फैलता जा रहा है स्पैम कॉल का जाल

बड़ी टेक कंपनियों ने तकनीक को तो सस्ता कर दिया, लेकिन इससे टेलीमार्केटिंग करने वालों की एक फौज तैयार हो गयी. ई-कॉमर्स की दुनिया में योगगुरुओं, यौन परामर्शदाताओं और फिटनेस पर ज्ञान देने वालों की बाढ़ आ गयी है. उन्हें खुद को गुरु साबित करने के लिए विज्ञापन पर महंगे खर्च नहीं, बस एक फोन चाहिए होता है..

तकनीक के साथ एक विरोधाभासी बात यह है कि जो भी चीज शुरू में वरदान लगती है उसे अभिशाप बनते देर नहीं लगती. लगभग एक सदी पहले फिनलैंड के आविष्कारक एरिक टिगरस्टेड्ट ने एक ‘पॉकेट साइज फोल्डिंग फोन’ बनाया था, जिससे जहाजों और ट्रेनों के बीच संपर्क हो सकता था. उन्हें क्या पता था कि उनका मोबाइल फोन 21वीं सदी तक आते-आते भस्मासुर बन बैठेगा. यह सर्वव्यापी मशीन आज लोगों के बोर्डरूम से लेकर बेडरूम तक में घुसपैठ कर चुका है, गोपनीय बातें रिकॉर्ड कर रहा है, बैंक खाते खाली कर रहा है, लोगों की अंतरंगी तस्वीरें और मैसेज जैसे निजी डेटा चुरा रहा है, और धमकाने व ब्लैकमेल तक पर उतर आया है. वास्तविकता यह है कि मोबाइल फोन नयी दुनिया की एक जरूरी बुराई बन चुका है. ये फोन अब अदृश्य आक्रमणकारी बन चुके हैं, जो अमीर-गरीब में फर्क नहीं करते. यह पूंजीवाद का ताजा अभिशाप हैं, जिसकी कोई काट नहीं.

वर्ष 2021 में स्मार्टफोन का बाजार 457.18 अरब डॉलर तक पहुंच गया. दुनिया में अभी 14 अरब से ज्यादा मोबाइल फोन हैं, यानी दुनिया के हर इंसान के पास औसतन दो फोन हैं. भारत और चीन सबसे बड़े बाजार हैं. भारत में 1.3 अरब मोबाइल फोन हैं और चीन में 1.6 अरब. अमेरिका में 35 करोड़ स्मार्टफोन हैं. सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत में रोजाना 10 लाख स्पैम कॉल होते हैं. भारत के एक पूर्व वित्त मंत्री और राष्ट्रपति रहे राजनेता तक को पर्सनल लोन के लिए फोन आये थे. एक जज तो ऐसी एक कॉल से इस कदर नाराज हुए कि उन्होंने सरकार को कार्रवाई करने का आदेश दे डाला. मगर टेलीमार्केटिंग और टेलीकॉम गिरोह का किला जज साहब के अनुमान से ज्यादा मजबूत निकला. तकरीबन हर मंत्री या कॉरपोरेट हस्ती को फर्नीचर, होटल, फ्लैट, बीमा, इंटीरियर डेकोरेशन, स्विमिंग क्लास और घर पर डांस क्लास के कॉल आते रहते हैं.

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना पारदर्शिता है. ताकत को नियंत्रण प्यारा होता है और सरकारों को अपने नागरिकों की जासूसी भाती है. मोटे तौर पर, जन्म से लेकर मृत्यु तक की सूचनाएं जमा करने वाली सरकारी एजेंसियों के सर्वरों को निजी डेटा के लीक होने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. यह कारोबार एक विशाल शॉपिंग मॉल की तरह हो चुका है, जहां गुपचुप तरह से पैसे देकर मोबाइल फोन नंबर खरीदे या बेचे जा सकते हैं. डिजिटल इंडिया भारत के लोगों को सशक्त करने का एक दमदार नारा था. डिजिटल लेन-देन के क्षेत्र में भारत को अग्रणी होने का गर्व भी है. मगर इस प्रक्रिया में, वह स्पैम और स्कैम में डूबता जा रहा है. भारत चूंकि दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है, ऐसे में ग्लोबल अपराधी आलू से लेकर असलहे तक बेचने में जुट गये हैं.

