जोहार Gen Z एवं अन्य पाठकों. आज 28 जुलाई है.
शीत युद्ध (Cold War) के दौर में Super Powers टैंकों, मिसाइलों और सैन्य गठबंधनों के माध्यम से प्रभाव स्थापित करती थीं. आज वही प्रतिस्पर्धा Data, Social Media, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और Algorithm के माध्यम से दिखाई देती है.
इसे कई रणनीतिक विशेषज्ञ Algorithmic Geopolitics या Digital Statecraft के रूप में देखते हैं.
इसी विषय पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विशेषज्ञ, जेनेवा (स्विट्जरलैंड) से डॉक्टरेट, एक राजनीतिक वैज्ञानिक, लेखक और O.P Jindal Global University की प्रोफेसर (डॉ.) प्रीति अमरेश से हमने विस्तार से बातचीत की.
उन्होंने स्पष्ट किया कि आज Color Revolution को केवल घरेलू राजनीतिक आंदोलन के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है. इसे वैश्विक शक्ति-संतुलन (Global Balance of Power), सूचना-युद्ध (Information Warfare) और डिजिटल प्रभाव (Digital Influence) के व्यापक संदर्भ में देखना होगा.
प्रश्न: सबसे पहले, कलर रिवोल्यूशन क्या है?
प्रो. अमरेश: 'कलर रिवोल्यूशन सामान्यतः ऐसे अहिंसक जनआंदोलन होते हैं जो सत्ता परिवर्तन का कारण बनते हैं. समर्थकों के लिए ये लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हैं, जबकि आलोचकों के अनुसार ये विदेशी शक्तियों द्वारा समर्थित राजनीतिक परिवर्तन की रणनीति भी हो सकते हैं.'
Friends, यहीं से अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण बहस शुरू होती है.
- एक दृष्टिकोण (point of view) कहता है कि जब किसी देश में चुनावी धांधली, भ्रष्टाचार, दमन और राजनीतिक असमानता बढ़ जाती है, तब जनता का शांतिपूर्ण प्रतिरोध लोकतंत्र को पुनर्जीवित करता है.
- दूसरा दृष्टिकोण कहता है कि यदि बाहरी शक्तियां वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण, सूचना अभियानों और डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से ऐसे आंदोलनों को प्रभावित करती हैं, तो यह राज्य की संप्रभुता (State Sovereignty) में हस्तक्षेप माना जाएगा.
- यही कारण है कि कलर रिवोल्यूशन को समझने के लिए केवल घरेलू राजनीति नहीं, बल्कि Realism, Liberalism और Constructivism जैसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
प्रश्न: क्या अधिकांश कलर रिवोल्यूशन रणनीतिक महत्व वाले देशों में ही दिखाई देते हैं?
प्रो. अमरेश: 'अधिकांश मामलों में ऐसे आंदोलन उन्हीं देशों में उभरते हैं जो वैश्विक शक्तियों के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं. वहां केवल घरेलू संघर्ष नहीं होता, बल्कि वैश्विक शक्तियों के बीच प्रभाव स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा भी चल रही होती है.'
Friends,
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कलर रिवोल्यूशन को कई बार Proxy Competition का आधुनिक स्वरूप भी कहा जाता है.
- शीत युद्ध में महाशक्तियां सैन्य गठबंधनों के माध्यम से प्रतिस्पर्धा करती थीं.
- आज वही प्रतिस्पर्धा सूचना, नैरेटिव और डिजिटल प्रभाव के माध्यम से भी दिखाई देती है.
- इसलिए किसी भी राजनीतिक आंदोलन का मूल्यांकन करते समय केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि कौन विरोध कर रहा है?, बल्कि यह भी देखना आवश्यक है कि किसे उससे रणनीतिक लाभ मिल रहा है?
प्रश्न: सोशल मीडिया ने इस पूरी प्रक्रिया को किस प्रकार बदल दिया है?
प्रो. अमरेश: 'इंटरनेट, सोशल मीडिया, AI और साइबर तकनीकों ने राजनीतिक आंदोलनों की प्रकृति बदल दी है. राज्य और गैर-राज्य दोनों प्रकार के अभिनेता इन तकनीकों का उपयोग नागरिकों के व्यवहार को समझने, उनकी राय प्रभावित करने तथा दुष्प्रचार फैलाने के लिए कर सकते हैं.'
Dear Aspirants,
UPSC के दृष्टिकोण से यह Information Warfare और Hybrid Warfare का महत्वपूर्ण उदाहरण है.
- आज किसी देश को अस्थिर करने के लिए हमेशा सैन्य आक्रमण आवश्यक नहीं है.
- यदि किसी समाज में पहले से आर्थिक संकट, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या सामाजिक विभाजन मौजूद हो, तो सोशल मीडिया उन असंतोषों को तेज़ी से संगठित कर सकता है.
- AI आधारित algorithm यह तय करते हैं कि कौन-सी सूचना सबसे अधिक लोगों तक पहुंचेगी.
- डीपफेक तकनीक, बॉट नेटवर्क और माइक्रो-टार्गेटिंग जैसी तकनीकें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकती हैं.
- इस प्रकार सूचना स्वयं एक Strategic Resource बन चुकी है.
