भारत रोजगार के मोर्चे पर निर्णायक पड़ाव पर खड़ा है. पिछले दशक में बुनियादी ढांचे, औपचारिकीकरण, वित्तीय समावेशन, कौशल और उद्यमिता पर सरकारी प्रयासों ने अवसरों का आधार बढ़ाया है. डाटाबेस आरबीआइ केएलइएमएस के अनुसार, देश में कार्यरत लोगों की संख्या 2014-15 के 47.15 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में 64.33 करोड़ हो गयी. अब प्रश्न है कि इस विस्तार को औपचारिक नौकरियों, ऊंची उत्पादकता, बेहतर वेतन और करियर प्रगति में कैसे बदला जाए. इसका उत्तर कार्यबल से बाहर युवाओं को समझे बिना नहीं मिल सकता.
नीति आयोग की 18 अगस्त को जारी रिपोर्ट, 'रीइमेजिनिंग स्किल्स फॉर विकसित भारत@2047’ बताती है कि एनएसएस के 2021 के 78वें दौर के अनुसार, नौकरी तलाश रहे युवाओं को अलग रखने के बाद भी नौ करोड़ युवा न शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न प्रशिक्षण में. इनमें लगभग 88 प्रतिशत घरेलू कामों में लगे हैं, इसलिए सभी को बेरोजगार कहना सही नहीं होगा. फिर भी चुनौती गंभीर है, क्योंकि बड़ी संख्या में युवा महिलाएं अवैतनिक देखभाल कार्य, सुरक्षा, आवागमन, सामाजिक मान्यताओं और स्थानीय अवसरों की कमी के कारण सवेतन काम से बाहर हैं. आंकड़ों को भी सही संदर्भ में पढ़ना जरूरी है. मासिक पीएलएफएस (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे) की साप्ताहिक स्थिति पिछले सात दिनों की गतिविधि दर्ज करती है, जबकि वार्षिक पीएलएफएस की सामान्य स्थिति पूरे वर्ष की तस्वीर देती है.
मासिक आंकड़े तात्कालिक बदलाव और वार्षिक आंकड़े लंबी अवधि की दिशा बताते हैं. जुलाई, 2026 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर जून के 5.5 फीसदी से घटकर 5.1 फीसदी हुई और महिला श्रम बल भागीदारी 34.4 प्रतिशत पर पहुंची. वार्षिक सर्वेक्षण में युवा बेरोजगारी 2024 के 10.3 फीसदी से घटकर 2025 में 9.9 प्रतिशत रही. लंबी अवधि की पीएलएफएस शृंखला भी सुधार दिखाती है. युवा बेरोजगारी 2017-18 के 17.8 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 10.2 फीसदी हुई. नियमित वेतन पाने वाले कामगारों का हिस्सा 2024 के 22.4 फीसदी से बढ़कर 2025 में 23.6 प्रतिशत हुआ, महिलाओं में यह 16.6 फीसदी से बढ़कर 18.2 प्रतिशत पर पहुंचा. अब रोजगार को अधिक उत्पादक, सुरक्षित और बेहतर पारिश्रमिक वाला बनाना होगा. इसी संदर्भ में सालाना दो करोड़ रोजगार की आकांक्षा को समझना होगा. इसका अर्थ हर वर्ष दो करोड़ सरकारी पद नहीं हो सकता.
आरबीआइ केएलइएमएस के अनुसार, नौ वर्षों में कार्यरत लोगों की संख्या 17.18 करोड़ बढ़ी, यानी औसतन करीब 1.9 करोड़ सालाना. यह बड़ा विस्तार है, पर कुल संख्या पूरी तस्वीर नहीं बताती. देश को सार्वजनिक रोजगार डैशबोर्ड चाहिए, जो औपचारिकीकरण, वास्तविक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, काम के घंटे, क्षेत्रवार उत्पादकता और स्थायी करियर की ओर प्रगति दिखाए. गुणवत्ता का यही प्रश्न हर परिवार की चिंता से जुड़ता है कि डिग्री के बाद अवसर कहां है. शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी वास्तविक चुनौती है, लेकिन बेरोजगार युवाओं में स्नातकों की बड़ी हिस्सेदारी का अर्थ यह नहीं कि अधिकांश स्नातक बेरोजगार हैं. उच्च शिक्षा का दायरा बढ़ने पर नौकरी तलाशने वालों में स्नातक भी बढ़ते हैं.
