संविधान निर्माण के वक्त धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद जैसे शब्द नहीं थे संविधान का हिस्सा, इमरजेंसी के वक्त इन्हें जोड़ा गया

Socialist Secular Amendment : 1975 में जब देश में इमरजेंसी लागू किया गया था, उस वक्त देश के संविधान में व्यापक बदलाव संविधान के 42वें संशोधन द्वारा किया गया था. इस संशोधन के जरिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी को बचाने की पूरी व्यवस्था की थी, उस वक्त इंदिरा गांधी की पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आर) के पास 360 सीटें थीं और वह पूर्ण बहुमत में थी. 42वें संशोधन के जरिए ही देश में सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को सीमित करके संसद की सर्वोच्चता को कायम किया गया था और संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद जैसे शब्द जोड़े गए थे.

Socialist Secular Amendment : आरएसएस के नेता दत्तात्रेय होसबोले ने संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द जोड़े जाने पर सवाल उठाएं हैं और कहा है कि ये शब्द भारतीय संविधान में निर्माण के वक्त से नहीं हैं, इन्हें जोड़ा गया है, इसलिए इसकी जरूरत पर चर्चा की जानी चाहिए. दत्तात्रेय होसबोले ने इमरजेंसी के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उक्त बातें कहीं हैं. होसबोले के इस बयान का समर्थन करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी यह कहा है कि समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं. हमारी संस्कृति में सर्वधर्म समभाव की बात की जाती है ना कि धर्मनिरपेक्षता की, इसलिए इनकी जरूरत हमें नहीं है. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस मसले पर बयान दिया है कि किसी भी देश के संविधान की प्रस्तावना में बदलाव नहीं किया जाता है, लेकिन इमरजेंसी के दौरान यह किया गया. जो कहीं से भी सही नहीं है.

धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्दों पर हुई शुरू राजनीति का हिस्सा बनते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि आरएसएस का असली चेहरा सामने आ गया है. दरअसल आरएसएस और बीजेपी को देश में संविधान नहीं चाहिए, उन्हें देश में मनुस्मृति चाहिए.

धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द पर क्यों हो रहा है विवाद?

धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द की जरूरत संविधान में है या नहीं इस बात को लेकर राजनीति हो रही है और बयानबाजी का दौर जारी है. दरअसल 1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ, उस वक्त संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द जुड़े हुए नहीं थे. 1976 में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया है. हालांकि 42वें संविधान संशोधन के बाद भी देश में कई बार संविधान संशोधन हुए, लेकिन इन शब्दों का हटाने की जरूरत महसूस नहीं की गई. किसी भी देश के संविधान की प्रस्तावना को उस संविधान की आत्मा कहा जाता है, जिसमें संविधान की मूल बातें शामिल होती हैं. अब जबकि आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबोले के बयान के बाद देश में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जैसे शब्दों की जरूरत संविधान में है या नहीं इसपर चर्चा शुरू हो गई है. हमें यह जानना चाहिए कि संविधान निर्माता डाॅ भीमराव अंबेडकर और संविधान सभा के तमाम दिग्गजों ने इसे संविधान की प्रस्तावना में शामिल क्यों नहीं किया था.

42वें संविधान संशोधन में इन शब्दों को क्यों जोड़ा गया?

1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा की तो उनपर कई तरह के दबाव थे. उनका चुनाव रद्द कर दिया गया था और नैतिकता की बात करें, तो उन्हें पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं था. देश में 1976 में लोकसभा चुनाव होना था, लेकिन 12 जून 1975 को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द किया और अगले छह साल तक उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया तो अपनी सरकार को बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया और संविधान के 42 संशोधन द्वारा संविधान में भारी बदलाव किए. इसके तहत सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को सीमित किया गया और संसद की सर्वोच्चता को कायम किया गया. साथ ही धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जैसे शब्द संविधान की प्रस्तावना में डाले गए. इनके जरिए इंदिरा गांधी यह साबित करना चाहती थीं कि वो गरीबों की हितैषी थीं. उन्होंने गरीबी हटाओ जैसा नारा दिया था, जिसे उन्होंने समाजवाद से जोड़ा. हालांकि हमारे देश का समाजवाद चीन और रूस के समाजवाद से बिलकुल था. विधायी मामलों के जानकार अयोध्या नाथ मिश्र ने प्रभात खबर के साथ बातचीत में कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने भविष्य में संशोधन की संभावनाओं को खुला रखा था, तभी संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जैसे शब्द जोड़े गए. अब तक देश के संविधान में 100 से अधिक संशोधन हो चुके हैं, क्योंकि समय के अनुसार बदलाव जरूरी होता है. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि संविधान के बारे में जो कुछ बात हो, वो तथ्यों के आधार पर हो, व्यक्तिगत स्वार्थ या विचारों के आधार पर नहीं. इसी वजह से सर्वानुमति और बहुमत जैसे उपाय संविधान में उपलब्ध हैं.

समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों पर संविधान सभा में चर्चा हुई थी ?

भारतीय संविधान को अंगीकार करने से पहले संविधान सभा में समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष दोनों ही शब्दों पर चर्चा हुई थी, लेकिन इन दोनों शब्दों को मूल संविधान में जगह नहीं दी गई थी. 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में इन शब्दों को जोड़ा गया था. संविधान सभा में बहस के दौरान डाॅ भीमराव अंबेडकर और पंडित नेहरू जैसे नेताओं का यह मत था कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की आत्मा है, जहां धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव की कोई संभावना नजर नहीं आती है. अनुच्छेद 25-28 में धार्मिक स्वतंत्रता का जिक्र है इसलिए धर्मनिरपेक्षता को अलग से संविधान में शामिल करने की कोई जरूरत नहीं है. उस वक्त यह माना गया था कि देश का कोई धर्म नहीं होगा और राज्य यानी देश धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव नहीं करेगा.

1950 में लागू हुए संविधान की प्रस्तावना में लिखा था-

‘हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने तथा उसके सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्रदान करने तथा उन सभी के बीच व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ावा देने का दृढ़ संकल्प लेते हैं; इस संविधान सभा में आज छब्बीस नवम्बर, 1949 को इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’

संशोधन के बाद प्रस्तावना इस प्रकार है-

हम, भारत के लोग, भारत को एक ‘[संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न
समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य ] बनाने के लिए,
तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में
और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
व्यक्ति की गरिमा और 2[ राष्ट्र की एकता
और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख
26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो
हजार छह विक्रमी) को एत‌द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं ।

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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