कचरे से कंचन बनाने का है यह युग

Technological innovation : जिसे हम 'इ-कचरा' कहकर फेंक देते हैं, वह मूल्यवान और रणनीतिक संसाधनों का विशाल भंडार है. पर्यावरणविद और अर्थशास्त्री इसके लिए 'अर्बन माइनिंग' (शहरी खनन) शब्द का प्रयोग कर रहे हैं. अनुपयोगी हो चुके मोबाइलों, कंप्यूटरों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के भीतर सोना, चांदी, तांबा, निकेल जैसे पारंपरिक तत्वों के साथ कोबाल्ट, लिथियम और रेयर अर्थ मेटल्स प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं.

Technological innovation : तकनीकी नवोन्मेष और डिजिटल सुगमता ने 21वीं सदी के मानव समाज को एक अभूतपूर्व गतिशीलता प्रदान की है. स्मार्टफोन, लैपटॉप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) और डेटा केंद्रों के इस युग ने जीवन को जितना सरल बनाया है, उतनी ही तेजी से एक घातक संकट भी खड़ा कर दिया है. यह संकट है ‘इ-वेस्ट’. संयुक्त राष्ट्र की ‘ग्लोबल इ-वेस्ट मॉनिटर 2024’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में विश्व ने करीब 6.2 करोड़ टन इ-कचरा पैदा किया, पर इसका मात्र 22.3 फीसदी हिस्सा ही वैज्ञानिक रूप से रिसाइकल हो सका. शेष 77 फीसदी से अधिक हिस्सा हमारी मिट्टी, पानी और हवा में धीमे जहर की तरह घुल रहा है.


जिसे हम ‘इ-कचरा’ कहकर फेंक देते हैं, वह मूल्यवान और रणनीतिक संसाधनों का विशाल भंडार है. पर्यावरणविद और अर्थशास्त्री इसके लिए ‘अर्बन माइनिंग’ (शहरी खनन) शब्द का प्रयोग कर रहे हैं. अनुपयोगी हो चुके मोबाइलों, कंप्यूटरों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के भीतर सोना, चांदी, तांबा, निकेल जैसे पारंपरिक तत्वों के साथ कोबाल्ट, लिथियम और रेयर अर्थ मेटल्स प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं. आज जब पूरी दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा, विंड टर्बाइन, सेमीकंडक्टर और रक्षा उपकरणों के लिए रेयर अर्थ मेटल्स की मारामारी है, तब इ-वेस्ट रिसाइक्लिंग तकनीक सुरक्षा कवच की तरह उभरती है. अभी विश्व स्तर पर एक फीसदी से भी कम रेयर अर्थ मैग्नेट्स रिसाइक्लिंग से प्राप्त होते हैं.

इस तकनीक का विस्तार करने पर यह पारंपरिक खनन पर हमारी निर्भरता कम करेगी. हम वैश्विक इ-कचरे का करीब सात फीसदी उत्पन्न करते हुए तीसरे सबसे बड़े इ-वेस्ट उत्पादक देश बन चुके हैं. इस विशाल अपशिष्ट का बड़ा हिस्सा कबाड़खानों और असंगठित नेटवर्क के हाथों में है. तंग गलियों में खुले आसमान के नीचे इ-कचरा जलाना, कीमती धातुओं को निकालने के लिए कड़े तेजाबों का अनियंत्रित उपयोग करना और हानिकारक रसायनों को नालियों में बहा देना असंगठित क्षेत्र की पहचान बन चुकी है.

इसकी कीमत वहां काम करने वाले श्रमिकों के फेफड़े और उनका स्वास्थ्य चुका रहा है, वहीं सीसा, पारा, और कैडमियम जैसे विषैले तत्व पर्यावरण तंत्र को पंगु बना रहे हैं. यदि इस कबाड़ अर्थव्यवस्था को ‘संगठित’ ढांचे में ढाल दिया जाये, तो न केवल श्रमिकों को सुरक्षित और गरिमामय जीवन मिलेगा, बल्कि खुले में कचरा जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण और अम्लीय रिसाव पर पूर्ण विराम लग जायेगा. अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से धातुओं की रिकवरी दर में भारी सुधार होगा. संगठित क्षेत्र जब ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ के सिद्धांतों पर काम करेगा, तो अनुपयोगी सामग्री पुनः मुख्यधारा के विनिर्माण में शामिल हो जायेगी.

इससे सरकार को वैध राजस्व मिलेगा, संस्थागत निवेश बढ़ेगा और हरित रोजगार के नये क्षितिज खुलेंगे.
केंद्र सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए ‘ई-वेस्ट (प्रबंधन) नियम 2022’ के तहत ‘विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व’ (इपीआर ) की एक मजबूत व्यवस्था लागू की है. इसके अंतर्गत निर्माताओं और रिसाइकलर्स को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी ) के पोर्टल पर पंजीकृत होना अनिवार्य किया गया है. वित्त वर्ष 2024-25 में देश में उत्पन्न करीब 13.98 लाख मीट्रिक टन इ-वेस्ट में से करीब 70.71 प्रतिशत हिस्से को औपचारिक रूप से संग्रहित और प्रसंस्कृत किया गया, जो पिछले वर्षों की तुलना में सुधार है. अभी देश में 322 से अधिक पंजीकृत रिसाइकलर और 72 रिफर्बिशर काम कर रहे हैं, जिनकी कुल क्षमता 22 लाख मीट्रिक टन से अधिक है.


पर अधिकांश इ-कचरा अब भी जागरूक नागरिकों की उदासीनता के कारण सीधे औपचारिक रिसाइक्लिंग चैनलों तक नहीं पहुंच पाता. लोग पुराने फोन या लैपटॉप को कबाड़ वाले को दे देते हैं या घरों के कोनों में डंप कर रखते हैं. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और बैटरियों के प्रसंस्करण के बाद भी करीब 10 से 30 फीसदी ऐसा अवशेष बच जाता है, जिसे दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इस बचे हुए मलबे में अत्यधिक विषैले रासायनिक स्लज, भारी धातुएं और जटिल प्लास्टिक होते हैं. यदि इन अवशेषों को वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित लैंडफिल में दफनाया न जाए, तो ये भूजल को जहरीला बना देते हैं. देश में खतरनाक अवशेषों के उपचार और सुरक्षित लैंडफिल की संख्या बेहद सीमित है. इसलिए, जब तक हम ‘जीरो वेस्ट रिसाइक्लिंग ‘ और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन के मुकाम को हासिल नहीं कर लेते, तब तक रिसाइक्लिंग की प्रक्रिया अधूरी ही रहेगी.


यूरोप आज अपने सुदृढ़ कानूनों और उन्नत अवसंरचना के कारण करीब 42.8 फीसदी इ-कचरे को रिसाइकल कर दुनिया का नेतृत्व कर रहा है. भारत में इ-कचरे के पूरे तंत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और संगठित बनाने के लिए करीब 50,000 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी. यह विशाल धनराशि देश में नये रिसाइक्लिंग क्लस्टर विकसित करने, आधुनिक तकनीकों का स्वदेशीकरण करने व जन-जागरूकता का व्यापक जनांदोलन खड़ा करने के लिए जरूरी है. यह कचरे से कंचन बनाने का युग है. इस यात्रा में अब एक पल की भी देरी आत्मघाती होगी.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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