1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारत ने ओलंपिक गोल्ड जीता था. इस टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने भारतीय हॉकी की तस्वीर बदल दी.
इस टूर्नामेंट में भारतीय टीम में एक युवा खिलाड़ी भी था, जिसकी हॉकी आगे चलकर दुनिया में मिसाल बनने वाली थी. नाम था ध्यानचंद. एम्सटर्डम में उनके शानदार खेल और फाइनल में किए दो गोल ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया. आगे चलकर यही खिलाड़ी भारतीय हॉकी के सबसे बड़े नामों में शामिल हुआ और दुनिया ने उसे हॉकी का जादूगर कहा.
ओलंपिक में हॉकी की वापसी और भारत की एंट्री
- 1908 के लंदन ओलंपिक में पहली बार हॉकी को शामिल किया गया था और उसके बाद 1920 के एंटवर्प खेलों में भी इसका आयोजन हुआ. लेकिन 1924 के पेरिस ओलंपिक में हॉकी नहीं थी.
- हालांकि, इसी दौरान भारत में हॉकी को लेकर लोगों में उत्साह बढ़ने लगा था और 1925 में बनी भारतीय हॉकी महासंघ ने तय किया कि भारत अंतरराष्ट्रीय हॉकी में अपनी पहचान स्थापित करें.
भारतीय हॉकी महासंघ की स्थापना 7 नवंबर 1925 को हुई थी.
1920 के बाद पहली बार हॉकी को 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में शामिल किया गया. इस बार भारतीय टीम भी इस आयोजन में हिस्सा ले रही थी. यह ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की पहली भागीदारी थी.
लेकिन टीम भेजना कहां आसान था
- यह उस दौर की कहानी है, जब भारत गुलाम था और भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहा था. ऐसे में भारतीय हॉकी महासंघ भी इस आर्थिक संकट से कैसे अछूता रह सकता था.
- करीब 15 हजार रुपये की कमी के कारण शुरुआत में 13 में से केवल 11 खिलाड़ियों के सफर का इंतजाम हो पाया था. दो खिलाड़ियों के सफर पर संकट खड़ा हो गया था.
- बाद में बंगाल हॉकी एसोसिएशन और खेल प्रेमियों की मदद से जरूरी रकम जुटाई गई और टीम रवाना हो सकी.
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कप्तान जयपाल सिंह भारत में थे ही नहीं
- अब जब भारतीय टीम एम्सटर्डम पहुंची, तब कप्तान जयपाल सिंह शुरुआत से पूरी टीम के साथ नहीं थे.
- दरअसल, भारतीय टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा थे. वो उस समय ब्रिटेन में थे और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े हुए थे. यहीं से वो टीम के साथ जुड़े. ओलंपिक में जयपाल सिंह मुंडा ही भारतीय टीम के कप्तान थे.
- जयपाल सिंह की भूमिका केवल मैदान तक सीमित नहीं थी. ब्रिटेन में उनकी शिक्षा और सामाजिक स्थिति के कारण वह उस माहौल को समझते थे जिसमें भारतीय टीम को खेलना था.इसलिए, जयपाल सिंह को टीम का नेतृत्व सौंपना एक रणनीतिक फैसला था.
इंग्लैंड से हो रही थी एम्सटर्डम की तैयारी
- भारत एम्सटर्डम पहुंचने से पहले इंग्लैंड में कई अभ्यास मुकाबले खेलने वाला था. वहां भारतीय खिलाड़ियों ने स्थानीय मजबूत टीमों के खिलाफ अपनी क्षमता दिखाई और साफ कर दिया कि वो केवल ओलंपिक में भाग लेने नहीं आए हैं.
- भारतीय टीम ने ओलंपिक से पहले इंग्लैंड में 11 मैच खेले. इस दौरान भारतीय टीम ने Hockey Association XI और Anglo-Scottish XI जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ भी जीत दर्ज की.
- एक तरफ जहां ध्यानचंद का खेल सबका ध्यान खींच रहा था वहीं भारतीय टीम का प्रदर्शन हॉकी के पारंपरिक केंद्रों को प्रभावित कर रहा था.
- लेकिन टीम की असली परीक्षा एम्सटर्डम में होनी थी.
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एम्सटर्डम में शुरू हुआ गोल्ड का सफर
भारत ने 1928 ओलंपिक हॉकी प्रतियोगिता में अपने अभियान की शुरुआत ऑस्ट्रिया के खिलाफ 6-0 की जीत से की. ध्यानचंद ने इस मैच में तीन गोल किए.
इसके बाद भारत ने बेल्जियम को 9-0 से हराया और डेनमार्क के खिलाफ 5-0 से जीत दर्ज की. स्विट्जरलैंड के खिलाफ भारत ने 6-0 से जीत हासिल की.
इस टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने विरोधियों को एक भी गोल नहीं करने दिया.
भारतीय टीम ने कुल 29 गोल किए, लेकिन पूरे टूर्नामेंट में भारत के खिलाफ एक भी गोल नहीं हो सका.
ध्यानचंद इस टूर्नामेंट के सबसे बड़े सितारे बनकर उभरे. उन्होंने पांच मैचों में कुल 14 गोल किए और प्रतियोगिता के शीर्ष स्कोरर रहे.
भारत अब फाइनल में था लेकिन चुनौतियां अभी बाकी थीं
- फाइनल से पहले टीम के सामने मैदान के बाहर की चुनौतियां खत्म नहीं हुई थीं.
- 26 मई 1928 को भारत का सामना मेजबान नीदरलैंड से था.
- फाइनल से पहले भारतीय टीम कई परेशानियों से गुजर रही थी. कुछ प्रमुख खिलाड़ी चोट और बीमारी से जूझ रहे थे. खुद ध्यानचंद भी अस्वस्थ थे.
- कप्तान जयपाल सिंह भी फाइनल के समय टीम के साथ नहीं थे. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड के अनुसार, जयपाल सिंह ने टीम को फाइनल से पहले छोड़ दिया था.
- हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद भारत ने मैदान पर अपना दबदबा बनाए रखा.
- फाइनल में ध्यानचंद ने दो गोल किए और भारत ने नीदरलैंड को 3-0 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया. फाइनल में भारत के तीसरे गोल जॉर्ज मार्टिंस ने किया.
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पहला गोल्ड, जिसने बदल दी भारतीय हॉकी की पहचान
- एम्सटर्डम में भारत ने सिर्फ स्वर्ण पदक नहीं जीता, बल्कि ओलंपिक हॉकी में एक नए युग की शुरुआत की.
- भारत टूर्नामेंट में अजेय रहा और उसके खिलाफ कोई गोल नहीं हुआ. यह देश का पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक था और आधुनिक ओलंपिक में किसी एशियाई देश का पहला स्वर्ण भी था.
- इसके बाद भारतीय हॉकी का स्वर्णिम दौर शुरू हुआ. 1928 के बाद भारत ने 1932 और 1936 में भी लगातार स्वर्ण पदक जीते.
- 1948 में स्वतंत्र भारत ने लंदन में फिर स्वर्ण जीता और इस तरह हॉकी भारतीय खेल पहचान का पर्याय बन गई. भारत ने 1928 से 1956 तक लगातार छह ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते.
