ब्रांड मोदी से बनती भारत की मजबूत पहचान

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं का अंदाज़ निराला है. 100 से अधिक देशों की यात्राओं में उन्होंने अपनी एक खास 'मोदी-डिप्लोमेसी' स्थापित की है. यह सिर्फ़ संख्या नहीं, बल्कि भूगोल और भाषा का अनूठा मेल है.

पिछले गुरुवार की रात मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम के बाहर तापमान छह डिग्री सेंटीग्रेड था, लेकिन अंदर लगभग 30,000 लोग अपनी ही गर्मी पैदा कर रहे थे. भव्य सजावट दूर से ही ध्यान खींच रही थी और लाल कालीन असंभव रूप से लंबी फैली हुई थी. जब नरेंद्र मोदी ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के साथ मंच पर पधारे, तो वहां तालियां नहीं गूंजी, मानो विस्फोट हुआ हो. अल्बानीज ने, जिन्होंने इसी स्टेडियम में प्रसिद्ध अमेरिकी गायक, गीतकार-संगीतकार ब्रूस स्प्रिंगस्टीन की मेजबानी की थी, मजाक में कहा भी कि 'द बॉस' ने भी ऐसा स्वागत नहीं देखा होगा. स्टेडियम में चारों तरफ गूंजते 'मोदी, मोदी, मोदी' के नारे ऑस्ट्रेलियाई खेल के नारे 'ओइ! ओइ! ओइ!' से टकरा रहे थे.

यह प्रधानमंत्री मोदी के इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरे का दूसरा मेलबर्न था. यह वह अंदाज था, जिसे 2014 से अब तक लगभग 100 देशों की सौ से अधिक विदेश यात्राओं में परखा जा चुका है. यह रिकॉर्ड नरेंद्र मोदी से पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के पास नहीं रहा. मोदी की कूटनीति को, जिसे मोदीप्लोमेसी कहा जाना चाहिए, केवल इसकी मात्रा नहीं, बल्कि इसका भूगोल और इसकी भाषा भी अलग बनाता है. जहां अमेरिकी, रूसी, चीनी और कई यूरोपीय नेता परंपरागत रूप से वाशिंगटन, मास्को, बीजिंग, लंदन, पेरिस और टोक्यो के परिचित चक्र में घूमते रहे हैं, वहीं नरेंद्र मोदी ने जानबूझकर इस चिर-परिचित घेरे से बाहर कदम रखा है.

वह इस्राइल, फिलिस्तीन, मंगोलिया, रवांडा और हाल ही में इस यात्रा से कुछ हफ्ते पहले स्वतंत्रता के बाद पहली बार स्लोवाकिया जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने. प्रधानमंत्री मोदी ने फिजी, सेशेल्स, मॉरीशस, पापुआ न्यू गिनी, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों का दौरा किया है. ये ऐसे देश हैं, जो आमतौर पर बड़ी शक्तियों की यात्राओं में शामिल नहीं होते, लेकिन इन देशों में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी रहती है. ऐसे में, प्रधानमंत्री की इन यात्राओं में हर जगह एक समान सूत्र उभरता है. यह दरअसल उस प्रवासी समुदाय को फिर से जोड़ने की कोशिश है, जिसे पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने व्यवस्थित रूप से नहीं साधा.

नरेंद्र मोदी की यह कूटनीतिक यात्रा ह्यूस्टन के ‘हाउडी मोदी’ से मेलबर्न के खचाखच भरे उस डॉकलैंड्स स्टेडियम तक अनवरत जारी रही, जहां उन्होंने कहा कि भजन, क्लबिंग और बैकयार्ड क्रिकेट से भरे उनके सप्ताहांत दिखाते हैं कि विदेश में जीवन और भारतीय पहचान साथ-साथ चल सकते हैं. इस भूगोल के साथ वस्तुत: एक अधिक व्यक्तिगत भाषा भी जुड़ी है, जो पारंपरिक कूटनीति के औपचारिक बयान और सीमित हाथ मिलाने से बिल्कुल अलग है. बराक ओबामा से लेकर इमैनुएल मैक्रों तक विदेशी नेताओं को दिया गया ‘मोदी हग’ अब इतना जानने-पहचानने योग्य हो गया है कि विदेशी मीडिया इसे एक प्रतीकात्मक संकेत के रूप में पहले से ही देखता है. मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान स्टीव वॉ के साथ अपनी दो दशक पुरानी तस्वीर दिखाना, जो नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के समय की थी, इसी शैली को परिभाषित करता है.

