अंतरराष्ट्रीय राजनीति में समय की मांग है भारत-चीन निकटता, पढ़ें राजन कुमार का लेख

India-China : मौजूदा वैश्विक अव्यवस्था के लिए ट्रंप काफी हद तक जिम्मेदार हैं. उनकी अनिश्चित और मनमानी नीतियों ने मौजूदा व्यवस्था में व्यवधान पैदा कर दिया है. बड़ी संख्या में भारतीय ट्रंप की जीत से खुश हुए थे. उन्होंने गलतफहमी में मान लिया था कि ट्रंप साम्यवादी चीन के खिलाफ एक मजबूत दीवार के रूप में लोकतांत्रिक भारत की मदद करेंगे.

India-China : अंतरराष्ट्रीय राजनीति अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है. कुछ महीने पहले तक यह अकल्पनीय था कि ट्रंप चीन को बख्शते हुए भारत पर भारी टैरिफ लगा देंगे, और नयी दिल्ली बदले में बीजिंग के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश करेगी. फिर, कौन सोच सकता था कि ट्रंप यूरोप और यूक्रेन की चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए पुतिन को अमेरिका में आमंत्रित करेंगे. पर यह सब हुआ. अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पहिया आज ऐसी दिशा में घूम रहा है, जिसका सटीक अनुमान अनुभवी राजनयिक भी नहीं लगा सकते.


मौजूदा वैश्विक अव्यवस्था के लिए ट्रंप काफी हद तक जिम्मेदार हैं. उनकी अनिश्चित और मनमानी नीतियों ने मौजूदा व्यवस्था में व्यवधान पैदा कर दिया है. बड़ी संख्या में भारतीय ट्रंप की जीत से खुश हुए थे. उन्होंने गलतफहमी में मान लिया था कि ट्रंप साम्यवादी चीन के खिलाफ एक मजबूत दीवार के रूप में लोकतांत्रिक भारत की मदद करेंगे. पर ऐसी उम्मीदें नासमझ और अवास्तविक थीं. ट्रंप की एकमात्र चिंता अमेरिका को फिर से महान बनाना है. वह प्रतिबद्धता और दीर्घकालिक साझेदारी को महत्व नहीं देते. हेनरी किसिंजर ने कभी कहा था कि अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, पर अमेरिका का दोस्त होना घातक है.

दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने के ट्रंप के बार-बार के बयानों और उनके द्वारा लगाये गये 50 प्रतिशत टैरिफ ने भारतीयों को झकझोर दिया. नतीजतन पिछले तीन दशकों में दोनों प्रशासनों द्वारा कड़ी मेहनत से बनाया गया विश्वास हवा में उड़ गया है. बदलती वैश्विक भू-राजनीति में यह संभावना है कि भारत रूस के साथ अपने संबंध और मजबूत करेगा तथा चीन के साथ अपने तनाव कम करेगा. नये घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि भारत और चीन, दोनों एक-दूसरे के प्रति अपनी रणनीति में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं. चीन के विदेश मंत्री वांग यी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के निमंत्रण पर भारत आये. यहां उनका भव्य स्वागत हुआ. अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने भारत-चीन सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधियों की 24वें दौर की वार्ता में भाग लिया. विदेश मंत्री एस जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उन्होंने मुलाकात की.

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया कि भारत और चीन के बीच स्थिर, पूर्वानुमानित और रचनात्मक संबंध वैश्विक शांति और व्यवस्था में योगदान देंगे. उन्होंने बताया कि पिछले साल कजान में राष्ट्रपति शी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक के बाद से द्विपक्षीय संबंधों में लगातार प्रगति हुई है. चीन और भारत के संबंध सकारात्मक रुख दिखा रहे हैं और इस वर्ष दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ है. वांग यी ने दोहराया कि भारत और चीन के बीच 23वीं विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता के बाद से शांति और सौहार्द कायम है.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के स्तर पर यह विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता तनाव कम करने, परिसीमन और सीमा विवादों पर केंद्रित है. गलवान सीमा गतिरोध के बाद दोनों देशों के बीच संबंध टूट गये थे. लेकिन अब भारत और चीन सीधी उड़ानें फिर से शुरू करने, सीमा व्यापार बढ़ाने और सीमा मुद्दों पर नया तंत्र बनाने पर सहमत हुए हैं. सीमा मुद्दों के समाधान के संबंध में निम्नलिखित तीन नये तंत्र होंगे : सीमा परिसीमन में मुद्दों का पता लगाने के लिए एक विशेषज्ञ समूह, सीमा प्रबंधन के लिए एक कार्य समूह, और पूर्वी व मध्य क्षेत्र में एक सामान्य स्तर का तंत्र. दोनों पक्ष तीन निर्दिष्ट व्यापारिक बिंदुओं, लिपुलेख दर्रा, शिपकी ला दर्रा और नाथू ला दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार खोलने पर भी सहमत हुए.