फिर भी इंतजार की आर्थिक और भावनात्मक कीमत युवा और परिवार, दोनों चुकाते हैं. इसलिए डिग्री से कौशल, कौशल से कार्य अनुभव और कार्य अनुभव से पहली अच्छी नौकरी तक भरोसेमंद पुल बनाना होगा. इस पुल की नींव तैयार है. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत 1.64 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षण मिला है और 2016 से 56.08 लाख से अधिक प्रशिक्षु अप्रेंटिसशिप से जुड़े हैं. जून, 2026 तक 13,888 से अधिक आइटीआइ चल रहे थे. वहीं 60,000 करोड़ रुपये की पीएम सेतु पहल उद्योग आधारित मॉडल से 1,000 सरकारी आइटीआइ का आधुनिकीकरण करेगी. अब व्यवस्था को प्रमाणपत्रों की संख्या से आगे ले जाकर सरकारी खर्च को स्थायी रोजगार, वेतन में प्रगति और नियोक्ता संतुष्टि से जोड़ना होगा.
रोजगार का भविष्य नौकरी पाने के साथ नौकरी देने की क्षमता बढ़ाने में भी है. विगत जून तक देश में तीन लाख से अधिक डीपीआइआइटी मान्यता प्राप्त स्टार्टअप थे और अप्रैल, 2026 तक उन्होंने 23 लाख से अधिक नये रोजगार सृजित किये थे. वर्ष 2014 में केवल चार यूनिकॉर्न यानी एक अरब डॉलर से अधिक मूल्य वाली स्टार्टअप कंपनियां थीं, अब इनकी संख्या 120 से अधिक है और संयुक्त मूल्यांकन 350 अरब डॉलर से ऊपर है. करीब आधे स्टार्टअप टियर 2 और टियर 3 शहरों से आते हैं. दिसंबर, 2025 तक 45 प्रतिशत से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप में कम से कम एक महिला निदेशक या भागीदार थी.
अब सूक्ष्म उद्यमों को बड़ा और औपचारिक बनने में मदद चाहिए. रोजगार परिवर्तन की सबसे बड़ी कसौटी महिलाओं की भागीदारी होगी. महिला श्रम बल भागीदारी 2017-18 के 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 फीसदी हुई. जन धन खातों में महिलाओं की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत है, मुद्रा ऋणों में उन्हें लगभग दो तिहाई हिस्सा मिला है और स्वयं सहायता समूहों से दस करोड़ से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं. नल का जल, स्वच्छ ईंधन और शौचालय घरेलू श्रम का बोझ घटाते हैं, जबकि घर का स्वामित्व आर्थिक सुरक्षा बढ़ाता है. अब महिलाओं को किफायती चाइल्डकेयर, सुरक्षित यातायात, महिला हॉस्टल, लचीले औपचारिक कार्य घंटे, डिजिटल पहुंच और घर के पास रोजगार चाहिए.
भारत ने रोजगार विस्तार की मजबूत नींव बना ली है. अब सरकार, उद्योग और शिक्षा जगत की साझेदारी संख्या को गुणवत्ता में बदल सकती है. सरकार रोजगार और वेतन के परिणाम सार्वजनिक करे, रिक्तियां समय पर भरे और परीक्षाओं की विश्वसनीयता सुनिश्चित करे. उद्योग सवेतन अप्रेंटिसशिप, पारदर्शी नियुक्तियां और करियर प्रगति के अवसर बढ़ाये. विश्वविद्यालय रोजगार योग्यता की जिम्मेदारी स्वीकार करें और जिला योजनाएं कौशल को स्थानीय उद्योग की मांग से जोड़ें. जब सीखने से कमाई, कमाई से प्रगति और प्रगति से उद्यमिता का रास्ता स्पष्ट होगा, तभी रोजगार विकसित भारत की मजबूत आधारशिला बनेगा. ( ये लेखक के निजी विचार हैं.)