संख्याएं भी मोदी की इस अनूठी कूटनीतिक शैली का हिस्सा बन चुकी हैं. उदाहरण के लिए, जकार्ता में मोदी ने भारतीय समुदाय से कहा कि गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को 2+6=8 की तरह पढ़ा जा सकता है, जिसे राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की उपलब्धियों से जोड़ने की कोशिश की गयी. हालांकि यह बात पूरी तरह नहीं बैठी, क्योंकि गणतंत्र दिवस एक वार्षिक आयोजन है, न कि पिछले वर्ष की घटना, जैसा कि उनका संकेत था. विपक्ष ने इसे दिखावा बताया. लेकिन इन सबसे बेपरवाह मोदी ने मेलबर्न में एक अलग ही गणित पेश किया. भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध को 1+1=11 बताते हुए उन्होंने कहा कि यह साझेदारी केवल जोड़ नहीं, बल्कि गुणात्मक वृद्धि है. उन्होंने इस यात्रा को अपना 'हैट-ट्रिक कहा' और प्रवासी समुदाय से अपने नये देश के लिए 'चौके-छक्के' लगाने का आग्रह किया. यह एक ऐसा रूपक है, जिसे उनका श्रोता वर्ग भलीभांति समझता है.

यदि प्रधानमंत्री मोदी की इन कूटनीतिक यात्राओं की सजावट को हटा दिया जाए, तब भी उनके विदेश दौरे का एजेंडा महत्वपूर्ण बना रहता है. जैसे कि जकार्ता में रक्षा और अंतरिक्ष सहयोग सहित 16 समझौते हुए. मेलबर्न में लंबे समय से अटके यूरेनियम समझौते और रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाया गया. ऑकलैंड में भारत-न्यूजीलैंड व्यापार समझौते पर बातचीत हुई. प्रधानमंत्री मोदी के पास अब तीन दर्जन से अधिक अंतरराष्ट्रीय नागरिक सम्मान हैं. हाल ही में इंडोनेशिया का बिंतांग आदिपूर्णा पुरस्कार भी उन्हें मिला, जिससे वह भारत के सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाने वाले प्रधानमंत्री बन गये हैं. यह भी एक बड़ी तथा अनूठी उपलब्धि है. विपक्षी नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री की इन विदेश यात्राओं पर पिछले एक दशक में लगभग 762 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी कर दी जाती है कि इन यात्राओं से देश को कितना लाभ हुआ है और हो रहा है.

जाहिर है, बड़ी तस्वीर करिश्मे से ज्यादा गणित की है. करीब 1.4 अरब लोगों का भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था है. जब प्रधानमंत्री मोदी मेलबर्न, जकार्ता या बर्लिन पहुंचते हैं, तो वह भारतीय उपभोक्ताओं और लाखों की संख्या में मौजूद प्रवासी समुदाय तक पहुंच का रास्ता खोलते हैं. इससे बाहर रह रहे प्रवासी भारतीयों की आवाज जितनी मजबूत होती है, खुद भारत को भी इसका उतना ही ज्यादा लाभ मिलता है यही ताकत उन्हें चयन की स्वतंत्रता देती है. चूंकि दूसरे देशों को भारत की जरूरत है, ऐसे में भारत का प्रधानमंत्री अपने स्वागत की जगह खुद तय कर सकता है. जैसे भोज कक्ष की जगह स्टेडियम में कार्यक्रम का आयोजन होना, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जुटें और आयोजन दिखे भी.

मेजबान देश इस अनौपचारिकता को केवल स्वीकार ही नहीं करते, बल्कि उसी के अनुसार कार्यक्रम भी तैयार करते हैं. उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री अल्बानीज के कार्यालय ने 30,000 सीटों वाले स्टेडियम में कार्यक्रम आयोजित किया. नीस के मेयर ने शहर के टाउन हॉल पर भारत का तिरंगा फहराने का आदेश दिया, जो शायद ही किसी अतिथि नेता के लिए किया जाता है. यह सब प्रोटोकॉल की किसी किताब में लिखा हुआ नहीं है. इसके बावजूद भारत की शर्तें मानी जाती हैं, क्योंकि मेजबान यह मान चुके हैं कि मोदी से उनके तरीके से मिलना, उन्हें अपने तरीके से मिलने के लिए मजबूर करने से अधिक लाभकारी है. यही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कूटनीतिक रूप से विशिष्ट और लोकप्रिय बनाता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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