भोजन का अधिकार और भूख से आजादी

इस वर्ष सितंबर के राष्ट्रीय पोषण माह का थीम ‘सशक्त/सबल नारी, साक्षर बच्चा, स्वस्थ भारत’ था. इसके तहत बच्चों, गर्भवती महिलाओं एवं किशोरियों में कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए एकीकृत एवं जमीनी दृष्टिकोण को अपनाया गया है.

जिन आशाओं के साथ हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने स्वतंत्र भारत का निर्माण किया था, स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी वे पूरी नहीं हो पायी हैं. भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता में लगातार वृद्धि होने के बावजूद वैश्विक भूख सूचकांक में 116 देशों में भारत का स्थान 101 है. झारखंड की बात करें, तो नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पोषण और गरीबी के मानकों में झारखंड देश के सबसे पिछड़े राज्यों में एक है.

यह एक विरोधाभास है, क्योंकि संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद हम राज्य के सभी लोगों की पोषण आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं हो पाये हैं. झारखंड में न केवल देश की लगभग 40 प्रतिशत खनिज संपदा का स्रोत है, बल्कि देश के लिए एक विशाल मानव संसाधन का भंडार भी है. इस क्षमता को राष्ट्र निर्माण के वास्तविक योगदान में बदलने के लिए हमारे राज्य को अपने बुनियादी विकास संकेतकों में सुधार करने की आवश्यकता है. बच्चों का स्वास्थ्य और पोषण किसी भी राज्य के विकास के प्रमुख स्तंभ हैं. पिछले कुछ वर्षों में झारखंड के पोषण संकेतकों में सुधार हुआ है, लेकिन वह समुचित नहीं है.

झारखंड के पोषण संकेतकों में सुधार लाने में पोषण अभियान की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. वर्ष 2018 में इसकी शुरुआत के बाद से पोषण अभियान ने राज्य में बाल स्वास्थ्य एवं पोषण के विभिन्न घटकों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. एनएफएचएस-5 (2019–21) के अनुसार, एनएफएचएस-4 (2015–16) की तुलना में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के पोषण संकेतकों में सुधार हुआ है. उम्र की तुलना में कम लंबाई की दर 45.3 प्रतिशत से घट कर 39.6 प्रतिशत हुई है.

वहीं लंबाई के अनुपात में कम वजन 29 प्रतिशत से घट कर 22.4 प्रतिशत हुआ है. उम्र के अनुपात में कम वजन का संकेत पूर्व के 47.8 प्रतिशत से घट कर 39.4 प्रतिशत हो गया है. पोषण अभियान बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार का एक महत्वपूर्ण घटक है. इसका उद्देश्य पोषण माह के माध्यम से लोगों को जमीनी स्तर पर पोषण अभियान से जोड़ना है. इस वर्ष सितंबर के राष्ट्रीय पोषण माह का थीम ‘सशक्त/सबल नारी, साक्षर बच्चा, स्वस्थ भारत’ था.

इसके तहत बच्चों, गर्भवती महिलाओं एवं किशोरियों में कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए एकीकृत एवं जमीनी दृष्टिकोण को अपनाया गया है, जिसमें ग्राम पंचायत, सरकारी पदाधिकारियों एवं स्थानीय समुदायों की भागीदारी को सुनिश्चित करके इसे जन आंदोलन से जन भागीदारी में बदला गया है. पोषण माह में महिला एवं स्वास्थ्य, बच्चा एवं शिक्षा, पोषण एवं पढ़ाई, लैंगिक संवेदनशीलता के साथ जल संरक्षण एवं प्रबंधन तथा आदिवासी क्षेत्र में महिलाओं एवं बच्चों के लिए उपलब्ध पारंपरिक खान–पान आदि पर फोकस किया गया.

प्रतिबद्ध स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को डिजिटल मीडिया से जोड़ा गया है, जो एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है. झारखंड जैसे राज्य में पोषण और स्वास्थ्य के मुद्दों के हल के लिए आदिवासी समुदायों को इस अभियान से जोड़ना महत्वपूर्ण है. पोषण माह एक ऐसा अवसर है, जिसके माध्यम से बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करने हेतु सार्वजनिक वितरण सेवाओं के उपयोग में आदिवासी समुदाय की भूमिका को बढ़ाया जा सकता है.

पोषक उद्यान की अवधारणा झारखंड में घर आधारित खेती की संस्कृति को ही बल प्रदान कर रहा है, जिसके तहत राज्य में दीदी बाड़ी योजना (मनरेगा के तहत) लागू की गयी है. इसके माध्यम से स्थानीय भोजन, खास कर मोटे अनाज- ज्वार, बाजरा एवं रागी तथा विभिन्न प्रकार के साग-चौलाई, पालक, सहजन, सरसों, चना, अरबी तथा मेथी के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना है. स्वच्छता तथा स्वच्छ पानी की उपलब्धता पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है.

हम जानते हैं कि झारखंड में खेल की भी एक समृद्ध संस्कृति है और इसने देश को क्रिकेट विश्व कप, राष्ट्रमंडल खेलों, ओलिंपिक, बॉक्सिंग चैंपियनशिप, तीरंदाजी जैसे आयोजनों में लोहा मनवाने के कई अवसर दिये हैं. अगर कम उम्र में बच्चों को स्वस्थ जीवन जीने के मौके उपलब्ध हों, तो हमारे बच्चों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने की अद्भुत क्षमता है. यह तभी संभव है, जब गर्भवती माताओं एवं बच्चों को उनके प्रारंभिक वर्षों में उचित पोषण एवं स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें.

यदि हर वर्ष पोषण माह को व्यवस्थित ढंग से लागू किया जाए, तो इसमें झारखंड को कुपोषण मुक्त करने का सामर्थ्य है. सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम भारत सरकार मामले में कहा है कि भोजन का अधिकार जीवन के अधिकार का एक अभिन्न और अविभाज्य अंग है तथा इस पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है. सभ्य समाज में जीने का अधिकार अपने-आप में भोजन का अधिकार, शुद्ध पानी, शुद्ध वातावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आश्रय के अधिकार को सम्मिलित करता है.

राज्य सरकार द्वारा पोषण और भोजन के अधिकार को मूर्त रूप प्रदान करने का प्रयासलगातार किया जा रहा है. जब हम अपने इन प्रयासों में सफल होंगे, तभी सही मायनों में हम अपने राष्ट्र निर्माताओं के सपनों को पूरा कर पायेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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