अन्नाद्रमुक के साथ आने से एनडीए हुआ मजबूत

अमित शाह की राजनीति अपनी उसी रणनीतियों को दोहराना है जिसे भाजपा ने हरियाणा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय सत्ता हासिल करने के लिए अपनाया था. इन सभी रणनीतियों के साथ भाजपा सदियों पुरानी द्रविड़ राजनीति को ध्वस्त कर सकती है या नहीं, इसे तो समय ही बता सकता है. और इसकी शुरुआत 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से होगी. अन्नाद्रमुक के साथ भाजपा का चुनावी गठबंधन इस दिशा में सही कदम है.

तमिलनाडु की राजनीति गरमा रही है. इसके कई कारण हैं. पहला कारण, अप्रैल 2026 में तमिलनाडु के 234 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होना है. दूसरा कारण, गृह मंत्री अमित शाह एआइएडीएमके को एनडीए में वापस लाने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं. तीसरा कारण, एमके स्टालिन द्वारा द्विभाषा फॉर्मूले को लाकर हिंदी विरोध के आग को सुलगाना है. चौथा कारण, डीएमके द्वारा परिसीमन विवाद को हवा देना है. पांचवां कारण, केंद्र द्वारा सर्व शिक्षा योजना के तहत तमिलनाडु को फंड जारी नहीं किया जाना है. छठा कारण, यहां के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा शैववाद और वैष्णववाद को लेकर विवादास्पद बयान देना है. असल में तमिलनाडु सरकार के एक मंत्री व द्रमुक नेता पोनमुडी का कुछ दिनों पूर्व एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह यह कहते नजर आ रहे हैं कि एक व्यक्ति जब वेश्या के पास जाता है तो वह उससे पूछती है कि वह शैव है या वैष्णव. इस विवादास्पद टिप्पणी के बाद उपजे विरोध के कारण पोनमुडी को पद से बर्खास्त कर दिया गया. मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की पत्नी दुर्गा और सौतेली बहन व डीएमके सांसद कनिमोझी ने स्टालिन पर मंत्री को बर्खास्त करने का दबाव बनाया. सातवां कारण, भाजपा द्वारा नैनार नागेंद्रन को तमिलनाडु भाजपा की राज्य इकाई का नया अध्यक्ष चुना जाना है.

उपरोक्त सभी कारण वे प्रमुख राजनीतिक बिंदु हैं, जिन्हें देखते हुए ही गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी कार्य योजना को आगे बढ़ाया है. अमित शाह को कई हिंदू धार्मिक संगठनों से इनपुट मिले थे कि तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में हिंदू धर्म के लोगों का बड़े पैमाने पर इस्लाम और ईसाई धर्म में धर्मांतरण हो रहा है. तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने भी अमित शाह को इस बारे में जानकारी दी थी. भाजपा का लक्ष्य हिंदू विरोधी, हिंदी विरोधी डीएमके और एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली तमिलनाडु की सरकार को उखाड़ फेंकना है. भाजपा इसके लिए लंबे समय से प्रयासरत है. पिछले सप्ताह हुई अमित शाह की चेन्नई यात्रा को इसी की एक कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए. अमित शाह की इस यात्रा ने निश्चित रूप से डीएमके को परेशान कर दिया है. डीएमके के शीर्ष नेता भी द्रविड़ राजनीति के लिए एक संभावित खतरे की आशंका जता रहे हैं. बीते सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रामेश्वरम यात्रा से भी, जहां उन्होंने पंबन ब्रिज का उद्घाटन किया था, यहां राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गयी थी. यह लिफ्ट ब्रिज (पंबन ब्रिज) वास्तव में एक इंजीनियरिंग चमत्कार है, जिसका उपयोग ट्रेन और जहाज, समुद्र पार करने के लिए कर सकते हैं. नरेंद्र मोदी की यह यात्रा रामनवमी के अवसर पर हुई थी. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने डीएमके को भ्रष्ट पार्टी और सरकार को अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण में व्यस्त बताया था.

अब हम तमिलनाडु की वास्तविक राजनीति की ओर मुड़ते हैं. सबसे पहले डीएमके और उसके सहयोगियों पर चर्चा करते हैं. कांग्रेस, जो डीएमके की मुख्य सहयोगी है, मंत्रिमंडल में जगह चाहती है. उधर कम्युनिस्ट कर्मचारियों के लिए 12 घंटे की कार्य अवधि जैसे विवादास्पद श्रम कानूनों को वापस लेने पर जोर दे रही है और डीएमके ट्रेड यूनियन संगठनों के गठन पर रोक लगा रही है. स्टालिन अपने वरिष्ठ सहयोगियों के कारण गंभीर संकट में हैं, जो द्रविड़ राजनीति को पटरी से उतार रहे हैं. इसके अतिरिक्त, यह आरोप भी लग रहे हैं कि प्रथम परिवार के सदस्य भारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. डीएमके के एक मंत्री पीटीआर राजन ने यह आरोप लगाया है. अब हम कुछ वंशवादी पार्टियों की ओर मुड़ते हैं जहां उथल-पुथल मची है- जैसे 84 वर्षीय डॉ एस रामदास की अध्यक्षता वाली पाट्टाली मक्कल काची. यहां पिता-पुत्र पार्टी के विशाल वित्तीय संसाधनों के लिए आपस में लड़ रहे हैं. तमिलर काची के नेता सीमान, उच्च जातियों के विरोध के नाम पर नायकर नीतियों के लिए इवी रामासामी की आलोचना कर रहे हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को फलने-फूलने में मदद मिल रही है. सिने अभिनेता और नायक विजय जोसेफ ने तमिल वेत्री कझगम पार्टी का गठन किया है. विजय जोसेफ डीएमके के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना को हवा देने के अगुआ बने हुए हैं. ये सभी पहलू तमिल राजनीति को दर्शाते हैं. ऐसे में आप जिस भी तरफ से देखें, भाजपा को आगे बढ़ता हुआ ही पायेंगे. नरेंद्र मोदी की सामाजिक कल्याण योजनाओं का तमिलनाडु में लाभ मिल रहा है. पूर्व भाजपा प्रमुख के अन्नामलाई ने कुछ समय पूर्व ‘एन मन, एन मक्कल (मेरी धरती, मेरे लोग)’ पदयात्रा की थी, जिसे ग्रामिणों का समर्थन मिला था.

अंत में, भाजपा बड़े पैमाने पर लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए अपने नेताओं को उतार रही है. वास्तव में, अमित शाह की राजनीति अपनी उसी रणनीतियों को दोहराना है जिसे भाजपा ने हरियाणा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय सत्ता हासिल करने के लिए अपनाया था. इन सभी रणनीतियों के साथ भाजपा सदियों पुरानी द्रविड़ राजनीति को ध्वस्त कर सकती है या नहीं, इसे तो समय ही बता सकता है. और इसकी शुरुआत 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से होगी. अन्नाद्रमुक के साथ भाजपा का चुनावी गठबंधन इस दिशा में सही कदम है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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