योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर उठाया श्रीकृष्णजन्मभूमि का मसला, क्या औरंगजेब के आदेश से तोड़ा गया था केशवमंदिर?

Yogi Adityanath On Mandir-Masjid Debate : राम और कृष्ण भारतीय समाज के दो ऐसे महा मानव हैं, जो पूरे समाज के लिए आदर्श हैं. दोनों का ही जन्मस्थान विवादों में रहा, अयोध्या में तो खैर अब कोर्ट के आदेश से भव्य मंदिर बन चुका है, लेकिन श्रीकृ्ष्ण का जन्मस्थान अभी भी विवादों में है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक इंटरव्यू में मथुरा मंदिर के विवाद का जिक्र कर एक बार फिर इस मसले को हवा दे दी है. यह मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने पूरी मजबूती के साथ अपना दावा ठोका है.

Yogi Adityanath On Mandir-Masjid Debate : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा विवाद पर एक बार फिर बात की है और उन्होंने यह कहा कि हम इस मसले पर कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं, वरना वहां अबतक बहुत कुछ हो गया होता. उन्होंने यह भी कहा कि मथुरा भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है और इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए. एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश के साथ बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि संभल में 54 इस तरह के स्थान मिल चुके हैं, जहां मंदिर था और हम हर उस जगह को तलाशेंगे, जहां कभी मंदिर रहा था.

क्या है मथुरा का विवाद?

हिंदुओं के धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था. उस वक्त मथुरा के राजा कंस थे और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की मां देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल रखा था. भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उसी कारागार में हुआ था, इसलिए इस कारागार और स्थान का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है.हिंदू पक्ष की ओर से ऐसा दावा किया जाता है कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर केशव देव मंदिर स्थित था, जिसे 1669 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने तुड़वाया दिया था और वहां पर शाही ईदगाह मस्जिद बनवाया था. हालांकि मुस्लिम पक्ष हिंदुओं के इस दावे को स्वीकार नहीं करता है. हालांकि 2024 में डाले गए आरटीआई में यह बताया गया है कि अंग्रेजों के 1920 के गजट में इस बात का जिक्र है कि जहां अभी मस्जिद है, वहां पहले केशव मंदिर हुआ करता था, जिसे तोड़कर मंदिर बनाया गया है. यह जानकारी आगरा के पुरातत्व विभाग ने दी है. मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल में हुआ है.

श्रीकृष्ण जन्मस्थान से जुड़ा विवाद अदालत के समक्ष कब आया?

श्रीकृष्ण-जन्मभूमि-विवाद

हिंदू पक्ष का यह दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े इस स्थान का पूरा स्वामित्व उनके पास होना चाहिए. यह पूरा इलाका 13.37 एकड़ भूमि का है. वर्तमान में हिंदुओं के कब्जे में 10.9 एकड़ भूमि है, जबकि मुसलमानों के पास 2.47 एकड़ भूमि है. इस भूमि को लेकर विवाद काफी पुराना है, लेकिन 1935 में यह मामला औपचारिक रूप से सामना आया, जब हिंदू संगठनों ने पूरे श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर दावा किया और अंग्रेज सरकार से इस मसले में हस्तक्षेप की मांग की. उसके बाद कई बार यह मामला कोर्ट के सामने आया और आज भी यह केस कोर्ट के सामने ही विचाराधीन है. जानिए कब-कब श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मामला कोर्ट तक पहुंचा-

  • 1935 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि का विवाद पहली बार कानूनी रूप से सामने आया और हिंदू संगठनों ने पूरे क्षेत्र पर अधिकार को लेकर दावा ठोका और ब्रिटिश सरकार से हस्तक्षेप की मांग की.
  • 1944 में हिंदू महासभा और अन्य धार्मिक संगठनों ने बनारस के राजा से यह भूमि खरीदी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की.
  • 1968 में हिंदू और मुस्लिम पक्ष के बीच समझौता हुआ और भूमि का बंटवारा हुआ और विवादित इलाके की कुछ भूमि को मस्जिद के लिए छोड़ दिया गया.
  • 1991 में देश में भारत सरकार ने प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू किया, जिसमें यह प्रावधान है कि देश में 15 अगस्त 1947 से जो धार्मिक स्थल जिस रूप में थे, वे उसी रूप में रहेंगे. इस एक्ट में अयोध्या को शामिल नहीं किया गया था. अब मुस्लिम पक्ष इसी कानून का हवाला देता है और ह���ंदू पक्ष के दावे को खारिज करता है.
  • 2020 में हिंदू पक्ष  मथुरा कोर्ट पहुंचा और भव्य श्रीकृष्ण मंदिर के पुनर्निर्माण की मांग करते हुए मुसलमानों से वह जगह खाली करवाने की बात कही.यह याचिका अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री ने दाखिल की.
  • 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट  हिंदू पक्ष की याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हो गया है और अभी यह मामला कोर्ट में है.

क्या मंदिर को तोड़े जाने के कोई ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं?

कई इतिहासकारों ने जिनमें ऑड्रे ट्रुश्के भी शामिल हैं, उन्होंने अपनी किताब Aurangzeb: The Man and the Myth में बताया गया है कि औरंगजेब ने सभी हिंदू मंदिरों पर हमला किया हो, यह सच नहीं है. उसने विशिष्ट या बड़े हिंदू मंदिरों को निशाना बनाया और बाकियों को छोड़ दिया था. इस लिहाज से यह संभावना बनती है कि औरंगजेब ने मथुरा के केशव मंदिर को तुड़वाया हो. प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने अपनी किताब A SHORT HISTORY OF AURANGZIBВ में लिखा है कि औरंगजेब ने किसी हिंदू मंदिर को तो निर्माण की अनुमति दी और ना ही मरम्मत की. उसने 1669 में काफिरों के सभी मंदिरों को तोड़ने की इजाजत दी थी.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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