अविस्मरणीय है श्यामलाल का योगदान

आजादी की लड़ाई के दौरान झंडागान सभी का प्रिय बन गया. इस गीत ने देश के जनमानस में चेतना जागृत करने का कार्य किया, पर आजादी मिलने के बाद इस गीत को एक तरह से भुला दिया गया.

देश की आजादी के आंदोलन के दौरान क्रांतिवीरों में गीतों के माध्यम से अभूतपूर्व जोश भरने वाले अनूठे व्यक्तित्व का नाम है श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’. गुप्त का जन्म 16 सितंबर, 1893 को उत्तर प्रदेश के कानपुर के नरबल कस्बे के एक साधारण व्यवसायी श्री विश्वेसर गुप्त के यहां हुआ था. वह पांच भाइयों में सबसे छोटे थे. परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब होने के बाद भी इन्होंने मिडिल परीक्षा पास की और विशारद की उपाधि भी हासिल की. बाद में जिला परिषद और नगरपालिका में अध्यापक की नौकरी की, लेकिन तुरंत त्यागपत्र भी दे दिया.

वर्ष 1921 में ये गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आये और फिर फतेहपुर को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया. एक प्रतिनिधि की हैसियत से इन्होंने नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया. फतेहपुर में रानी असोधर के महल से असहयोग आंदोलन शुरू करने के आरोप में 21 अगस्त, 1921 को पहली बार गिरफ्तार हुए और जेल गये. वर्ष 1924 में एक व्यंग्य लिखने के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने इन पर 500 रुपये का जुर्माना लगाया.

वर्ष 1930 में वह नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए और जेल भेजे गये. वर्ष 1932, 1942 और 1944 में लंबे समय तक भूमिगत भी रहे. इस बीच राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन से इनकी भेंट हुई. जेल यात्रा के साढ़े छह वर्ष के दौरान मोतीलाल नेहरू, श्री महादेव देसाई व पंडित रामनरेश त्रिपाठी से इनकी भेंट हुई, जो घनिष्ठ मित्रता में बदल गयी. तेईस वर्ष की उम्र में वह जिला कांग्रेस कमेटी, फतेहपुर के अध्यक्ष बने. इस पद पर आठ वर्ष तक रहे और इसके बाद जिला परिषद, कानपुर के लगातार 13 वर्ष तक अध्यक्ष रहे.

काव्य के प्रति इनका लगाव बचपन से था. पंद्रह वर्ष की उम्र में ही इन्होंने हरिगीतिका, सवैया और धनाक्षरी छंद कंठस्थ कर लिया था. उनके जीवन पर रामायण का काफी प्रभाव पड़ा और 15 वर्ष की उम्र में ही बालकांड की रचना कर डाली, लेकिन उस रचना को उनके पिता ने कुएं में फिंकवा दिया, क्योंकि उनका मानना था कि कविता लिखने वाला गरीब और फटेहाल रहता है.

वर्ष 1924 में जब स्वाधीनता आंदोलन चरम पर था, तब इन्होंने विश्व विख्यात झंडागान- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा/ सदा शक्ति बरसाने वाला/ प्रेम सुधा सरसाने वाला/ वीरों को हरषाने वाला/ मातृभूमि का तन-मन सारा…’ की रचना की. इस गीत को कांग्रेस ने स्वीकारा और 1925 में कानपुर कांग्रेस अधिवेशन में यह गीत ध्वजारोहण के दौरान पहली बार सामूहिक रूप से गाया गया. तब से आजादी मिलने तक यह गीत कांग्रेस के सभा, सम्मेलन, अधिवेशन और आंदोलन के समय गाया जाता रहा.

आजादी की लड़ाई के दौरान यह गीत सभी का प्रिय बन गया. इस गीत ने देश के जनमानस में चेतना जागृत करने का कार्य किया. इसी कारण गुप्त पर ब्रिटिश हुकूमत के खुफिया विभाग की हर समय नजर रहने लगी. त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के समय लगभग एक लाख कांग्रेस प्रतिनिधियों व नेताओं के साथ यह गीत सुभाष चंद्र बोस ने भी गाया, पर आजादी मिलने के बाद इस गीत को एक तरह से भुला दिया गया.

देश के लिए गुप्त के दिल में कितना दर्द था, यह उनके इस गीत से प्रकट होता है, जिसे उन्होंने 12 मार्च, 1972 को लखनऊ के कात्यायनी कार्यालय में सुनाया था- ‘देख गतिविधि देश की मैं मौन मन में रो रहा हूं/ आज चिंतित हो रहा हूं/ बोलना जिनको न आता था, वही अब बोलते हैं/ रस नहीं वह देश के, उत्थान में विष घोलते हैं…’ गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए इन्होंने कानपुर में गंगादीन-गौरीशकंर विद्यालय की स्थापना की, जो अब दोसर वैश्य इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है.

इस कॉलेज की पत्रिका का भी गुप्त जी ने कई वर्षों तक संपादन किया. इन्होंने एक अनाथालय और बालिका विद्यालय की भी स्थापना की. वैश्य समाज में व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने और विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए वह जीवनभर संघर्षरत रहे. वह इतने स्वाभिमानी थे कि जीवन में अभाव के बावजूद किसी के सामने उसका जिक्र तक नहीं करते थे. एक दिन नरबल में गणेश सेवा आश्रम जाते हुए इनके पैरों में कांच घुस गया, जिससे इनका पांव पक गया.

कानपुर के उर्सला अस्पताल में पैर का ऑपरेशन हुआ, पर इनका स्वास्थ्य दिनों-दिन गिरता गया. वह जब मरणासन्न अवस्था में थे, तब कानपुर से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ के नगर संस्करण में इनकी आर्थिक सहायता किये जाने का अनुरोध किया गया था. इससे पहले की सहायता मिलती 10 अगस्त, 1977 की रात वह हमें सदा-सदा के लिए छोड़ दुनिया से विदा हो गये.

वर्ष 1973 में इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. पर विडंबना है कि राष्ट्र के इस महान सपूत के अवसान के बाद न तो एक भी दिन झंडा झुकाया गया, न उनके अंतिम संस्कार में राज्य सरकार के किसी मंत्री ने भाग ही लिया. जिस व्यक्ति के लिखे गीत भीड़ को अनुशासित सैनिकों में बदलने की क्षमता रखते थे, भारत मां के इस अमर सपूत को नेतृत्व भले ही भुला दे, लेकिन देश कभी नहीं भूलेगा. आजादी की लड़ाई के इतिहास में उनका नाम सदा स्वर्णाच्छरों में लिखा जायेगा और अमर रहेगा.

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By ज्ञानेंद्र रावत

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