जेलेंस्की ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है, पढ़ें शिवकांत का खास लेख

Trump and Zelensky Arguing : अमेरिकी इतिहास में ऐसी नाटकीय घटना कभी नहीं हुई थी. कहासुनी के बाद खनिज समझौता होने की गुंजाइश ही नहीं बची थी. इसलिए जेलेंस्की खाली हाथ लौट गये. ट्रंप और वेंस ने जेलेंस्की की मुखरता को अमेरिका का अपमान बताया और विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने उनसे माफी की मांग की.

जेलेंस्की ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है, पढ़ें शिवकांत का खास लेख

Trump and Zelensky Arguing : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की के बीच रूस-यूक्रेन युद्धविराम के मुद्दे पर हुए वाग्युद्ध की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है. जेलेंस्की अमेरिका के निमंत्रण पर व्हाइट हाउस गये थे, जहां राष्ट्रपति ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से बातचीत के बाद यूक्रेन के दुर्लभ खनिजों के दोहन में अमेरिका की साझेदारी का समझौता होना था. जेलेंस्की खनिजों में साझेदारी देने से पहले अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी लेना चाहते थे. जबकि ट्रंप जेलेंस्की से युद्धविराम की सहमति लेना चाहते थे. बातचीत में गर्मी बढ़ती गयी, जो कहासुनी में तब्दील हो गयी. यह सब मीडिया के सामने हो रहा था.


अमेरिकी इतिहास में ऐसी नाटकीय घटना कभी नहीं हुई थी. कहासुनी के बाद खनिज समझौता होने की गुंजाइश ही नहीं बची थी. इसलिए जेलेंस्की खाली हाथ लौट गये. ट्रंप और वेंस ने जेलेंस्की की मुखरता को अमेरिका का अपमान बताया और विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने उनसे माफी की मांग की. जवाब में जेलेंस्की ने एक अमेरिकी टेलीविजन को दिये इंटरव्यू में कहासुनी पर खेद तो प्रकट किया, पर माफी मांगने से इनकार किया.


ट्रंप दो कारणों से जेलेंस्की को पसंद नहीं करते. एक तो 2019 में जेलेंस्की ने ट्रंप का वह अनुरोध ठुकरा दिया था, जो उन्होंने फोन पर किया था. ट्रंप चाहते थे कि जेलेंस्की वह सर्वर अमेरिका के हवाले कर दें, जिसमें उन यूक्रेनियों की गतिविधियां रिकॉर्ड थीं, जिन्होंने कथित रूप से रूसी पहचान बनाकर अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप किया था. वे यह भी चाहते थे कि जेलेंस्की बाइडन और उनके बेटे के खिलाफ जांच बिठायें. फोन पर हुई उसी बातचीत को लेकर ट्रंप पर महाभियोग भी चलाया गया था. इसलिए संभव है कि ट्रंप ने जेलेंस्की से बदला लेने के लिए बुलाकर खनिज सौदा करने का जाल बिछाया हो. पर इस बात की आशंका तो जेलेंस्की को भी होनी चाहिए थी.


वे एक तो शिखर बैठक में जंगी पोशाक पहन कर आये थे, जिस पर ट्रंप ने उनकी अगवानी के समय टिप्पणी भी की थी. दूसरे उन्होंने अपनी आवाज और भाषा पर संयम नहीं रखा. व्हाइट हाउस में उनके न्योते और ट्रंप के साथ बैठक की पृष्ठभूमि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टॉमर ने तैयार की थी. फिर भी यदि वे ट्रंप के साथ खनिज समझौता नहीं करना चाहते थे, तो कोई भी बहाना बनाकर जाना टाल सकते थे. हालांकि ट्रंप ने यह कहते हुए बातचीत का दरवाजा खुला रखा है कि जेलेंस्की जब युद्धविराम के लिए तैयार हों, तब आ सकते हैं. लेकिन इसमें दोराय नहीं कि जेलेंस्की ने अपने ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है.


