ब्रिक्स में दिखा भारत का बढ़ा हुआ कद

BRICS : पुतिन पर यूक्रेन युद्ध के कारण युद्धापराध का आरोप है और ब्राजील अंतरराष्ट्रीय अदालत का सदस्य है. जाहिर है, पुतिन पर लगे आरोप ब्राजील में बाध्यकारी थे, इसलिए सम्मेलन में शामिल होने के बजाय पुतिन ने वीडियो कॉन्फ्रेंस का विकल्प चुना.

BRICS : ब्राजील में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिहाज से बहुत ही सफल रहा. इसमें पहलगाम हमले की निंदा की गयी और घोषणापत्र में सीमापार आतंकवाद को शामिल किया गया. यही नहीं, ब्रिक्स घोषणापत्र में सीसीआइटी-यानी कॉम्प्रीहेंसिव कॉन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म (अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन) का भी सदस्य देशों ने समर्थन किया, जो संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहल रही है. इसके तहत विभिन्न आतंकवादी गतिविधियों को परिभाषित करने, उन्हें आपराधिक घोषित करने, आतंकवादियों को सजा देने और प्रत्यर्पित करने का प्रावधान है. आतंकवाद पर सख्ती के अलावा सुधार, बहुध्रुवीय विश्व आदि पर भारत के रुख को भी ब्रिक्स सम्मेलन में समर्थन मिला. अगर एससीओ की पृष्ठभूमि में देखें, जिसके घोषणापत्र में बलूचिस्तान में हुई आतंकी घटना का तो जिक्र था, लेकिन पहलगाम का जिक्र नहीं था, तो ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के रुख को भारी समर्थन मिला.

सम्मेलन में एआइ यानी कृत्रिम मेधा के जिम्मेदार उपयोग पर साझा रणनीति बनाने का प्रस्ताव तो रखा ही गया, भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पहल की भी सराहना हुई. अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और वैश्विक सहयोग की जरूरत बतायी, साथ ही, गाजा पट्टी में संघर्ष और ईरान-इस्राइल के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में शांति और संवाद के माध्यम से समाधान पर भी बल दिया. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार पर जोर दिया और इन संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की. प्रधानमंत्री मोदी ने पर्यावरण, जलवायु सम्मेलन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर बोलते हुए अपने यहां की आयुष्मान भारत योजना का उल्लेख किया और कहा कि लोगों और धरती का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है.
ब्राजील में हुए ब्रिक्स सम्मेलन को इसलिए भी याद किया जायेगा कि राष्ट्रपति बनने के बाद शी जिनपिंग पहली बार इसमें गैरहाजिर रहे. इतने महत्वपूर्ण आयोजन में जिनपिंग क्यों नहीं आये?

इस बारे में बहुत सारे तथ्य सामने आये हैं. यहां तक कि जिनपिंग द्वारा सत्ता हस्तांतरित करने की बात भी कही गयी, जो सही नहीं लगती. चीन एक ऐसा देश है, जिससे जुड़ी सच्चाई कभी सार्वजनिक नहीं होती. तथ्य यह है कि चीनी सत्ता पर जिनपिंग की पकड़ अब भी बहुत मजबूत है. जिनपिंग ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इसलिए नहीं पहुंचे, क्योंकि ब्राजील में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होने वाला विशिष्ट सलूक उन्हें रास नहीं आता. प्रधानमंत्री सिर्फ ब्रिक्स के सम्मेलन में भाग लेने नहीं गये थे, यह ब्राजील का उनका राजकीय दौरा था. रियो डे जेनेरियो में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद वह द्विपक्षीय वार्ता के लिए ब्रासीलिया गये. भारतीय प्रधानमंत्री के सम्मान में ब्राजील की लूला सरकार ने डिनर भी रखा. खुद को शक्तिमान और महत्वपूर्ण समझने वाले जिनपिंग को यह सब अखर गया. इसलिए उन्होंने शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया. हालांकि यह भी सच है कि चीन इस समय विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है, जिनसे उबरना ज्यादा जरूरी है. इसलिए भी जिनपिंग ने ब्राजील न जाने का फैसला किया हो, तो आश्चर्य नहीं.
जिनपिंग के अलावा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मौजूद नहीं थे.

पुतिन पर यूक्रेन युद्ध के कारण युद्धापराध का आरोप है और ब्राजील अंतरराष्ट्रीय अदालत का सदस्य है. जाहिर है, पुतिन पर लगे आरोप ब्राजील में बाध्यकारी थे, इसलिए सम्मेलन में शामिल होने के बजाय पुतिन ने वीडियो कॉन्फ्रेंस का विकल्प चुना. हालांकि अगर ब्राजील चाहता, तो पुतिन को गिरफ्तार न करने का आश्वासन दे सकता था. लेकिन ब्राजील ने ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया. इस लिहाज से देखें, तो मेजबान ब्राजील ने चीन और रूस की तुलना में भारत को ज्यादा महत्व दिया. यह विश्व मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव का सबूत है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स सम्मेलन में अमेरिकी नीतियों की आलोचना को गंभीरता से लिया और ब्रिक्स देशों पर शुल्क लगाने की धमकी दी. लेकिन ट्रंप को समझना होगा कि वैश्विक नीतियां अमेरिका या किसी एक देश के मुताबिक नहीं चल सकतीं. सच तो यह है कि ब्रिक्स एक महत्वपूर्ण वैश्विक संगठन के रूप में उभर रहा है. दुनिया की करीब आधी आबादी यहां रहती है, तो यह वैश्विक भूभाग का 36 प्रतिशत है.

वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी है. ब्रिक्स में डेवलपर्स और उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी संख्या है. फिलहाल इसके सदस्यों की संख्या ग्यारह है, लेकिन इसमें और वृद्धि होगी. भारत का महत्व इस कारण है कि यह एक बड़ा लोकतंत्र होने के साथ बड़ी अर्थव्यवस्था भी है, जिसने हाल के वर्षों में भारी तरक्की की है. वैश्विक सुस्ती के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर विश्व में सबसे तेज है. पर सिर्फ इन वजहों से नहीं, भारत का महत्व इसलिए भी बढ़ रहा है कि वह बहुध्रुवीय विश्व की बात करता है. ब्रिक्स के सदस्य देश ज्यादातर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं. इसमें अमेरिकी नीतियों की आलोचना भी होती है, जैसी कि इस बार भी हुई. पर भारत इस संगठन को अमेरिका या पश्चिम-विरोधी नहीं मानता. इससे पहले जब चीन ने अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने के लिए ब्रिक्स की अपनी मुद्रा की बात कही थी, तब भी भारत ने उसका विरोध किया था. कुल मिलाकर, सबको साथ लेकर चलने का यह नजरिया ही भारत को महत्वपूर्ण बनाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी कि ‘अगले साल ब्रिक्स की अध्यक्षता की जिम्मेदारी संभालते हुए हम इस विश्व संगठन को नयी पहचान देने के लिए काम करेंगे. ब्रिक्स का मतलब होगा, आपसी सहयोग और टिकाऊ विकास के लिए लचीलेपन और नवाचार को प्राथमिकता देना. जैसे कि भारत ने जी-20 की अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल साउथ को प्राथमिकता दी’. उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिक्स में अधिक समावेशी और समतापूर्ण वैश्विक भविष्य को आकार देने की अपार क्षमता है और यह ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देता है.


भारत जी-20, क्वाड, ब्रिक्स और एससीओ का सदस्य है तथा जी-7 में आमंत्रित सदस्य है. यह विश्व मंच पर भारत के बढ़ते महत्व का परिचायक है. चूंकि भारत देशों को जोड़ने की बात करता है, सो आने वाले दिनों में इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण होने वाली है. निकट भविष्य में यह बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.) में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिहाज से बहुत ही सफल रहा. इसमें पहलगाम हमले की निंदा की गयी और घोषणापत्र में सीमापार आतंकवाद को शामिल किया गया. यही नहीं, ब्रिक्स घोषणापत्र में सीसीआइटी-यानी कॉम्प्रीहेंसिव कॉन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म (अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन) का भी सदस्य देशों ने समर्थन किया, जो संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहल रही है. इसके तहत विभिन्न आतंकवादी गतिविधियों को परिभाषित करने, उन्हें आपराधिक घोषित करने, आतंकवादियों को सजा देने और प्रत्यर्पित करने का प्रावधान है. आतंकवाद पर सख्ती के अलावा सुधार, बहुध्रुवीय विश्व आदि पर भारत के रुख को भी ब्रिक्स सम्मेलन में समर्थन मिला. अगर एससीओ की पृष्ठभूमि में देखें, जिसके घोषणापत्र में बलूचिस्तान में हुई आतंकी घटना का तो जिक्र था, लेकिन पहलगाम का जिक्र नहीं था, तो ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के रुख को भारी समर्थन मिला.

सम्मेलन में एआइ यानी कृत्रिम मेधा के जिम्मेदार उपयोग पर साझा रणनीति बनाने का प्रस्ताव तो रखा ही गया, भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पहल की भी सराहना हुई. अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और वैश्विक सहयोग की जरूरत बतायी, साथ ही, गाजा पट्टी में संघर्ष और ईरान-इस्राइल के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में शांति और संवाद के माध्यम से समाधान पर भी बल दिया. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार पर जोर दिया और इन संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की. प्रधानमंत्री मोदी ने पर्यावरण, जलवायु सम्मेलन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर बोलते हुए अपने यहां की आयुष्मान भारत योजना का उल्लेख किया और कहा कि लोगों और धरती का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है.
ब्राजील में हुए ब्रिक्स सम्मेलन को इसलिए भी याद किया जायेगा कि राष्ट्रपति बनने के बाद शी जिनपिंग पहली बार इसमें गैरहाजिर रहे. इतने महत्वपूर्ण आयोजन में जिनपिंग क्यों नहीं आये? इस बारे में बहुत सारे तथ्य सामने आये हैं. यहां तक कि जिनपिंग द्वारा सत्ता हस्तांतरित करने की बात भी कही गयी, जो सही नहीं लगती.

