सकारात्मक है भारत-अमेरिका रक्षा समझौता, पढ़ें राजन कुमार का आलेख

India-US Relations : विशेषज्ञों ने भारत और अमेरिका के 'स्वाभाविक साझेदार' के रूप में गढ़े गये आख्यान पर सवाल उठाना शुरू कर दिया और भारत के प्रति ट्रंप प्रशासन की नीति में संभावित बदलाव की आशंका जतायी.

India-US Relations : भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों को लेकर उत्साहित था और भावनाएं बहुत सकारात्मक थीं. ये संबंध बढ़ते व्यापार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, रक्षा सहयोग और मजबूत प्रवासी भावनाओं पर आधारित थे. दोनों स्वाभाविक साझेदार और लोकतांत्रिक मित्र प्रतीत होते थे. लेकिन अमेरिका के उच्च टैरिफ, भारत-पाक युद्धविराम और देश की अर्थव्यवस्था को लेकर ट्रंप के अनर्गल बयानों ने दोनों देशों में तनाव पैदा किया. व्हाइट हाउस की पाक सैन्य प्रमुख के साथ निकटता और चीन के प्रति ट्रंप के नरम रवैये ने भी भारतीय नीति-निर्माताओं में गंभीर चिंता पैदा की.

विशेषज्ञों ने भारत और अमेरिका के ‘स्वाभाविक साझेदार’ के रूप में गढ़े गये आख्यान पर सवाल उठाना शुरू कर दिया और भारत के प्रति ट्रंप प्रशासन की नीति में संभावित बदलाव की आशंका जतायी. नयी दिल्ली ने अपनी नीति में भी बदलाव लाने की कोशिश की, जिसके तहत प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में भाग लेने चीन गये, निमंत्रण के बावजूद इस्राइल-गाजा शांति बैठक के लिए मिस्र की यात्रा से परहेज किया और कुआलालंपुर में आसियान शिखर सम्मेलन में भी शामिल नहीं हुए. ये घटनाक्रम दर्शाते हैं कि नयी दिल्ली ट्रंप प्रशासन के साथ अपने व्यवहार में सतर्कता बरत रही है.


बहरहाल, भारत और अमेरिका के बीच दस साल के रक्षा समझौते से दोनों देशों के बीच संबंध फिर से बहाल होने की उम्मीद जगी है. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और उनके भारतीय समकक्ष राजनाथ सिंह ने कुआलालंपुर में इस समझौते को अंतिम रूप दिया. अमेरिका द्वारा दस दिनों में चीन और भारत, दोनों के साथ अलग-अलग समझौते करना किसी विडंबना से कम नहीं है. इस विरोधाभासी नीतिगत रुख को कैसे समझा जाये? इसके बावजूद वाशिंगटन और नयी दिल्ली के बीच हुई दस वर्षीय संधि महत्वपूर्ण तो है ही. दोनों देशों के बीच कई रक्षा और सुरक्षा समझौतों का इतिहास रहा है. ‘भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के लिए नये ढांचे’ को 2015 में दस वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया था.

चूंकि यह विस्तार 2025 में समाप्त हो रहा था, इसलिए राजनाथ सिंह और पीट हेगसेथ के बीच हुई नवीनतम बैठक में इसे 2035 तक बढ़ा दिया गया है. दोनों देशों ने कई संस्थागत संवाद तंत्र भी विकसित किये हैं. जैसे, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के बीच 2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद तंत्र. दोनों देशों ने कई रक्षा समझौतों पर भी हस्ताक्षर किये हैं. जैसे- 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट, 2018 में कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट, 2019 में इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी एग्रीमेंट, और 2020 में बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट.

भारत अमेरिका के साथ सबसे ज्यादा सैन्य अभ्यास भी करता है. ये हैं- युद्ध अभ्यास (थलसेना), वज्र प्रहार (विशेष बल), मालाबार (नौसेना), कोप इंडिया (वायुसेना), और टाइगर ट्रायंफ (तीनों सेना). इसके अलावा अमेरिका से भारत की रक्षा खरीद लगभग 20 अरब डॉलर की है. कुछ प्रमुख खरीदों में सी-130जे, सी-17, अपाचे, चिनूक, एमएच60आर हेलीकॉप्टर और पी8I शामिल हैं. ये समझौते दोनों देशों को और करीब ला रहे थे. लेकिन ट्रंप की अमेरिका को फिर से महान बनाने की नीति ने भारत को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है.


ट्रंप तीन अंतर्निहित मान्यताओं के साथ अमेरिकी विदेश नीति को पुनर्परिभाषित करना चाह रहे हैं : अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व को बनाये रखना, यदि इससे लक्ष्य प्राप्ति में मदद मिलती है, तो विरोधियों के साथ भी संबंध बनाने के लिए तैयार रहना, और अमेरिकी प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिए मित्र देशों को भी अपने संबंधों को पुनर्गठित करने के लिए मजबूर करना. भारत अकेला मित्र देश नहीं है, जो दबाव में है. यूरोपीय संघ और जापान जैसे सहयोगियों के साथ भी ट्रंप सख्ती से पेश आये हैं. ट्रंप अपने पत्ते थोड़े बेढंगे ढंग से जरूर खेल रहे हैं, पर इसे अस्थायी नजरिया नहीं माना जाना चाहिए.

ट्रंप मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका की अपरिहार्यता को जानते हैं और इसका पूरा लाभ उठा रहे हैं. नयी दिल्ली की कमजोरी सेमीकंडक्टर सहित उच्च स्तरीय तकनीक के लिए अमेरिका पर उसकी निर्भरता है. हमारे नीति-निर्माताओं ने यह गलत अनुमान लगाया कि वैश्वीकरण निर्बाध रहेगा और अमेरिका व चीन महत्वपूर्ण तकनीक और खनिजों की आपूर्ति जारी रखेंगे. फिलहाल अमेरिका और चीन के पास इन दोनों क्षेत्रों में किसी भी देश को दंडित करने की क्षमता है. भारत के पास चीन जैसी क्षमता नहीं है, इसीलिए अमेरिका के प्रति उसका रुख अपेक्षाकृत नरम है.


भारत को अपनी जनसांख्यिकी, भौगोलिक स्थिति और खुली राजनीति के कारण अनूठा लाभ प्राप्त है. मध्यम लेकिन निरंतर विकास के साथ अगले दो दशकों में भारत तीसरा सबसे शक्तिशाली देश बनकर उभरेगा. अमेरिका यह भी जानता है कि उसके लिए सबसे बड़ा खतरा चीन है. पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जो चीन के विरुद्ध मजबूत दीवार बन सकता है. जापान, दक्षिण कोरिया या आसियान का कोई भी अन्य देश भारत की क्षमता नहीं रखता. इसलिए, दीर्घकालिक दृष्टिकोण से, वाशिंगटन भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक अपरिहार्य रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है. भारत भी समझता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसके हित अमेरिका के साथ जुड़े हुए हैं. यदि चीन को नियंत्रित करना है, तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी आवश्यक है. भारत अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन नहीं बनाना चाहता, बल्कि क्वाड जैसे राजनीतिक गठबंधन में काम करना चाहता है. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि भारत के निकटवर्ती पश्चिम में अमेरिका एक सिरदर्द है, जबकि पूर्व में एक आवश्यकता. दुनिया में कहीं भी, भारत के भू-राजनीतिक हित अमेरिका के साथ उतने नहीं मिलते, जितने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मिलते हैं. इसलिए अल्पकालिक टैरिफ संबंधी बाधाओं को भारत-अमेरिका संबंधों के अंतिम निर्णायक कारक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

ट्रंप चले जायेंगे, टैरिफ भी बदल जायेंगे, पर चीन का खतरा कम नहीं होगा. चीन के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई सही रणनीति है. निष्कर्षतः रक्षा समझौते का दस वर्षों के लिए विस्तार दोनों देशों के संबंधों के लिए एक सकारात्मक कदम है. हालांकि दोनों के बीच विश्वास की कमी बनी हुई है. व्यापार वार्ताएं चल रही हैं. पर बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि भारत को ट्रंप प्रशासन से क्या रियायतें मिलती हैं. भू-राजनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान के प्रति ट्रंप का अनुकूल रवैया भारत को और नाराज कर सकता है. दोनों देशों के बीच मुद्दे बने रहेंगे और अतीत की सौहार्दपूर्ण स्थिति वापस नहीं आ सकती.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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