इस हिंदू मंदिर की वजह से छिड़ा है थाईलैंड-कंबोडिया के बीच संघर्ष, 16 की मौत

Thailand-Cambodia Conflict : 1907 में कंबोडिया और थाईलैंड के बीच एक समझौता हुआ था, जिसकी वजह से सीमा क्षेत्र को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति बनी और यहीं से पनपा दोनों देशों के बीच सीमा विवाद. उस वक्त कंबोडिया पर फ्रांस का शासन था और थाईलैंड एक स्वतंत्र देश. थाईलैंड की खासियत यह है कि यह आजतक किसी उपनिवेश का हिस्सा नहीं बना है. 1907 से जो सीमा विवाद शुरू हुआ है वह आज भी जारी है और जिस क्षेत्र को लेकर यह विवाद ज्यादा गहराता है वह 11 शताब्दी में बना एक हिंदू मंदिर है.

Thailand-Cambodia Conflict : थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद आज का नहीं है. यह विवाद 1907 में पनपा था जब थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा समझौता हुआ था. उस वक्त कंबोडिया पर फ्रांस का शासन था. इस समझौते के तहत दोनों देशों का जो मानचित्र है, उसमें फ्रांस ने अपना दबदबा कायम करते हुए कंबोडिया को सीमा पर स्थित एक हिंदू मंदिर पर अधिकार दे दिया, जो भगवान शिव को समर्पित है. कंबोडिया की आजादी के बाद थाईलैंड ने उस मंदिर पर अपना कब्जा जमा लिया, तब कंबोडिया इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस पहुंचा, जहां से फैसला उसके पक्ष में हुआ, लेकिन एक बार फिर इस मंदिर को लेकर दोनों देश आमने-सामने हैं.

क्या है विवाद


कंबोडिया पर फ्रांस के शासन के दौरान थाईलैंड से 1904-07 के दौरान सीमा समझौता हुआ. उस दौरान जो मानचित्र बना, उसमें से कंबोडिया के हिस्से में जो आया, उसपर थाईलैंड अपना दावा ठोंकता है. उसका कहना है कि समझौते के दौरान भ्रम की स्थिति थी और थाईलैंड के हिस्सों को भी कंबोडिया में दिखा दिया गया. यों में जो मानचित्र बने, उनमें कुछ क्षेत्रों को कंबोडिया का हिस्सा दिखाया गया, जबकि थाईलैंड उसपर अपना दावा करता है. दरअसल एक ही क्षेत्र को दो अलग-अलग दस्तावेजों में अलग-अलग देश का हिस्सा बताया गया है, जिसकी वजह से विवाद बना हुआ है. इस सीमा विवाद में जिस क्षेत्र को लेकर सबसे ज्यादा विवाद है वो है प्रीह विहियर (Preah Vihear) मंदिर. यह मंदिर थाई-कंबोडिया सीमा पर एक पहाड़ी पर स्थित है. कंबोडिया जब 1953 में स्वतंत्र हुआ तो थाईलैंड ने इस मंदिर पर कब्जा कर लिया. उसके बाद कंबोडिया ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में शिकायत की, जिसके बाद मंदिर पर कंबोडिया का फिर से कब्जा हो गया, लेकिन मंदिर के आसपास के क्षेत्र पर जो करीब 5 किलोमीटर तक फैला है, थाईलैंड ने अपना कब्जा बनाए रखा. इसी वजह से दोनों देश के बीच तनातनी जारी है.

क्या है ताजा विवाद

कंबोडिया और थाईलैंड के बीच जो सीमा विवाद है उसकी वजह से दोनों देशों के बीच तनातनी होती रहती है. इन देशों की राजनीति का भी असर सीमा विवाद पर पड़ता है. थाईलैंड में सेना और सरकार के बीच हमेशा ठनी रहती है जिसमें इस सीमा विवाद का काफी उपयोग किया जाता है. जब भी थाईलैंड में लोकतांत्रिक सरकार बनती है, सेना उसे कमजोर करने के लिए सीमा विवाद को देश के स्वाभिमान से जोड़कर उठाती है और तख्तापलट तक कर चुकी है. हाल ही में कंबोडिया की सरकार की ओर से प्रीह विहियर मंदिर में राष्ट्रगान बजाया गया, क्योंकि इसे वे अपने राष्ट्रीय गौरव का विषय समझते हैं और इसके जरिये वहां राजनीति भी होती है. इसी वजह से थाईलैंड ने गोलीबारी शुरू कर दी है और दोनों देशों के बीच तीव्र लड़ाई छिड़ गई है. प्रीह विहियर मंदिर 11 शताब्दी में बनाया गया मंदिर है, जिसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर के रूप में चिह्नित भी किया है.

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संघर्ष की क्या है स्थिति

थाईलैंड और कंबोडिया के बीच ताजा सीमा विवाद 24 जुलाई को शुरू हुआ है. दोनों देशों ने टैंक के जरिए भी गोलीबारी की है और इसके और बढ़ने की आशंका भी है. दोनों पक्ष का कहना है कि अगला पक्ष इस संघर्ष के लिए जिम्मेदार है और थाईलैंड ने यह स्पष्ट कहा है कि किसी तीसरे मध्यस्थ की मध्यस्थता में यहां संघर्षविराम नहीं होगा, सिर्फ और सिर्फ दोनों पक्ष ही शांति करवा सकते हैं. बढ़ते सीमा संघर्ष में कम से कम 16 लोग मारे गए हैं और हजारों विस्थापित हो चुके हैं.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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