चीन दुर्लभ मृदा, उर्वरक और सुरंग खोदने वाली मशीन से संबंधित भारत की तीन चिंताओं का समाधान करने पर सहमत हुआ है. सीमापार नदी के मुद्दे पर भी चर्चा हुई और आपात स्थिति में चीन जल विज्ञान संबंधी जानकारी साझा करने पर भी सहमत हुआ. भारत ने यारलुंग त्सांगपो पर, जिसे भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है, चीन द्वारा बांधों के निर्माण पर अपनी चिंता व्यक्त की है.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 31 अगस्त को शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के लिए चीन जायेंगे. पहली नजर में उनकी यह यात्रा सामान्य लग सकती है, लेकिन अगर कोई परिदृश्य से अलग हटकर देखने की कोशिश करे, तो असली मकसद सामने आ जायेगा. एससीओ बैठक में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा चीन-भारत संबंधों में मधुरता लाने का एक प्रयास है.
एससीओ चीन के नेतृत्व वाला एक सुरक्षा संगठन है, जो मुख्य रूप से मध्य एशिया की सुरक्षा और स्थिरता पर केंद्रित है. पिछले दो वर्षों के रिकॉर्ड देखें, तो भारत ने इस संगठन में कम ही रुचि दिखायी है. भारत की पहली अध्यक्षता में, एससीओ के 23वें शिखर सम्मेलन को 2023 में वर्चुअल प्रारूप में परिवर्तित कर दिया गया था. इसके अलावा, प्रधानमंत्री पाकिस्तान में हुए पिछले एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे और इसके बजाय विदेश मंत्री एस जयशंकर को उन्होंने भेजा था. लेकिन चीन में होने वाली एससीओ बैठक में प्रधानमंत्री भाग लेंगे. हालांकि चीन-भारत की मौजूदा नजदीकी का यह मतलब नहीं है कि पाकिस्तान के प्रति बीजिंग का रवैया बदल गया है. ऐसे ही, 2020 में सीमा पर हुए तनाव के बाद भारत और चीन के रिश्ते पूरी तरह सहज नहीं हुए.

गौर करने की बात है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2023 में भारत द्वारा आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे. यह मानने का कारण है कि सामान्य स्थिति में प्रधानमंत्री मोदी एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होते. लेकिन उन्होंने चीन जाने का फैसला किया है, तो इसका जवाब भारत के बारे में ट्रंप के प्रतिकूल बयानों और उनकी नीतियों में निहित है. ट्रंप के आक्रामक रुख ने भारत को चीन के साथ अपने संबंधों में नरमी लाने पर मजबूर कर दिया है.
जाहिर है, भारत की रणनीति में बदलाव आ रहा है, जिसमें गैर-पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंधों को प्राथमिकता दी जायेगी. ब्रिक्स और एससीओ के साथ भारत के संबंध भी मजबूत होंगे. चीन के साथ भारत के बेहतर संबंधों का क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा. उनके वैश्विक हितों में समानता और भिन्नता, दोनों हैं. पिछले 75 वर्षों में भारत और चीन ने अपने संघर्षों को यथोचित रूप से प्रबंधित किया है और कोई कारण नहीं है कि वे भविष्य में भी ऐसा न कर सकें. भारत और चीन सभ्यता आधारित देश हैं और उन्हें दीर्घकालिक स्थायी संबंधों में भारी निवेश करना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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