चीन एक ऐसा देश है, जिससे जुड़ी सच्चाई कभी सार्वजनिक नहीं होती. तथ्य यह है कि चीनी सत्ता पर जिनपिंग की पकड़ अब भी बहुत मजबूत है. जिनपिंग ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इसलिए नहीं पहुंचे, क्योंकि ब्राजील में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होने वाला विशिष्ट सलूक उन्हें रास नहीं आता. प्रधानमंत्री सिर्फ ब्रिक्स के सम्मेलन में भाग लेने नहीं गये थे, यह ब्राजील का उनका राजकीय दौरा था. रियो डे जेनेरियो में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद वह द्विपक्षीय वार्ता के लिए ब्रासीलिया गये. भारतीय प्रधानमंत्री के सम्मान में ब्राजील की लूला सरकार ने डिनर भी रखा. खुद को शक्तिमान और महत्वपूर्ण समझने वाले जिनपिंग को यह सब अखर गया. इसलिए उन्होंने शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया. हालांकि यह भी सच है कि चीन इस समय विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है, जिनसे उबरना ज्यादा जरूरी है. इसलिए भी जिनपिंग ने ब्राजील न जाने का फैसला किया हो, तो आश्चर्य नहीं.


जिनपिंग के अलावा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मौजूद नहीं थे. पुतिन पर यूक्रेन युद्ध के कारण युद्धापराध का आरोप है और ब्राजील अंतरराष्ट्रीय अदालत का सदस्य है. जाहिर है, पुतिन पर लगे आरोप ब्राजील में बाध्यकारी थे, इसलिए सम्मेलन में शामिल होने के बजाय पुतिन ने वीडियो कॉन्फ्रेंस का विकल्प चुना. हालांकि अगर ब्राजील चाहता, तो पुतिन को गिरफ्तार न करने का आश्वासन दे सकता था. लेकिन ब्राजील ने ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया. इस लिहाज से देखें, तो मेजबान ब्राजील ने चीन और रूस की तुलना में भारत को ज्यादा महत्व दिया. यह विश्व मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव का सबूत है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स सम्मेलन में अमेरिकी नीतियों की आलोचना को गंभीरता से लिया और ब्रिक्स देशों पर शुल्क लगाने की धमकी दी. लेकिन ट्रंप को समझना होगा कि वैश्विक नीतियां अमेरिका या किसी एक देश के मुताबिक नहीं चल सकतीं.

सच तो यह है कि ब्रिक्स एक महत्वपूर्ण वैश्विक संगठन के रूप में उभर रहा है. दुनिया की करीब आधी आबादी यहां रहती है, तो यह वैश्विक भूभाग का 36 प्रतिशत है. वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी है. ब्रिक्स में डेवलपर्स और उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी संख्या है. फिलहाल इसके सदस्यों की संख्या ग्यारह है, लेकिन इसमें और वृद्धि होगी. भारत का महत्व इस कारण है कि यह एक बड़ा लोकतंत्र होने के साथ बड़ी अर्थव्यवस्था भी है, जिसने हाल के वर्षों में भारी तरक्की की है. वैश्विक सुस्ती के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर विश्व में सबसे तेज है. पर सिर्फ इन वजहों से नहीं, भारत का महत्व इसलिए भी बढ़ रहा है कि वह बहुध्रुवीय विश्व की बात करता है. ब्रिक्स के सदस्य देश ज्यादातर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं.

इसमें अमेरिकी नीतियों की आलोचना भी होती है, जैसी कि इस बार भी हुई. पर भारत इस संगठन को अमेरिका या पश्चिम-विरोधी नहीं मानता. इससे पहले जब चीन ने अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने के लिए ब्रिक्स की अपनी मुद्रा की बात कही थी, तब भी भारत ने उसका विरोध किया था. कुल मिलाकर, सबको साथ लेकर चलने का यह नजरिया ही भारत को महत्वपूर्ण बनाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी कि ‘अगले साल ब्रिक्स की अध्यक्षता की जिम्मेदारी संभालते हुए हम इस विश्व संगठन को नयी पहचान देने के लिए काम करेंगे. ब्रिक्स का मतलब होगा, आपसी सहयोग और टिकाऊ विकास के लिए लचीलेपन और नवाचार को प्राथमिकता देना. जैसे कि भारत ने जी-20 की अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल साउथ को प्राथमिकता दी’. उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिक्स में अधिक समावेशी और समतापूर्ण वैश्विक भविष्य को आकार देने की अपार क्षमता है और यह ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देता है.


भारत जी-20, क्वाड, ब्रिक्स और एससीओ का सदस्य है तथा जी-7 में आमंत्रित सदस्य है. यह विश्व मंच पर भारत के बढ़ते महत्व का परिचायक है. चूंकि भारत देशों को जोड़ने की बात करता है, सो आने वाले दिनों में इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण होने वाली है. निकट भविष्य में यह बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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