कांग्रेस में नेतृत्व का संकट

प्रश्न यह उठता है कि जो अध्यक्ष बनेगा, तो क्या वह राहुल गांधी और सोनिया गांधी से निर्देश लेगा अथवा अपने राजनीतिक विवेक से पार्टी के फैसले लेगा.

राशिद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार

delhi@prabhatkhabar.in

कांग्रेस के अंदर अभी जो भी झगड़े हैं और नेतृत्व को लेकर जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वह एक लंबी लड़ाई का रूप धारण करनेवाले हैं. कांग्रेस के इतिहास में भी इस तरह के अंतर्कलह कई बार सामने आये हैं. वर्तमान प्रकरण उसी इतिहास में एक नये अध्याय की तरह जुड़ जायेगा. साल 1968-69 में इंदिरा गांधी की सरकार जब सत्ता में थी, तब भी कुछ वरिष्ठ नेताओं ने उनके नेतृत्व पर सवाल उठाये थे. राजीव गांधी के नेतृत्व में भी पार्टी में बगावत के सुर उभरे थे. हालांकि, वर्तमान विद्रोह पहले के मामलों से काफी अलग है. पार्टी में पहले विद्रोह तभी हुआ था, जब पार्टी सत्ता में थी और अधिकांश मामलों में गांधी परिवार को जीत हासिल हुई थी. वर्तमान में जो उठापटक मची हुई है, वह राजनीतिक रूप से वाकई दयनीय है. पार्टी में नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों का कोई आसान समाधान नहीं दिख रहा है.

हमारे देश की राजनीति पहले से कहीं ज्यादा अब एक व्यक्ति विशेष के इर्द-गिर्द घूमती है. साल 1952 के चुनाव में कांग्रेस का नारा था, ‘वोट फॉर नेहरू, वोट फॉर कांग्रेस’. कांग्रेस के नाम पर वोट मांगे जा रहे थे कि कांग्रेस को वोट दीजिए, तो नेहरू जी की स्थिति अच्छी होगी. इसके बाद इंदिरा गांधी तथा नरेंद्र मोदी के काल में भी राजनीति हमेशा से एक व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है. उस संदर्भ में देखा जाए, तो कांग्रेस का नेतृत्व हमेशा से नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में रहा है. मनमोहन सिंह के काल में भी राजनीतिक नेतृत्व सोनिया गांधी के हाथों में ही था. गैर नेहरू-गांधी परिवार के व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने की जो बात उठती है, उसमें भी प्रश्न यह उठता है कि जो अध्यक्ष बनेगा, तो क्या वह राहुल गांधी और सोनिया गांधी से निर्देश लेगा अथवा अपने राजनीतिक विवेक से पार्टी के फैसले लेगा.

अगर वह गांधी परिवार के निर्देशों पर ही काम करेगा, तो ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने से भी कोई फायदा नहीं होगा. जब सीताराम केसरी पार्टी के अध्यक्ष थे, तब तक सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति में आ चुकी थीं. उस दौर में ऑस्कर फर्नांडिस जैसे बड़े नेता फाइलें लेकर केसरी जी के घर आते थे और सिर्फ उनसे हस्ताक्षर करवा कर चले जाते थे. साल 1992 के चुनाव में केसरी जी चुनाव प्रचार तो दूर, वे अपने घर से भी बाहर नहीं निकले. ऐसे अध्यक्ष का भी कोई फायदा नहीं है. अभी जो मामला सामने आया है, उसमें पत्र लिखने वालों में तीन तरह के लोग हैं. पहले, जिन्हें सचमुच कांग्रेस के भविष्य की चिंता है.

दूसरे वे हैं, जो यह चाहते हैं कि राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष न बनें, क्योंकि उनके अध्यक्ष बनने से इन नेताओं की जो पार्टी में अभी पकड़ एवं पद हैं, वे समाप्त हो जायेंगे. तीसरा समूह वह है, जो कांग्रेस को कमजोर करना चाहता है. साल 2014 के चुनाव के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया, भुवनेश्वर कलिता जैसे कई महत्वपूर्ण नेता पार्टी छोड़ कर चले गये हैं. इनमें से अधिकतर भाजपा में शामिल हुए हैं. ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस को भी बहुत सतर्क रहना पड़ता है कि कहीं पत्र लिखने के पीछे कोई राजनीतिक एजेंडा तो नहीं है अथवा यह मात्र एक नेक नीयत से की गयी कोशिश है.

प्रथमदृष्टया तो यही नजर आ रहा है कि अभी कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं है. भाजपा में अटल-आडवाणी की जोड़ी ने ढाई दशक तक भाजपा का नेतृत्व किया, लेकिन नरेंद्र मोदी के उदय के साथ ही आडवाणी का पतन शुरू हो गया, लेकिन कांग्रेस के पास फिलहाल ऐसा कोई विकल्प नहीं है. कार्यकर्ता अब भी गांधी परिवार के प्रति एक ऋणी की तरह देखते हैं और उन्हें प्रियंका गांधी में नया नेतृत्व भी दिखायी पड़ता है. पार्टी इसी दुविधा में है. जैसे ही पार्टी को एक बेहतर विकल्प मिल जायेगा, फिर वही हश्र होगा, जो नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी का हुआ था.

पहले धर्म राजनीति का केंद्र नहीं हुआ करता था, लेकिन भाजपा ने धर्म और आस्था को राजनीति में लाकर खड़ा कर दिया है. ऐसे में कांग्रेस पार्टी, जो धर्मनिरपेक्षता के एजेंडे के साथ आगे बढ़ती रही है, उसके सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है. प्रकृति का नियम है, जब कोई चीज टूटती है, तभी एक नयी चीज का निर्माण होता है. इंदिरा गांधी के नेतृत्वकाल में भी कई नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया था, लेकिन तब भी कांग्रेस ने खुद को नये स्वरूप में संगठित करके एक मजबूत पार्टी के रूप में खड़ा किया था.

भारत में अभी जो गैर-भाजपा दल हैं, वे कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानते हैं. बहुत से ऐसे नेता रहे हैं, जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नयी पार्टी बनायी है और राज्य स्तर पर ही सही, लेकिन अपने आपको मजबूती से खड़ा करने में कामयाब रहे हैं जैसे- शरद पवार और जगनमोहन रेड्डी. अभी जिन 23 लोगों ने कांग्रेस आलाकमान को पत्र लिख कर भेजा है, ऐसा हो सकता है कि वे भी पार्टी से अलग होकर एक नयी पार्टी का गठन करें और कांग्रेस से पहले ही छिटक कर अलग हो चुकी पार्टियों के साथ गठबंधन करें और खुद को असली कांग्रेस के रूप में जनता के सामने पेश कर दें. ऐसी भी संभावना है कि इस मामले में कोई कानूनी चुनौती भी पेश की जा सकती है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस पार्टी अभी एक बड़े अंतर्द्वंद्व से गुजर रही है. उसके सामने समस्या है कि वह पहले अपने घर को ठीक करे अथवा जो प्रश्न मीडिया एवं बुद्धिजीवी वर्ग उठा रहे हैं, उनका हल ढूंढे. मीडिया एवं बुद्धिजीवी वर्ग, जो लगातार नेहरू-गांधी परिवार से इतर पार्टी नेतृत्व की मांग कर रहे हैं और ऐसी कल्पना कर रहे हैं कि ऐसा होने से पार्टी का कल्याण हो जायेगा, यह तथ्यों से परे बात है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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