गांव की डायरी बनी उपन्यास की प्रेरणा, पढ़ें ज्यां द्रेज का खास लेख

Line Paar : कोई अखबार नहीं, कोई खेल नहीं, कोई सांस्कृतिक जुटान नहीं और (लगभग) कोई प्रेम-प्रसंग नहीं. रोमांच, सौंदर्य, आनंद, उम्मीद छोटी-छोटी दयाओं में निहित लगती है - एक इंद्रधनुष, कोई खास पकवान, कोई अच्छा मजाक. समय हालांकि अपने साथ कुछ अलग लेकर आता है.

Line Paar : मुझे बहुत खुशी है कि राजकमल प्रकाशन ने ‘लाइन पार’ के नाम से एक नया उपन्यास प्रकाशित किया है. लुक लेरूथ द्वारा लिखित इस उपन्यास की प्रेरणा एक डायरी है, जो मैंने उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गांव पालनपुर में रहते समय लिखी थी. आम दिनों पालनपुर की ज़िन्दगी बहुत शांत रहती है. किसान खेतों में व्यस्त होते हैं, महिलाएं बच्चों और मवेशियों की देखभाल करती हैं, बच्चे इधर-उधर खेलते रहते हैं, कुछ लोग काम के लिए चंदौसी (जो कि सबसे नजदीकी शहर है) आते-जाते हैं, कुछ लोग रेल की पटरियों के किनारे ताश खेलते हैं या चाय की दुकान पर गप-शप मारते हैं.

कोई अखबार नहीं, कोई खेल नहीं, कोई सांस्कृतिक जुटान नहीं और (लगभग) कोई प्रेम-प्रसंग नहीं. रोमांच, सौंदर्य, आनंद, उम्मीद छोटी-छोटी दयाओं में निहित लगती है – एक इंद्रधनुष, कोई खास पकवान, कोई अच्छा मजाक.
समय हालांकि अपने साथ कुछ अलग लेकर आता है. मसलन, शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार, चुनाव, मेहमान और यहां तक कि बदमाश बंदरों की खुराफातें भी इस गांव के दैनिक जीवन में कुछ उत्साह भर देती हैं. कभी-कभार कबड्डी का खेल या घुमंतू कलाबाजों की टोली खुशमिजाज़ भीड़ को आकर्षित करती है. कभी-कभार झगड़ा, डकैती, अफवाह, दुर्घटना या यहां तक कि प्रेम-प्रसंग से नीरसता नाटकीय रूप से टूट जाती है. बेशक, पीढ़ी दर पीढ़ी, गांव में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, जो स्वतंत्र भारत के ऐतिहासिक परिवर्तन को दर्शाते हैं.


1983-84 के बीच जब मैं पालनपुर में रहता था, तो इन छोटी-बड़ी घटनाओं का विस्तृत विवरण मैं अपनी डायरी में लिखता रहता था. मैंने वहां एक साल बिताया. शायद ही कभी गांव से बाहर निकला. पालनपुर में मैं दो सहकर्मियों के साथ गांव का विस्तृत अध्ययन कर रहा था. इस कार्य से गांव के बारे में बहुत कुछ सीखने के अलावा, मैंने खुद को पालनपुर के सामाजिक जीवन में डुबो लिया, कई दोस्त बनाये, कुछ दुश्मन भी बनाये और आम तौर पर सभी को जानने लगा. मैंने थोड़ी-सी जमीन पर खेती करने का प्रयास भी किया, जो पहले तो सफल रहा, लेकिन बाद में खराब मानसून के कारण बर्बाद हो गया. खाली समय में मैं अपनी डायरी अपडेट करता रहता था.


कई साल बाद, मैंने अपने पालनपुर के नोट्स और यादों को अपने दोस्त लुक लेरूथ के साथ साझा किया, जो भारत के बारे में काफी अनुभव रखने वाले एक कुशल लेखक हैं. लुक ने कहा कि मेरे डायरी में एक उपन्यास के लिए बहुत सारी सामग्री और प्रेरणा है. मुझे उम्मीद है कि इस पुस्तक के अंत तक पाठक इस बात से सहमत होंगे.


‘लाइन पार’ शीर्षक पालनपुर के सामने चलने वाली रेलवे लाइन से प्रेरित है. यदि आप रेलवे प्लेटफॉर्म से गांव की ओर देखते हैं, तो वह लाइन पार है, लेकिन लाइन पार का एक और अर्थ भी है. जब कोई रेलगाड़ी पालनपुर से गुजरती, तो ऐसा लगता है कि गांव थोड़ा हिल रहा है. उसी तरह, मैंने पाया कि जब भारत स्वतंत्र हुआ और पालनपुर में आर्थिक विकास होने लगा, तब गांव का समाज हिलने लगा. एक तरफ उत्पीड़ित लोग (दलित, महिला, मज़दूर, गरीब) शोषण से बचने की कोशिश करने लगे और दूसरी तरफ दबंग वर्ग गांव के समाज पर अपनी पकड़ बनाये रखने की कोशिश करता रहा. लाइन पार, उत्पीड़ित समूहों द्वारा पारंपरिक सामाजिक सीमाओं को पार करने के संघर्ष की एक छवि है.


यह रेखा अलग-अलग लोगों के लिए अलग प्रकार की है. जैसे महिलाओं के लिए पितृसत्ता हो सकती है, दलितों के लिए जाति-व्यवस्था हो सकती है, गरीब लोगों के लिए आर्थिक शोषण आदि. कुछ लोग, जैसे दलित महिलाएं, अनेक बंधनों से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यह कहना मुश्किल है कि उनका संघर्ष सफल हुआ, लेकिन संघर्ष की शुरुआत जरूर हो चुकी है. बहरहाल, इन मामलों में पालनपुर को भारत के लघु चित्र के रूप में देखा जा सकता है.


यह किताब गंभीर और मजेदार दोनों ही है. पालनपुर में कई लोगों का जीवन बहुत कठिन है, लेकिन इन कठिनाइयों के बावजूद वह जिंदगी में (और जिंदगी पर) हंसना नहीं भूले. मेरा असली उद्देश्य पालनपुर के द्वारा भारतीय समाज के बारे में सीखना है. मैं पालनपुर के लोगों के प्रति उनकी मित्रता के लिए आभारी हूं. ऐसा लग सकता है कि हम उनसे बहुत दूर हैं, लेकिन मनुष्य चाहे तो उस दूरी को नज़रअंदाज़ कर एक-दूसरे की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है. पालनपुर के लोगों ने मुझे ऐसा महसूस कराया कि मैं उन्हीं के परिवार का एक सदस्य हूं. मैं उन्हें हमेशा याद रखूंगा.

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