प्रश्न: AI इस पूरी बहस को कैसे बदल रहा है?
प्रो. अमरेश: 'AI नागरिकों के व्यवहार का विश्लेषण कर सकता है, उनकी राजनीतिक पसंद को प्रभावित कर सकता है तथा Deepfake जैसी तकनीकों के माध्यम से दुष्प्रचार को और प्रभावी बना सकता है.'
Friends,
- AI आधारित सूचना-युद्ध (Information Warfare) आने वाले समय की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौतियों में से एक माना जा रहा है.
- अब युद्ध केवल भौतिक सीमाओं पर नहीं, बल्कि Cognitive Domain यानी नागरिकों के विचारों और धारणाओं के भीतर भी लड़ा जा रहा है.
- इसलिए डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और तथ्य-जांच (Fact-checking) किसी भी लोकतंत्र की संस्थागत क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं.
प्रश्न: सबसे बड़ी बहस- संप्रभुता बनाम मानवाधिकार?
प्रो. अमरेश: 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह मानवाधिकारों की रक्षा भी करे और राज्यों की संप्रभुता का सम्मान भी बनाए रखे.'
Friends,
यही आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों की मूल दुविधा है.
- यदि किसी देश में लोकतंत्र कमजोर हो रहा हो, तो क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हस्तक्षेप करना चाहिए?
- यदि हस्तक्षेप करता है, तो क्या वह मानवाधिकारों की रक्षा है या किसी संप्रभु राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप?
- इसी प्रश्न के कारण Responsibility to Protect (R2P) और Westphalian Sovereignty के बीच निरंतर बहस चलती रहती है.
UPSC के दृष्टिकोण से यही उत्तर संतुलित माना जाएगा कि दोनों सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, परंतु किसी भी हस्तक्षेप की वैधता, उद्देश्य और अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति का गंभीर मूल्यांकन आवश्यक है.
इंटरव्यू से परे कुछ और प्रासंगिक बातें
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क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वास्तव में तटस्थ हैं?
यह आज वैश्विक शासन (Global Governance) का एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है.
आलोचकों का तर्क है कि बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल तकनीकी कंपनियां नहीं रहे, बल्कि वे वैश्विक सूचना-व्यवस्था के प्रमुख द्वारपाल (Gatekeepers) बन चुके हैं.
Algorithm यह निर्धारित करते हैं कि कौन-सी सूचना दिखाई जाएगी और कौन-सी पीछे चली जाएगी.
यदि किसी प्रकार की सामग्री लगातार अधिक दृश्यता प्राप्त करती है और दूसरी सामग्री दब जाती है, तो सार्वजनिक विमर्श (Public Discourse) भी उसी दिशा में प्रभावित होने लगता है.
इसी संदर्भ में कई विश्लेषक यह आरोप लगाते हैं कि कुछ वैश्विक प्लेटफॉर्म सरकारी दबावों, स्थानीय सेंसरशिप नियमों या व्यावसायिक हितों से पूरी तरह मुक्त नहीं होते.
यह आरोप केवल किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक डिजिटल शासन व्यवस्था पर उठने वाला प्रश्न है.
क्या दक्षिण एशिया इसका उदाहरण प्रस्तुत करता है?
हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल सहित दक्षिण एशिया के कई देशों में सोशल मीडिया की राजनीतिक भूमिका उल्लेखनीय रही है.
- कुछ विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल मंचों ने नागरिकों को संगठित होने और अपनी असंतुष्टि व्यक्त करने का अवसर दिया.
- दूसरी ओर, यह भी तर्क दिया जाता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से बाहरी प्रभाव, दुष्प्रचार और राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावनाएं भी बढ़ी हैं.
यही कारण है कि किसी भी घटना को केवल लोकतांत्रिक आंदोलन या केवल विदेशी षड्यंत्र कह देना विश्लेषण को अत्यधिक सरल बना देता है.
एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ दोनों आयामों की जांच करता है.
Conclusion for UPSC Aspirants
कलर रिवोल्यूशन को केवल लोकतंत्र की विजय या केवल विदेशी षड्यंत्र के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है.
यह एक बहुआयामी घटना है, जिसमें घरेलू राजनीतिक असंतोष, सामाजिक असमानता, आर्थिक संकट, डिजिटल तकनीक, अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन और सूचना-युद्ध; सभी एक साथ कार्य कर सकते हैं.
प्रो. (डॉ.) प्रीति अमरेश का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि 21वीं सदी में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रही.
आज algorithm, data, social media, AI और narrative formation भी राष्ट्रीय शक्ति के महत्वपूर्ण उपकरण बन चुके हैं.
अतः किसी भी समकालीन राजनीतिक आंदोलन का अध्ययन करते समय तीन प्रश्न सदैव पूछे जाने चाहिए-
- घरेलू कारण क्या हैं?
- बाहरी प्रभाव किस सीमा तक मौजूद हैं?
- इस पूरे घटनाक्रम से अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन में किसे लाभ या हानि होती है?
इन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर किसी भी कलर रिवोल्यूशन को समझने की सबसे संतुलित और विश्लेषणात्मक कुंजी प्रदान करते हैं.
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