मुगल राजदरबार में अकबर ने शुरू कराया था होली का जश्न, औरंगजेब ने लगा दिया था प्रतिबंध

Holi of Mughal Period : मुगल बादशाहों में अकबर जैसे राजा ने भारत में इंडो–इस्लामिक संस्कृति का विकास किया, जिसका प्रभाव आधुनिक समाज पर भी नजर आता है. इंडो–इस्लामिक संस्कृति का प्रभाव यहां की कला, स्थापत्य, संगीत, भाषा, खान–पान सब में नजर आता है. बिरयानी का चलन आज के समाज में इसका सबसे सटीक उदाहरण है. मुगल काल में होली अकबर, जहांगीर और शाहजहां जैसे बादशाहों के राजदरबार में बड़े पैमाने पर मनाई जाती थी. औरंगजेब जैसे शासक ने हालांकि होली–दीपावली पर प्रतिबंध लगा दिया था.

Holi of Mughal Period :“कान्हा पिचकारी रसिया गुलाल बरसै, गोपिन के संग खेलें रसखान पिचकारी।” यह पंक्तियां हैं प्रसिद्ध कवि रसखान की, जो अकबर के समकालीन थे. रसखान इस्लाम धर्म को मानने वाले थे, लेकिन उन्होंने कविताएं कृष्ण की भक्ति में लिखीं. यह उदाहरण है उस वक्त के समाज की जिसमें हिंदू–मुसलमान एक साथ आ रहे थे और होली का त्योहार मनाया जा रहा था. मुगल बादशाहों में अकबर एक ऐसे राजा थे जिन्होंने हिंदुओं के प्रति थोड़ी रहमदिली की और उनके पर्व–त्योहारों को भी महत्व दिया. अकबर की सबसे प्रमुख रानी का दर्जा पाने वाले जोधाबाई के साथ बादशाह अकबर के होली खेलने की कहानियां बहुत प्रचलित हैं.

अकबर के दरबार में होली

अकबर और जोधाबाई की होली

मुगल शासकों में अकबर सबसे सहिष्णु शासक थे और उनके बारे में अबुल फजल ने आइने अकबरी में लिखा है कि अकबर के दरबार में होली मनाई जाती थी. वे अपनी रानियों के साथ भी हरम में होली खेलते थे, जिनमें जोधाबाई का नाम सबसे पहले आता है. होली के अवसर पर राजदरबार में उत्सव होता था और अकबर महल से बाहर आकर आम लोगों के साथ भी होली खेलते थे. 

इतिहासकार इरफान हबीब भी मुगल काल की होली का वर्णन करते हैं वे लिखते हैं कि अकबर ने ‘सुलेह-ए-कुल’ यानी सर्वधर्म समभाव की नीति को अपनाया और सभी धर्मों के त्योहारों में भाग लिया. होली के मौके पर राजदरबार में गुलाल से होली खेली जाती थी, नृत्य– संगीत और काव्यपाठ का आयोजन किया जाता था. 

जहांगीर ने भी होली को दिया बढ़ावा

जहांगीर एक हिंदू मां के बेटे थे और उन्होंने भी अपने समय में अपने राजदरबार में होली जैसे त्योहार को खूब प्रोत्साहित किया. इतिहासकार बताते हैं कि जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में होली के त्योहार का जिक्र किया है. उनकी प्रिय रानी नूरजहां भी होली के त्योहार में शिरकत करती थीं, जबकि वे मुस्लिम थीं. जहांगीर के काल के जो पेंटिंग्स उपलब्ध हैं उनमें भी जहांगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है, जो यह साबित करता है कि जहांगीर हिंदू त्योहारों के प्रति प्रेम रखते थे. उनकी कई रानियां भी हिंदू थीं, जिनके साथ हरम में होली होती थी.

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शाहजहां के काल में होली बनी ईद –ए–गुलाबी

मुगल बादशाह शाहजहां ने भी होली के त्योहार को उत्सव की तरह मनाया. उनके शासनकाल के दौरान राजदरबार में होली का उत्सव ईद–ए–गुलाबी के नाम से जाना जाता था. इस त्योहार को राजदरबार में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग साथ मनाते थे. अब्दुल हामिद लाहौरी की किताब पादशाहनामा और शाहजहांनामा दोनों में ही इस बात का उल्लेख मिलता है कि शाहजहां के शासनकाल में होली मनाई जाती थी. मुगल काल की कलाकृतियों में भी होली का जिक्र मिलता है और शाहजहां द्वारा आयोजित किए जाने उत्सवों का वर्णन मिलता है.

होली बनी ईद –ए–गुलाबी

विदेशी लेखकों ने भी किया मुगल काल की होली का जिक्र

फ्रांसीसी चिकित्सक और यात्री François Bernier ने अपनी पुस्तक Travels in the Mughal Empire में मुगल दरबार की होली का जिक्र किया है और बताया है कि किस तरह उस वक्त होली खेली जाती थी. निकोलाओ मनुची ने भी मुगल कालीन समाज और परंपराओं का जिक्र करते हुए होली का वर्णन किया है. 

औरंगजेब ने हिंदू त्योहारों पर लगाया प्रतिबंध

मुगल शासकों में औरंगजेब एक ऐसा शासक था, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसने हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध लगाया और हिंदुओं पर अत्याचार किया. कई इतिहासकार यह मानते हैं कि औरंगजेब ने हिंदुओं पर अत्याचार किया उनपर जजिया कर दोबारा से लगाया, जिसे अकबर ने बंद करा दिया था. इतिहासकार यदुनाथ सरकार और सतीश चंद्र ने इस बात का उल्लेख अपनी किताबों में किया है. औरंगजेब के हिंदू राजाओं के साथ भी अच्छे संबंध नहीं थे, जिसकी वजह हिंदुओं पर अत्याचार ही था. औरंगजेब के शासनकाल में राजदरबार में होली मनाई जाती हो, इसका कोई प्रमाण भी ना मिलना इस बात की ओर इशारा करता है कि उसने इस त्योहार पर प्रतिबंध लगाया.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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