Monsoon : आज सुबह जब मौसम वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट की नई तस्वीरें जारी कीं, तो social media पर एक ही तस्वीर सबसे ज्यादा वायरल होने लगी. तस्वीर में भारत से लेकर चीन, जापान और दक्षिण कोरिया तक आसमान पर सफेद रंग की एक विशाल पट्टी दिखाई दे रही थी.
दावा किया गया कि एशिया के ऊपर करीब 10,000 किलोमीटर लंबा एक विशाल मानसूनी बादल बन गया है. कुछ लोगों ने इसे Super Monsoon का संकेत बताया, तो कुछ ने इसे आने वाली रिकॉर्डतोड़ बारिश का इशारा मान लिया.
लेकिन क्या सचमुच भारत से दक्षिण कोरिया तक एक ही बादल फैला हुआ है? क्या इसका मतलब है कि पूरे एशिया में अब बंपर बारिश तय है?
या फिर यह सैटेलाइट तस्वीरों का एक ऐसा भ्रम है, जिसे समझने की जरूरत है?
दरअसल, कहानी जितनी दिखाई देती है, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है.
आसमान में दिखा एक बादल, लेकिन हकीकत कुछ और है
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि सैटेलाइट तस्वीरों में जो लंबी सफेद पट्टी दिखाई दे रही है, वह वास्तव में कोई एक अकेला विशाल बादल नहीं है.
असलियत में यह हजारों क्यूम्यूलोनिम्बस (Cumulonimbus) बादलों का समूह है. यही वे ऊंचे, घने और काले बादल होते हैं जो तेज बारिश, गरज, बिजली और आंधी लेकर आते हैं.
जब वातावरण में नमी, तापमान और हवाओं की दिशा बिल्कुल अनुकूल हो जाती है, तब ये हजारों बादल एक-दूसरे के बेहद करीब बनते हैं. अंतरिक्ष से देखने पर इनके बीच का अंतर दिखाई नहीं देता और पूरा क्षेत्र एक लगातार चलने वाली सफेद पट्टी जैसा नजर आता है
यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक इसे Monsoon Convergence Zone या मानसूनी अभिसरण क्षेत्र कहते हैं, न कि 10,000 किलोमीटर लंबा एक अकेला बादल.
आखिर यह इतना बड़ा सिस्टम बना कैसे?
इस सवाल का जवाब हमें एशिया के पूरे मानसून सिस्टम में मिलता है.
अक्सर हम भारत के मानसून की बात करते हैं, लेकिन वास्तव में एशिया का मानसून केवल भारत तक सीमित नहीं है. यह दुनिया की सबसे बड़ी मौसमी वायुमंडलीय व्यवस्था है, जिसमें दो बड़े हिस्से मिलकर काम करते हैं.
- पहला है दक्षिण एशियाई मानसून, जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका में बारिश लाता है. इसकी नमी अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर से आती है.
- दूसरा है पूर्वी एशियाई मानसून, जो चीन, ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया में वर्षा का मुख्य कारण बनता है. यह नमी दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत महासागर से प्राप्त करता है.
गर्मी के महीनों में ये दोनों मानसूनी प्रणालियां आपस में जुड़ जाती हैं. नतीजा यह होता है कि भारत से लेकर पूर्वी एशिया तक एक लंबी वर्षा पट्टी विकसित हो जाती है, जो सैटेलाइट तस्वीरों में एक विशाल क्लाउड बैंड के रूप में दिखाई देती है.
तिब्बती पठार: पूरे खेल का असली खिलाड़ी
इस पूरी कहानी का सबसे अहम किरदार है तिब्बती पठार.
समुद्र तल से लगभग चार से पांच किलोमीटर ऊंचाई पर स्थित यह विशाल पठार गर्मियों में सूर्य की सीधी किरणों से तेजी से गर्म हो जाता है.
जैसे ही इसकी सतह का तापमान बढ़ता है, ऊपर की हवा गर्म होकर हल्की होने लगती है और वहां निम्न वायुदाब (Low Pressure) बन जाता है.
प्रकृति हमेशा संतुलन बनाने की कोशिश करती है. इसलिए आसपास के समुद्रों से नमी से भरी हवाएं इस निम्न दबाव वाले क्षेत्र की ओर तेजी से बढ़ने लगती हैं.
अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, भूमध्यरेखीय हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर से आने वाली यही हवाएं मानसून की असली ऊर्जा बनती हैं.
भूमध्य रेखा से शुरू होती है बादलों की यात्रा
मानसून केवल समुद्र से आने वाली हवा का नाम नहीं है.
इसमें एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है जिसे Cross-Equatorial Flow कहा जाता है.
दक्षिणी गोलार्ध से चलने वाली हवाएं भूमध्य रेखा पार करके उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करती हैं. जैसे ही वे भूमध्य रेखा पार करती हैं, पृथ्वी के घूर्णन के कारण उन पर कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect) काम करने लगता है.
उत्तरी गोलार्ध में यही प्रभाव हवाओं को दाईं ओर मोड़ देता है.
