डिजिटल मंच के जरिये वैश्विक होती मधुबनी पेंटिंग

मधुबनी पेंटिंग सिर्फ कला नहीं, बल्कि मिथिला की संस्कृति का प्रतीक है. आज सोशल मीडिया के माध्यम से यह कला विश्वभर में अपनी पहचान बना रही है. जानें कैसे डिजिटल मंच कलाकारों को सशक्त कर रहा है.

मधुबनी पेंटिंग केवल रंगों और बारीक लाइनों का संगम नहीं है. यह मिथिला की शताब्दियों पुरानी संस्कृति और सभ्यता की पहचान को समेटे हुए है. यह स्मृतियों और महिलाओं की रचनात्मक पहचान की कहानी है. कभी मिथिला की दीवारों की गरिमा बढ़ाने वाली यह पेंटिंग आज विश्वभर के लोगों की डिजिटल स्क्रीन तक पहुंच चुकी है, जिसमें अहम योगदान सोशल मीडिया, विशेषकर इंस्टाग्राम का है.

एक समय था जब मधुबनी पेंटिंग का संबंध मिथिला के विवाह, धार्मिक आयोजनों और पारंपरिक रीति-रिवाजों तक सीमित था. महिलाएं प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर घर की दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं, दैनिक दिनचर्या और तरह-तरह के जीवों जैसे मोर, मछली, हिरण को दर्शाती थीं. यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी समय के साथ आगे बढ़ती रही, पर डिजिटल युग ने इस कला को एक नया मंच प्रदान करने का काम किया है.

डिजिटल मंच के माध्यम से कलाकार न केवल अपनी कला दिखा रहे हैं, बल्कि देश-विदेश के कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित भी कर रहे हैं. इस प्रकार, कलाकार अब केवल प्रदर्शनियों और बाजारों पर निर्भर नहीं रह गये हैं. मिथिला पेंटिंग का अपना एक इतिहास रहा है. यह मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाती है. महिलाओं द्वारा घर के आंगन और दीवारों को शुभ अवसरों पर सजाते-सजाते यह कला धीरे-धीरे कागजों और कपड़ों पर बनने लगी और बाजार से जुड़ने लगी.

वर्ष 1960 के दशक में बिहार में अकाल पड़ने पर इस कला को कागज पर दर्शाया गया, ताकि कलाकारों को कुछ आर्थिक मदद मिल सके. धीरे-धीरे इस कला को देश और वैश्विक स्तर पर पहचान मिलने लगी. सोशल नेटवर्किंग ने इस प्रक्रिया को तेज करने का काम किया है. आज के समय में एक कलाकार अपनी कला को कहीं से भी और कभी भी, लोगों के सामने प्रदर्शित कर सकता है. असल में, कई कलाकारों ने शौकिया तौर पर सोशल मीडिया पर मिथिला पेंटिंग डालनी शुरू की थी. बड़े स्तर पर लोगों द्वारा पसंद किये जाने के बाद उन्हें लगा कि इसे पेशे के तौर पर अपनाया जा सकता है.

सच कहा जाए, तो सोशल मीडिया ने कलाकारों को उनकी पहचान बनाने और उसे पेशे के रूप में अपनाने का अवसर दिया है. पहले कलाकारों को अपनी कला बेचने के लिए प्रदर्शनियों और बड़े बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता था, पर अब सोशल मीडिया के माध्यम से वे सीधे ग्राहकों से जुड़ सकते हैं. कई कलाकारों ने बताया है कि सोशल मीडिया के जरिये उन्हें भारत के अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी ऑर्डर मिलने लगे हैं. अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और दुबई जैसे देशों तक मधुबनी कला पहुंच रही है. सोशल मीडिया की खूबी यह भी है कि यहां कलाकारों को अधिक खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती.

किसी बड़े इ-कॉमर्स साइट पर रजिस्टर होने के लिए पैसों की आवश्यकता नहीं होती. एक अच्छी तस्वीर या वीडियो, सही कैप्शन और दर्शकों से संवाद, कला को बाजार तक पहुंचाने का साधन बन जाती है. यह सच है कि मधुबनी पेंटिंग को जीवंत रखने और पहचान दिलाने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. सोशल मीडिया ने महिलाओं को दुनिया के सामने अपनी कला तथा पहचान रखने में मदद की है. इसने महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त भी किया है. महिलाएं घर का काम करने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर पेंटिंग बनाकर आय अर्जित कर रही हैं.

ग्रामीण महिलाएं, जो पहले तकनीक से कोसों दूर थीं, अब स्मार्टफोन के जरिये धीरे-धीरे मोबाइल, इंस्टाग्राम और डिजिटल मार्केटिंग सीख रही हैं. मिथिला पेंटिंग के बाजार में भी समय के साथ बदलाव आया है. पहले जो कला घरों की दीवारों का हिस्सा थी, आज वह पेंटिंग, कपड़े और बैग के माध्यम से वैश्विक बाजार तक अपनी पहुंच बना चुकी है. भले ही आज भी ग्राहकों में पारंपरिक थीम की पेंटिंग ज्यादा प्रचलित हैं, जिनमें देवी-देवताओं के चित्र, जैसे राधा-कृष्ण, राम-सीता विवाह, सूर्य-चंद्रमा, पेड़-पौधे, मछली, मोर और मिथिला के विवाह संस्कार शामिल हैं, पर इन दिनों कलाकार पारंपरिक विषयों के अतिरिक्त महिला सशक्तीकरण के साथ सामाजिक और पर्यावरण के मुद्दों पर भी पेंटिंग बना रहे हैं.

जिस तरह किसी भी तकनीक की अपनी खूबियां और खामियां होती हैं, उसी तरह सोशल मीडिया की भी हैं. जहां उसने कलाकारों को पहचान दिलाने और आर्थिक रूप से समृद्ध करने का काम किया है. वहीं कुछ नयी समस्याएं भी पैदा हुई हैं. सोशल मीडिया पर किसी भी चित्र या वीडियो की आसानी से कॉपी की जा सकती है. मधुबनी पेंटिंग के कलाकारों का कहना है कि कई बार बिना अनुमति के उनकी कला कॉपी कर ली जाती है. तो कई बार उनकी कला को अपना बताकर पोस्ट कर दिया जाता है. पारंपरिक कला, विशेषकर मधुबनी पेंटिंग के लिए, जो एक संस्कृति को परिभाषित करती है, यह एक बड़ी चुनौती है. किसी कलाकार की पहचान उसकी पेंटिंग होती है, साथ ही उसके पीछे उसकी मेहनत, अनुभव और सांस्कृतिक ज्ञान भी जुड़ा होता है. कलाकारों के लिए सोशल मीडिया पर कला साझा करना जरूरी है, पर इसके साथ ही उन्हें अधिकारों और कॉपीराइट को लेकर जागरूकता भी बढ़ानी होगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं)


प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: Navneet Jha

Published by: Rajneesh Anand

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >