन्यास की पुष्टि की. यह पल उनके लिए भावनात्मक रहा क्योंकि उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट को अपनी पहचान और गर्व बताया.

एशेज की शुरुआत में चोट और विवाद

एशेज सीरीज के पहले टेस्ट से पहले ख्वाजा पीठ में ऐंठन की समस्या से जूझ रहे थे. इसी दौरान उनके गोल्फ खेलने को लेकर सवाल उठाए गए. पर्थ टेस्ट में वह दूसरी पारी में ओपनिंग भी नहीं कर सके. इसके बाद मीडिया और पूर्व खिलाड़ियों ने उनकी तैयारी और प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े किए. ख्वाजा ने कहा कि चोट उनके नियंत्रण में नहीं थी लेकिन आलोचना बहुत निजी स्तर तक चली गई.

नस्लीय स्टीरियोटाइप पर खुला बयान

ख्वाजा ने स्वीकार किया कि वह हमेशा खुद को अलग महसूस करते रहे. उन्होंने कहा कि वह रंगीन खिलाड़ी हैं और ऑस्ट्रेलियाई टीम का हिस्सा होने के बावजूद उनके साथ अलग व्यवहार हुआ. उनके मुताबिक आलसी होना टीम के प्रति प्रतिबद्ध न होना और सिर्फ खुद के बारे में सोचना जैसे आरोप वही पुराने नस्लीय स्टीरियोटाइप हैं जिनका उन्होंने जीवन भर सामना किया. उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि आधुनिक दौर में भी यह सोच पूरी तरह खत्म नहीं हुई.

दूसरे खिलाड़ियों से तुलना पर नाराजगी

उसमन ख्वाजा ने उदाहरण देते हुए कहा कि कई खिलाड़ी मैच से पहले गोल्फ खेलते हैं या चोटिल होते हैं लेकिन उन पर कोई सवाल नहीं उठता. कुछ खिलाड़ी तो मैच से एक रात पहले शराब भी पीते हैं और तब भी मीडिया उन्हें ऑस्ट्रेलियाई लारिकिन कहकर छोड़ देता है. लेकिन जब वह चोटिल हुए तो उनकी साख और चरित्र पर हमला किया गया. यही बात उन्हें सबसे ज्यादा परेशान करती रही.

संघर्ष और विरासत

ख्वाजा ने माना कि उन्हें हर दिन इस सोच से लड़ना पड़ता है. यह संघर्ष थकाने वाला है लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. ऑस्ट्रेलिया के लिए टेस्ट खेलने वाले पहले मुस्लिम क्रिकेटर के रूप में उन्होंने कई बाधाएं पार कीं. उनका करियर सिर्फ रनों का नहीं बल्कि हिम्मत और पहचान की लड़ाई का भी प्रतीक है. सिडनी टेस्ट के साथ एक शानदार अध्याय बंद होगा लेकिन उनका बयान ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में आत्ममंथन की जरूरत जरूर पैदा करता है.

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