यही वजह है कि नमी से भरी हवाएं केवल भारत तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि धीरे-धीरे पूर्व की ओर बढ़ते हुए चीन, कोरिया और जापान तक पहुंच जाती हैं.
इस पूरी प्रक्रिया के कारण हजारों किलोमीटर लंबा मानसूनी बादलों का नेटवर्क लगातार बना रहता है.
क्या इसका मतलब रिकॉर्डतोड़ बारिश तय है?
यहीं सबसे बड़ी गलतफहमी पैदा होती है.
इतना विशाल क्लाउड बैंड निश्चित रूप से यह संकेत देता है कि एशिया का मानसून फिलहाल काफी सक्रिय और संगठित है.
इसका मतलब है कि वातावरण में नमी भरपूर है, निम्न दबाव की प्रणालियां सक्रिय हैं और बादल बनने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है.
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर जगह रिकॉर्ड बारिश होगी.
बारिश की मात्रा कई दूसरे वैश्विक कारकों पर भी निर्भर करती है.
- सबसे बड़ा कारक है ENSO यानी एल नीनो और ला नीना.
- यदि प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति मजबूत होती है तो भारत समेत कई क्षेत्रों में मानसून कमजोर पड़ सकता है.
- दूसरा महत्वपूर्ण कारक है इंडियन ओशन डाइपोल (IOD).
यदि पश्चिमी हिंद महासागर अपेक्षाकृत अधिक गर्म और इंडोनेशिया के पास का समुद्री क्षेत्र ठंडा रहता है, तो इसे सकारात्मक IOD कहा जाता है. ऐसी स्थिति भारत की ओर अधिक नमी पहुंचाने में मदद करती है और मानसून को मजबूती मिलती है.
फिलहाल मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि IOD का रुझान सकारात्मक दिशा में बढ़ रहा है, जिससे मानसून को अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है. हालांकि अंतिम तस्वीर आने वाले हफ्तों की समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगी. प्रभात खबर UPSC पर खास कवरेज कर रहा है, ताकि आपको एक्सपर्ट गाइडेंस के लिए कहीं और न जाना पड़े. UPSC परीक्षाओं से जुड़ी सभी ताजा जानकारी के लिए हमारे साथ जुड़े रहें.
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किसानों के लिए राहत, लेकिन खतरे भी कम नहीं
सक्रिय मानसून का सबसे बड़ा फायदा खेती को मिलता है.
अच्छी बारिश से मिट्टी में नमी बढ़ती है, धान जैसी खरीफ फसलों को पर्याप्त पानी मिलता है, जलाशयों का स्तर ऊपर जाता है, सिंचाई आसान होती है और जलविद्युत उत्पादन में भी सुधार आता है.
लेकिन मानसून का दूसरा चेहरा भी उतना ही गंभीर है.
यदि कम समय में बहुत अधिक वर्षा हो जाए, तो वही बारिश बाढ़, भूस्खलन, शहरी जलभराव और मिट्टी के कटाव का कारण बन जाती है.
इसी वजह से पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में प्रशासन ने पहले ही बाढ़ और भारी वर्षा को लेकर अलर्ट जारी कर दिया है. लगातार सक्रिय बादल प्रणाली स्थानीय स्तर पर अत्यधिक वर्षा की घटनाओं को जन्म दे सकती है.
इसलिए सिर्फ बादलों की तस्वीर देखकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता
10,000 किलोमीटर लंबा यह क्लाउड बैंड निश्चित रूप से मौसम विज्ञान की दृष्टि से एक असाधारण और बेहद रोचक घटना है. यह दिखाता है कि पूरे एशिया का मानसून फिलहाल मजबूत और अच्छी तरह संगठित अवस्था में है.
लेकिन यह तस्वीर भविष्यवाणी नहीं है.
यह हमें केवल यह बताती है कि वातावरण बारिश के लिए तैयार है. वास्तव में कितनी बारिश होगी, कहां होगी और कब होगी- यह अभी भी एल नीनो, इंडियन ओशन डाइपोल, स्थानीय निम्न दबाव प्रणालियों, समुद्री तापमान और अनेक अन्य कारकों पर निर्भर करेगा.
यानी आसमान में फैली यह विशाल सफेद पट्टी उम्मीद भी है और चेतावनी भी.
उम्मीद इसलिए कि यह खेतों, नदियों और जलाशयों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकती है.
और चेतावनी इसलिए कि अगर यही बारिश कुछ इलाकों में जरूरत से ज्यादा बरसी, तो वही मानसून राहत से ज्यादा चुनौती बन सकता है.
यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक इस 10,000 किलोमीटर लंबे बादल को किसी चमत्कार की तरह नहीं, बल्कि एशिया के जटिल मानसूनी तंत्र की एक शानदार झलक मान रहे हैं. एक ऐसी झलक, जो हमें याद दिलाती है कि प्रकृति की सबसे बड़ी ताकत उसकी जटिलता में छिपी होती है.
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