होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का आवागमन क्या बिना रोकटोक के हो रहा है या ईरान वसूल रहा है टोल टैक्स?

Strait of Hormuz : शांतिवार्ता की तैयारियों के बीच होर्मुज स्ट्रेट की वर्तमान स्थिति पर अनिश्चितता बनी हुई है. क्या इस जलमार्ग से आवाजाही आसान हो गई है या फिर ईरान जहाजों के लिए परेशानी खड़ी कर रहा है. मार्च के अंत में ईरान के सांसद ने टोल वसूलने की बात कह कर स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है.

Strait of Hormuz : ईरान युद्ध में बुधवार को सीजफायर की घोषणा के बाद यह उम्मीद जग गई थी कि अब होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही आसानी से होगी. अफसोस की यह उम्मीद ज्यादा देर तक टिकी नहीं, इजरायल द्वारा लेबनान पर हमला किए जाने के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को रोक दिया. उसी बीच 9 अप्रैल को ईरान की ओर से ऐसी सूचना सामने आई कि होर्मुज स्ट्रेट से पास करने के लिए ईरान प्रति जहाज 2 मिलियन डालर तक का टोल वसूल रहा है.

क्या है होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति?

ईरान युद्ध के बाद से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही पर रोक लगा दी थी. सीजफायर के बाद कुछ जहाजें यहां से गुजरीं, हालांकि जहाजों का आना-जाना बहुत सीमित रहा.फारस की खाड़ी में फंसे अधिकतर जहाज अभी वहीं फंसे हैं. इसी बीच लेबनान पर हुए हमले के बाद ईरान ने यहां से जहाजों का आना-जाना बंद कर दिया. सच्चाई यह है कि होर्मुज स्ट्रेट को कभी पूरी तरह बंद नहीं किया हां कुछ जहाजों को रोका गया और कुछ को शर्तों के साथ छोड़ा गया. हाल के हफ्तों में ईरान ने व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने की अपनी क्षमता को प्रदर्शित भी किया है, जिसकी वजह से रोज गुजरने वाले जहाजों की संख्या घटकर 130 के आसपास हो गई.

टोल की खबरों ने स्थिति और खराब कर दी है

युद्धविराम की घोषणाओं ने स्थिति को स्पष्ट करने के बजाय और अधिक अनिश्चितता पैदा कर दी है. वॉशिंगटन ने दावा किया है कि होर्मुज खुला है, लेकिन तेहरान का संदेश अधिक अस्पष्ट रहा है. इसमें यह संकेत भी शामिल हैं कि जहाजों को गुजरने से पहले ईरानी अधिकारियों को सूचित करना होगा. कुछ लोग इसे टोल लगाने की दिशा में ईरान का पहला कदम मानते हैं, वहीं यह सूचना भी सामने आ रही है कि 2 मिलियन डालर का टोल वसूला जा रहा है. हालांकि किसी भी जहाज या सरकार ने इसकी पुष्टि नहीं की है कि ईरान की ओर से ऐसा कोई टोल वसूला जा रहा है.

क्या कहता है कानून और भारत पर क्या होगा असर?

अंतरराष्ट्रीय कानून (United Nations Convention on the Law of the Sea) किसी देश को इस बात की इजाजत नहीं देता है कि वह प्राकृतिक स्ट्रेट से गुजरने के लिए किसी देश से टोल वसूले. वहीं एक सच्चाई यह भी है कि इसे लेकर कुछ भी बहुत स्पष्ट नहीं है. अगर ईरान टोल वसूलता है, तो भारत पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि हमारे आयात का 90% इसी मार्ग से होकर आता है. युद्ध की स्थिति में भारत के कई जहाज यहां से आए तो हैं, लेकिन उनकी संख्या सीमित है. अगर टोल वसूला गया, तो देश में तेल महंगा हो जाएगा, जिससे महंगाई बढ़ेगी. डिमांड के अनुसार सप्लाई उपलब्ध नहीं है, तो सप्लाई चेन भी बुरी तरह प्रभावित होगा. होर्मुज स्ट्रेट को लेकर फिलहाल स्थिति साफ नहीं है, लेकिन यह तय है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा के केंद्र में बना रहेगा.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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