सुप्रीम कोर्ट का स्वागतयोग्य फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने जो कानून की व्याख्या की है वह स्वागतयोग्य है. इसके अनुसार, पिता की मृत्यु चाहे हुई हो या नहीं हुई हो, बेटियों को पैतृक संपत्ति में उसी तरह का अधिकार मिलेगा, जिस तरह बेटों को मिलता है.

रंजना कुमारी, डायरेक्टर, सेंटर फाॅर सोशल रिसर्च

ranjanakumari@csrindia.org

पितृसत्तात्मक समाज की व्यवस्था में सत्ता के तीन मूल केंद्र हैं, संपत्ति, संतति और सत्ता. ये तीनों ही पुरुषों के पास केंद्रित की गयीं. बच्चे के जन्म के बाद पिता का ही नाम चलता है, संपत्ति का उत्तराधिकारी बेटे को ही बनाया गया है. इसी तरह सत्ता भी पुरुषों के हाथ में ही रहती है. चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो, राजनीतिक हो या धार्मिक. इसी कारण समाज में स्त्रियों का दर्जा दोयम रहा है. संपत्ति का जो अधिकार, स्वाभाविक अधिकार के तौर पर बेटियों को मिलना चाहिए था, वह अब तक उन्हें नहीं मिल पाया है.

पैतृक संपत्ति कानून में जब 2005 में संशोधन किया गया तो बेटियों को अधिकार तो मिला, लेकिन उसमें यह बात भी शामिल थी कि 9 सितंबर, 2005 के पहले यदि पिता की मृत्यु हो गयी है तो बेटी को संपत्ति में अधिकार नहीं मिलेगा. तो एक हाथ से लो और एक हाथ से दो वाली बात हो गयी. जिन लड़कियों की शादी हो गयी है, वे परेशानी में हैं, अपने घर वापस जाना चाहती हैं, उन्हें पूर्व के संशोधित कानून के तहत तो अधिकार ही नहीं मिलेगा.

लेकिन, अभी सर्वोच्च न्यायालय ने जो कानून की व्याख्या की है, वह स्वागतयोग्य है. इसके अनुसार, पिता की मृत्यु चाहे हुई हो या नहीं हुई हो, बेटियों को पैतृक संपत्ति में उसी तरह का अधिकार मिलेगा, जिस तरह बेटों को मिलता है. इस निर्णय के तहत सीधे रास्ते से, कानून के तहत बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिया गया है.

लेकिन अभी भी एक दुविधा है. पिता की अर्जित संपत्ति अभी भी बेटों को ही मिलती है. पिता जिसे चाहे उसे दे सकता है. ये अधिकार अभी भी पिता के हाथ में ही है. संपत्ति तो संपत्ति है, उसका बराबर बंटवारा होना चाहिए. यदि आप पैतृक में बराबर अधिकार दे रहे हैं, तो अर्जित में भी देना चाहिए. आजादी के बाद जब संसद में संपत्ति के मामले को लेकर हिंदू कोड बिल पर चर्चा हो रही थी, तब से लेकर आज तक स्त्रियों के साथ भेदभाव ही बरता गया है. अब जाकर, यह फैसला हुआ है कि पैतृक संपत्ति में बेटियों को भी बराबर का अधिकार मिलेगा और पिता की मृत्यु से उसका कोई संबंध नहीं होगा.

हालांकि, अभी हमारा समाज इस बात को स्वीकार नहीं कर रहा है. पैतृक संपत्ति कानून में संशोधन तो पहले ही हो गया था, कानून बन ही गया था, लेकिन कितने परिवार ऐसे हैं जो स्वेच्छा से अपनी संपत्ति में बेटियों को भी अधिकार दे रहे हैं. इसके उलट वे शादी में खर्च और दहेज देने की बात कहकर बेटियों को उलझा देते हैं. यही बात बाद में बेटियों के गले की फांस बन जाती है.

पति-पत्नी के आपसी रिश्ते खराब होने पर आज कई लड़कियां शादी के रिश्ते से बाहर निकलना चाहती हैं, लेकिन उनके सामने यह प्रश्न आ जाता है कि वे कहां जायें. न चाहते हुए भी वे उसी नरक में रहने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास कोई ठिकाना ही नहीं है. यदि कोई लड़की किसी कारण अपना हिस्सा मांग बैठती है तो उसे सबसे बुरी लड़की करार दिया जाता है. मायके से रिश्ता खत्म होने के डर से लड़कियां अपना हिस्सा मांगती ही नहीं हैं. यह सोच खत्म होनी चाहिए. बेटियों को संपत्ति, खासकर पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार देने को समाज की स्वीकृति मिलनी चाहिए.

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को सचमुच अमल में लाने के लिए अभी कई काम करने होंगे. मां-बाप को बेटियों के दिमाग में यह बात बिठानी होगी कि जो कुछ भी मेरा है, वह तुम्हारा और तुम्हारे भाई दोनों का है. हालांकि, इस निर्णय को सबसे पहले माता-पिता को खुद स्वीकार करना होगा. उन्हें इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि बेटी को शादी करके भेज देंगे और बेटा घर का मालिक बनेगा.

दूसरी बात, बेटियों को अपना अधिकार मांगने में संकोच करने की जगह अपनी जबान खोलनी होगी. उन्हें समझना होगा कि यह उनका अधिकार है. वे अलग से कुछ भी नहीं मांग रही हैं. पैतृक संपत्ति तो पिता को भी मिली है, उन्होंने अर्जित नहीं की है. एक और बात, पिता-पुत्र दोनों को सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि संपत्ति में बेटियों का भी बराबर का हक है. अगर वे स्वीकार नहीं करते हैं तो उन्हें स्वीकार करवाया जाना चाहिए. अगर आप दबती रहीं, चुपचाप सबकुछ सहती रहीं, तो आपके साथ जैसी हिंसा हो रही है, वैसी होती रहेगी. आपके पास पैसे नहीं हैं, तो आप नरक में रहने के लिए मजबूर हैं, लेकिन आप अपने घर वापस नहीं जा सकतीं, यह भी एक तरीके की हिंसा ही है.

एक बात तो एकदम तय है कि इस बदलाव से हमारे सामाजिक ताने-बाने में थोड़ा फर्क आयेगा. परिवर्तन की अपनी कीमत होती है, वह ऐसे नहीं आता है. पुराना उजाड़ने के बाद ही हम कुछ नया बना पाते हैं. तो यहां भी रिश्तों में थोड़ी दरार तो आयेगी. लेकिन इसमें बहुत ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है. यदि इस दरार के पड़ने से समाज में सुधार आता है, तो इस दरार का पड़ना बेहतर है. ये दरार बाद में मरहम का काम करेगी. इसलिए जरूरी है कि इस दरार को पड़ने दिया जाये. यह परिवर्तन महिलाओं को उनके अधिकार देने के लिए, उन्हें हिंसा से बचाने के लिए होगा. इससे महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने की शक्ति मिलेगी.

(बातचीत पर आधारित)

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