तकनीक में माहिर मोबाइल माफिया सारी दुनिया में कारोबार कर रहे हैं. वे बाजार बांट लेते हैं. एक एजेंसी लोगों के महंगे होटलों में जाने की जानकारी जुटाती है, दूसरी महंगी खरीदारी करने वाले लोगों की. लोग होटलों से पैर बाहर रखते नहीं कि उनके पास बेहतर कमरे और बेहतर डील देने की पेशकश करने वाले फोन, मैसेज आने शुरू हो जाते हैं. बड़ी टेक कंपनियों ने तकनीक को तो सस्ता कर दिया, लेकिन इससे टेलीमार्केटिंग करने वालों की एक फौज तैयार हो गयी. ई-कॉमर्स की दुनिया में योग गुरुओं, यौन परामर्शदाताओं और फिटनेस पर ज्ञान देने वालों की बाढ़ आ गयी है. उन्हें खुद को गुरु साबित करने के लिए विज्ञापन पर महंगे खर्च नहीं करने पड़ते. उन्हें बस एक फोन चाहिए होता है, जिससे वे लुभावने ईमेल और टेक्स्ट की बौछार शुरू कर देते हैं. स्मार्ट फोन से मासूम लोगों को ललचाने और लूटने के सौ तरीके होते हैं, और ऐसे में कई अपनी जिंदगी की पूरी कमाई और संपत्ति तक से हाथ धो चुके हैं.

एप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियां सेल फोन बेच अरबों डॉलर कमा रही हैं, और अपने महंगे फोन में बचाव के लिए सॉफ्टवेयर नहीं डाल रहीं. अगर मोबाइल फोन की वजह से लोग फंस रहे हैं, तो लोगों की जानकारियां लीक होने के पीछे टेलीकॉम कंपनियों, सरकारी एजेंसियों, बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों और दूसरी डिजिटल कंपनियों का हाथ है. इसकी शुरुआत आधार से हुई, जब डेटा चोरी आम बात हो गयी. हालांकि, सरकार ने हाल में एक बड़े डेटा लीक होने के दावों का खंडन किया है, मगर यह स्पष्ट नहीं है कि इस तकनीक में सेंध लगायी जा सकती है या नहीं. आधार के सर्वर पर लोगों के सबसे ज्यादा डेटा हैं, क्योंकि हर किसी का मोबाइल इससे लिंक होता है. कोविड महामारी के दौरान डेटा जमा करने वाले एक और बड़े जरिये कोविन को लाया गया था और इसके आकार और इसके सुगमता से काम करने की तारीफ हुई थी. अब यह बड़ी डेटा लीक की खबर एक बड़ी शर्मिंदगी की वजह बन गयी है जिसकी जिम्मेदारी कोई नहीं ले रहा.

सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि टेलीकॉम कंपनियां फर्जी कॉल्स को बंद करने की व्यवस्था करने के लिए इच्छुक नहीं दिखतीं. फर्जी कॉल करने वाले गिरोह बड़ी आसानी से टेलीकॉम कंपनियों के लोगों से थोक में फोन नंबर खरीद ले रहे हैं. उन्होंने वे वीआइपी नंबर भी जुटा लिये हैं, जो 90 के दशक के अंत में महत्वपूर्ण नीति निर्माताओं को दिये गये थे. टेलीकॉम कंपनियों को अपने सिस्टम की कमजोरी की जानकारी है, मगर वे ग्राहकों की सुरक्षा पर खर्च नहीं करना चाहतीं. भारतीय टेलीफोन नियामक प्राधिकरण या ट्राई ने लगभग हाथ खड़े कर दिये हैं. यह विडंबना है कि इस संस्था के अधिकतर अध्यक्ष वही सेवानिवृत्त सचिव होते हैं, जिनके अपने कार्यकाल में गलत नीतियों की वजह से यह समस्या खड़ी हुई और उन्हें इसे सुलझाने में कोई दिलचस्पी नहीं होती.

निजी बैंक और वित्तीय संस्थान और भी बड़े दोषी हैं. बैंकों के प्रतिनिधियों के नाम पर जिस संख्या में कॉल आते हैं, उससे स्पष्ट है कि उनका ध्यान बैंकिंग पर नहीं, धंधे पर है. बड़े-बड़े भरोसेमंद बैंकों ने भी अपने ग्राहकों को बीमा पॉलिसी बेचने और कर्ज दिलाने के लिए चेहरा छुपाये हुए सेल्समैन लगा रखे हैं. आज जब दुनियाभर में बड़े कारोबारी अपनी उंगलियों पर नीतियां बना रहे हैं, तो ऐसे में स्पैम की महामारी से बचाव के लिए टीके का इजाद नहीं हो सकता और लालच का यह वायरस लोगों की मानसिक और आर्थिक शांति नष्ट किये जा रहा है. तकनीक के बेहिसाब और अनियंत्रित इस्तेमाल ने उन्हें खर्च घटाने और मुनाफा बढ़ाने का मंत्र दे दिय�� है. उनके लिए अब कोई भी नंबर रॉन्ग नंबर नहीं रहा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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