फिलहाल फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और पोलैंड के नेताओं ने एकता दिखाने के लिए जेलेंस्की का समर्थन किया है, पर जैसे-जैसे हकीकत सामने आयेगी, भावावेश ठंडे पड़ते जायेंगे. नाटो पिछले 75 साल से अमेरिका के दम पर ही सोवियत और रूसी चुनौती का सामना कर पाया है. रूस की परमाणु शक्ति की काट केवल अमेरिका के ही पास है. यूरोप के देश पैसा और हथियार देकर यूक्रेन की आत्मरक्षा की लड़ाई जारी रखने में तो मदद कर सकते हैं, पर रूस को हरा कर यूक्रेन के उस 20 प्रतिशत भाग से वापस नहीं खदेड़ सकते, जिस पर रूस ने कब्जा कर लिया है. यह काम इस धाक के बिना संभव नहीं हो सकता कि अमेरिका अपनी परमाणु शक्ति का प्रयोग करने में संकोच नहीं करेगा. पर इसके लिए न अमेरिका की सरकार तैयार है, न जनता.


ट्रंप रूस और यूक्रेन के बीच युद्धविराम कराने के लिए इसलिए उतावले हो रहे हैं, ताकि अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों और उनके प्रसंस्करण पर चला आ रहा चीन का वर्चस्व खत्म हो सके. वे यूक्रेन के साथ रूस के दुर्लभ खनिज भंडारों तक भी पहुंचना चाहते हैं, ताकि तकनीक और व्यापार के क्षेत्रों में चीन से आगे रहा जा सके. स्वयं विस्तारवादी होने के कारण जैसे उन्हें पुतिन द्वारा यूक्रेन के 20 फीसदी भाग को हड़पने की चिंता नहीं है, उसी तरह ताइवान में चीन के विस्तारवादी इरादों की भी खास चिंता नहीं है.

वे खुद भी दुर्लभ खनिजों के लिए डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदना चाहते हैं, कनाडा को 51वां राज्य बनाना चाहते हैं, पनामा नहर वापस लेना चाहते हैं और गाजा में शर्म-अल-शेख जैसी सैरगाह बनाना चाहते हैं. वे चीन की व्यापारिक और तकनीकी लामबंदी तो करना चाहते हैं, पर सैनिक टकराव मोल लेना नहीं चाहते. इसलिए यदि भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी वर्चस्व पर अंकुश रखना या फिर उससे अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखना है, तो अपने बल-बूते पर करना होगा. यूरोपीय संघ को ट्रंप अमेरिका को आर्थिक चूना लगाने के लिए बना संगठन मानते हैं और नाटो को अमेरिकी पैसे और सैनिक शक्ति के दम पर पलने वाला.

उन्होंने यूरोपीय संघ पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी दे रखी है और अमेरिका के बराबर का खर्चा न उठाने पर नाटो की मदद के लिए न आने की. जेलेंस्की के साथ हुई कहासुनी ने इन धमकियों के हकीकत में बदलने का भय बढ़ा दिया है. अमेरिका और यूरोप के बीच आ रही इस दरार से खुशी पुतिन और जिनपिंग को है, जिन्हें लगता है कि उन्हें अब निर्बाध रूप से यूरोप में अपना कारोबार और वर्चस्व बढ़ाने के अवसर मिलेंगे. अमेरिका-यूरोप के बीच शुल्क युद्ध का लाभ भारत को भी मिल सकता है और यूरोप के साथ वर्षों से लंबित मुक्त व्यापार सौदा पट सकता है. यूक्रेन पर युद्ध विराम थोपकर शांति बहाल करने के पीछे ट्रंप का एक उद्देश्य रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता को रोककर उसे अपने पाले में खींचना भी है. यदि वे इसमें सफल हो जाते हैं, तो दुनिया एकध्रुवीय न रहकर कम से कम चार ध्रुवीय हो जायेगी.


एक ध्रुव अमेरिका रहेगा, दूसरा चीन, तीसरा रूस और चौथा यूरोप. अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो इस नये बहुध्रुवीय विश्व की बात स्वीकार कर चुके हैं. ट्रंप को भी एक से अधिक शक्तिकेंद्रों पर आपत्ति नहीं है. पर उन्हें यह गवारा नहीं कि शक्तिकेंद्रों के बीच मोर्चाबंदी हो. इसीलिए वे रूस और चीन के बीच बनते मोर्चे को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और ब्रिक्स जैसे संगठनों के भी खिलाफ हैं. भारत को इसी बहुध्रुवीय व्यवस्था के बीच अपना शक्तिकेंद्र बनाना है. इसके लिए उसे अपनी सामरिक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ रक्षा सामग्री में आत्मनिर्भर बनना होगा, क्योंकि खरीदे हुए रक्षा उपकरणों से कोई देश महाशक्ति नहीं बना है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Published by: शिवकांत

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